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Monday, 14 August 2023

मोदी को डर भी हे खोफ भी हे 2024 के चुनाव के बाद क्या होगा ।

 



सलाम दोस्तों डर तो है खौफ भी है 2024 के बाद चुनाव को लेकर मोदी सरकार में ये दोनों चीजें हैं ।


लेकिन हर पांच बरस के बाद जब चुनाव होते हैं तो दो हज़ार चौबिस अलग कैसे है क्या वाकई इस दौर में सरकार के भीतर इतनी फाइलें हैं और इतने दस्तावेज है अगर दो हज़ार चौबिस में सरकार यानी मोदी सत्ता हार जाती है और उसके बाद वह फाइलें खुलने लगेंगे तो स्थिति उनके लिए
नाजुक हो जाएगी जो मौजूदा वक्त में सत्ता में हैं
क्योंकि इस दौर में कोई जानकारी बाहर निकलती नहीं है और कोई दाग मोदी सत्ता पर लगा नहीं पाता है इस बात का जिक्र खुले तौर पर राजनीतिक मंचों से भी होता है खुद प्रधानमंत्री भी जोर शोर से इस बात को रखते हैं कि देखिए हमारे दौर में कोई स्कैम होता नहीं है
तो कोई भी यह सवाल पूछता है कि जो स्कैम उभरना चाहिए जिन संस्थानों के जरिए क्या वो सारी रिपोर्ट को छुपा ले गई
और अगर ध्यान दीजिए तो इस दौर में सिर्फ सीएजी और सेबी की रिपोर्ट ही अगर खुलकर सामने आ जाए तो क्या कुछ हो जाएगा क्योंकि छिटपुट जो भी जानकारी निकलकर आती है वह चौंकाने वाली होती है और इस देश के भीतर चंद करोड़ के मसले को लेकर ही शोर मच जाता है कि मोदी सरकार के दौर में स्कैम हुआ
है घोटाला हुआ है
तो जरा कल्पना की शुरुआत कीजिए कल्पना नहीं बल्कि हकीकत तौर पर जरा इन परिस्थिति को समझने की कोशिश कीजिए सरकार जिस रास्ते पर सरकार में आने से पहले चली
उस दौर में जो वह सोचती थी मौजूदा वक्त में उसने उस लकीर को क्यों छोड़ दिया हम जिक्र यहां पर ब्लैक मनी का कर रहे हैं
उसके बाद सोचिए कि सेबी को रिपोर्ट देने में इतनी देर क्यों हो रही है अडानी कांड को लेकर व कौन सी जांच उसके बाद उभयलिंगी और किस तरीके से कौन से दस्तावेजों को लेकर कौन कैसे सवाल करेगा इसको भी थोड़े वक्त के लिए सोचिए और फिर सोचिए कि सीएजी की रिपोर्ट चाहे सड़क निर्माण का मुद्दा
हो चाहे आयुष्मान भारत समेत कई योजनाएं जो सरकार ने लागू की उसको लेकर छिटपुट जानकारी आ जाती है तो फिर क्या होता है
अगर ऐसी परिस्थिति में दो हज़ार चौबिस के बाद सारी फाइलें खुलने लगेंगे तो क्या होगा हमें लगता है जरा परत दर परत आज इन परिस्थिति को इसलिए यह समझ लीजिए
क्योंकि इस दौर में अडानी कांड का सच अगर सामने इस देश के भीतर आ जाए
तो वह इस देश के दर्जनभर ऐसे इंस्टीट्यूशंस है वो सीधे कटघरे में खड़े होंगे कि वह कर क्या रहे थे
अगर इस दौर में सीएजी की रिपोर्ट आ रही है तो सरकार के भीतर के अलग अलग इंस्टीट्यूशन में ही आपस में तालमेल नहीं है और कैसे लूट हो रही है यह भी सामने आ जाएगा
जो बातें सामने आई जिन बातों को लेकर दबाया किया जिन बातों का इंतजार है इसी तले आज मोदी सत्ता के सत्ता में न आने से पहले की एक फाइल खोल कर आजम शुरुआत करते हैं यह फाइल दरअसल ब्लैक मनी को लेकर जुड़ी हुई है और इस देश के भीतर में ब्लैक मनी पर
खेल कसने के लिए एक दर्जन से ज्यादा इंस्टीट्यूशंस आए सिर्फ ईडी नहीं बल्कि सीबीडीटी भी है बल्कि सीबीएस यानी सेंट्रल बोर्ड ऑफ एक्साइज एंड कस्टम दिया है एफआईयू भी है यानी फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट भी है सीबीआई भी है एसएफआईओ यानी सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन
ऑफिस भी है एनसीबी भी है नारकोटिक्स इंटेलिजेंस ब्यूरो सीबीआई भी भी है सेंट्रल इकनॉमिक इंटेलिजेंस ब्यूरो एनआईए भी है
एच एल सी भी है हाई लेवल कमेटी एक काम करती है इसके अलावा डीआरआई भी है डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस डीजीसीए यानी डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सेंट्रल एक्साइज इंटेलिजेंस भी काम करता है वाइन यानी कस्टम ओवरसीज इन्वेस्टिगेशन नेटवर्क यह भी काम करता है सीपीएम जो है सेंट्रल ब्यूरो ऑफ कार्तिक यदि
काम करता है अब यहां पर सवाल एक है कि इतने सारे इंस्टीट्यूशन इस देश के भीतर काम कर रहे हैं और इन सारे इंस्टीट्यूशन का काम अगर एक झटके में सेबी को जो जांच करके रिपोर्ट देनी है या हीडलबर्ग रिपोर्ट आने के बाद जिस रिपोर्ट का इंतजार देश कर रहा है ये सारी एजेंसियां एक झटके में
कटघरे में खड़ी हो जाएगी अगर सेबी रिपोर्ट को छुपाती है और दो हज़ार चौबिस के बाद व रिपोर्ट की फाइल इस देश के सामने खुल जाती है सेबी ने सुप्रीम कोर्ट से पंद्रह दिन का और वक्त मांगा है आज मियाद पूरी हो रही थी कहा गया पंद्रह दिन और दीजिए तो आप उनतीस अगस्त को सुनवाई होगी
लेकिन उससे पहले हमने कहा पहली फाई ब्लैक मनी को लेकर आज खोलनी चाहिए ब्लैक मनी पर मोदी सरकार नहीं बल्कि बीजेपी ने काम करना शुरू किया था और दिल्ली में विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन जो बनाया गया था उसने दो हज़ार दस में एक टास्क फोर्स बनाया था कि ब्लैकबर्न इस देश में भी शूट होना चाहिए
और उसी का असर था कि दो हज़ार बारह में जिस समय पड़ा मुखर्जी फाइनेंस मिनिस्टर थे और वह दो ने एक वाइट पेपर लेकर आए थे ब्लैक मनी को लेकर उसमें जिन बातों का जिक्र किया गया जो टास्क फोर्स विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन यह बीजेपी से जुडी हुई थी आरएसएस जुड़ी हुई संस्था थी इन्होंने
रिपोर्ट निकाली उन रिपोर्टों के अक्स तले मौजूदा वक्त में जब आप खडे होंगे तो आपके भीतर वार्ता यह सवाल होगा कि सवाल ही नहीं है कि अगर ये चीजें लागू हो जाती तो इस देश में कोई रईस पैसा लेकर भाग पाता अगर यह लागू हो जाती तो अडानी सरीखा कांड शेयर बाजार में हो पाता अगर ये चीजें
लागू हो जाती तो इस देश के भीतर एनसीएलटी में जो खुद को दिवालिया घोषित करते हुए जाते हैं और सरकार आईबीसी और एनसीएलटी बनाकर बताती है कि कानूनी तरीके से हम काम कर रहे हैं ये सारी चीजें एक झटके में पकड़ में आ जाती जो एक दर्जन ऑर्गेनाइजेशन इस देश के भीतर जिनका काम है इसे
पकड़ पाना लेकिन उस विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन टास्क फोर्स में चार लोग थे ये चारों लोग आज बड़े महत्वपूर्ण पदों पर है उसमें एक अजीत डोभाल थे जो लीड कर रहे थे आज की तारीख में नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर है मोदी के प्रधानमंत्री मोदी दूसरा नाम था एस गुरुमूर्ति या
इस वक्त सेंट्रल बोर्ड में शामिल है जो आरबीआई की है
तीसरा नाम था महेश जेठमलानी का जो राज्यसभा के सदस्य भी हैं और सरकार के लिए वरिष्ठ वकील के नाते सारी पैर भी करते हैं राहुल गांधी के मामले में भी सरकार की तरफ से पैरवी महेश जेठमलानी कर रहे थे चौथा नाम था आर वैद्यनाथन का या इकोनॉमिक्स के जानकार हैं इन्होंने अच्छी खासी पढ़ाई की है लेकिन सरकार के करें
होने का लाभ यह है कि आज की तारीख में या एनएसए बोर्ड जो नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के तहत होता है उसके सदस्य भी होते हैं सेबी से जुडी कोई कमेटी होती है उसमें भी सदस्य बनाया जाता है आरबीआई ने ही बनाया जाता है आईआरडीए में बना जाता है एफआईआर डीएम में भी बनाया जाता है तमाम जगहों पर इनकी मौजूदगी नजर आती है लेकिन इस प्रक्रिया में
जिस ब्लैकमनी का हम जिक्र कर रहे हैं और उस दौर के भीतर में जब सरकार लेकर आई वाइट पेपर और जो इनके जरिए पेपर निकलकर आया उसने बहुत साफ तौर पर कई बातों का जिक्र किया कि किस तरीके से इस देश के भीतर ब्लैक मनी काम कर रही और वो लगातार बढ़ती जा रही और मौजूदा वक्त में भी स्विस बैंक के आंकड़े हो या इंट्रो
नेशनल भारतीय द्वारा जमा किए गए दुनिया के कई जगहों पर जो बैंक के भीतर पैसा है उसकी जानकारी भी बताती है कि बहुत पैसा है यानी ब्लैकमनी मौजूद है शेल कंपनियां भी काम करती है जो कि सरकार ने अपने तौर पर कहा बहुत सारी शेल कंपनियां बंद कर दी गई अब मनी लॉन्ड्रिंग पर रोक लगाती है लेकिन
अदाणी कांड के दायरे में ये सारी बातें फिर खुलकर सामने आ गई नहीं नहीं ऐसा नहीं है और इसकी जांच होनी चाहिए और इसी के मातहत जला दें जो ऑडिट करती थी अडानी पोर्ट्स को लेकर उसने अपना हाथ पीछे खींच लिया
अब सवाल सबसे बड़ा यह है कि जो छिटपुट जानकारियां निकल कर आती है क्या वह वाकई यह कितनी बड़ी लकीर इस देश में की जाती है कि दो हज़ार चौबिस के बाद अगर वाकई फाइल खुल जाए तो स्थिति नाजुक हो जाएगी हमें लगता है दो चार मामले हाल के जहन में आपके सामने आए होंगे जैसे एनएचएआई के तहत जो हरियाणा के भीतर
जो एक सड़क बननी थी द्वारका से आगे की उसमें जो रुपये तय हुआ उसमें तय किया गया कि दो सौ पचास करोड़ सतहत्तर लाख रुपए प्रति किलोमीटर के हिसाब से सड़क बनेंगे हरियाणा में उन्नीस किलोमीटर की सड़क बननी है जो एनएचएआई के माध्यम से बनी है नेशनल हाइवे जो है उसके तहत बनी
उन्नीस किलोमीटर की सड़क का जो बजट निकलकर आया वह लगभग चार हज़ार सात सौ सत्तर करोड़ का सवाल था कि इससे पहले जो भारत माला परियोजना जो थी उसके तहत बनाया गया था कि लगभग अट्ठारह करोड़ में यह सड़क एक किलोमीटर की पूरी होनी चाहिए लेकिन फिर ऐसा क्या है कि
एक झटके में बताया गया कि इसमें लगभग ढाई सौ करोड़ रुपये दो सौ इक्यावन करोड़ रुपए लग जाएंगे
सवाल यह उसके बाद जब निकल कर आया कागज पत्तर निकाला सीएजी न तो सीएजी ने कहा कि अरे आप सड़क बनाते हैं तो आप किसी से बातचीत करते हैं एनर्जी वाले कि नहीं करते हैं क्योंकि जो भारत माला के तहत जितनी सड़क बनाई जानी है इस देश के भीतर में उसमें बड़ा हिस्सा एनएचएआई का है और इसमें भी जानकारी
आई कि आपकी जो अप्रेजल और टेक्निकल उतनी कमेटी है वह तो नीति आयोग तक से बात नहीं करती है और यह शामली मुजफ्फरनगर की सड़क में भी बात आ गई दिल्ली से वडोदरा के एक्सप्रेस वे के भीतर भी यह बात निकलकर आ गई तो क्या यह माना जाए कि जो नेशनल हाईवे बनना ही इस देश के भीतर में लगभग
छिहत्तर हजार नौ सौ निन्यानवे किलोमीटर यह भारतमाला प्रोजेक्ट है इसके तहत जो एनएचएआई जो काम कर रही है वह लगभग सत्तर हजार नौ सौ पचास किलोमीटर का बनाएगी और मन माफिक कीमत तय कर रही है क्योंकि खुद सीएजी ने कहा कि किसी भी वैलिड जस्टिफिकेशन का जिक्र
में नहीं किया गया तो यह तो एक मामला है जो एक झटके में निकलकर आ गया आपके जहन में होगा अच्छा यह तो उन्नीस किलोमीटर का मामला है और एनएचएआई को तो लगभग सत्तर हजार नौ सौ पचास किलोमीटर बनाने हैं वहां कितने घपले घोटाले हो रहे होंगे यह फाइल कभी खुलेगी या जिक्र होकर निकल जाएगी
उसके बाद अगला सवाल आया कि इस देश के भीतर में सरकार की जो योजनाएं थी मसलन आयुष्मान भारत का जिक्र जैसे हो गया
उसमें निकलकर बहुत साफ तौर आया कि लगभग सात लाख उनचास हजार आठ सौ बीस लाभार्थी जो है एक टेलीफोन नंबर के साथ उनका जुड़ा हुआ है जानकारी अब टेलीफोन नंबर भी बड़ा जबरदस्त है दस बार नौ नौ लिख दीजिए यही है टेलीफोन नंबर उस एक
फोन नंबर के आसरे लाभार्थी को फायदा मिल रहा है कौन है ये लोग सात लाख उनचास हजार आठ सौ बीस लाभार्थी एक टेलीफोन नंबर एक दूसरा टेलीफोन नंबर भी है उसमें दस बार आठ आठ आठ आठ लिख दीजिए यह टेलीफोन नंबर और इससे एक लाख चालीस हजार लाभार्थियों को लाभ मिल रहा है तीसरा नंबर भी है
नाइन लिखिए और नौ बार जीरो लगा दीजिए इसमें लगभग छियानवे हजार छियालीस लाभार्थी लाभ उठाए गए उसके बाद निकलकर सामने बात आनी शुरू हुई कि एक ही दिन में कई अस्पतालों में भर्ती होकर पैसा कमाने वाले गुजरात मध्यप्रदेश बीजेपी शासित छत्तीसगढ़ कांग्रेस शासित
पंजाब आम आदमी पार्टी शासित केरल वामपंथी शासित इन तमाम जगहों पर बड़ा ही नेचुरल वे में समाजवाद चलता और लूट होती है और मौत के बाद भी भुगतान होता यानी पेशेंट की मौत हो गई उसके बावजूद भुगतान हो रहा है ऐसे मरीज जो मौत के मुंह में समा गए फिर भी पैसा ले रहे थे इनकी संख्या लगभग दो
लाख चौदह हजार नौ सौ तेईस और यह जिन राज्यों में पाए गए उसमें मध्यप्रदेश है उसमें हरियाणा है छत्तीसगढ़ झारखंड और केरल है
सवाल है कि बात यहीं रोक दी जाए या फिर देश के भीतर अलग अलग योजनाएं चल रही है उसमें भी जानकारी निकलकर आई गोवा हिमाचल प्रदेश तेलांगना सिक्के यहां पर जो विकास की रूपरेखा पी और उत्तर प्रदेश में अयोध्या को लेकर जो विकास परियोजना थी उसमें भी घपले घोटाले हो रहे थे कोई ठेकेदार कम पैसा दे रहा है
था तो पर जीएसटी चुरा रहा था उसमें भी एक गाता निकलकर आया लगभग उन्नीस करोड़ तिहत्तर लाख का सवाल यह नहीं है
सवाल इससे बड़ा इसलिए है क्योंकि यह तो छिटपुट जानकारी उन माध्यमों से निकलकर आती है जिसमें खानापूर्ति की जाती है सवाल यह है कि अगर इसके अक्स तले एक सेकंड के लिए आप अडानी कांड को लाकर सामने खड़ा कर दीजिए जिसके लिए पंद्रह दिनों का और वक्त मांगा गया है
अब यहां पर यह बड़ा सवाल है कि अगर यह पंद्रह दिनों के वक्त के भीतर भी जानकारी जो निकलकर आती है या जो जानकारी चाहिए सरकार को या सुप्रीम कोर्ट को अगर उस दायरे के भीतर में चीजें मैनिपुलेट हो रही थी
तो फिर वो सामने कैसे आएगी लगभग दस ऐसे प्वॉइंट है जो खुले तौर पर बतलाते हैं कि जब दो हज़ार दस में बीजेपी ब्लैक मनी पर काम कर रही थी दो हज़ार बारह में वाइट पेपर जब लेकर आए काले धन को इस देश के भीतर पैरलल इकोनॉमी पर रोक लगाने को लेकर
उस दौर में यूपीए सरकार और दो हज़ार चौदह में जो पहली कैबिनेट बैठक की शपथ लेने के तुरंत बाद जिसमें एसआईटी बनाई गई उसमें भी जिन प्वाइंट्स को रखा गया सहयोग से वो सारे के सारे दायरे इस अडानी कांड से जुड़ते हैं और इस देश के भीतर रईसों के घपले घोटाले से जोड़ते हैं
हो रहे हैं सा अगर सब हो रहे हैं तो फिर रोक कैसी लगेगी क्योंकि अडानी कांड के तहत हमको लगता है कि एक आरोपों की आपको एक फिर बता देते हैं उसमें दस प्वाइंट हैं पहला यह है कि शेयर की कीमतों को मैनिपुलेट प्लेट करके बढ़ाया गया दूसरा प्वाइंट है मनी लॉन्ड्रिंग और अकाउंटिंग फ्रॉड किया गया और आठ साल
में कंपनी ने पाँच छः सीएफओ बदल डाले अडानी ग्रुप पर दो लाख बीस हजार करोड़ का कर्ज है और कंपनियों को उसकी हैसियत से ज्यादा कर्ज मिल गया जो कर्ज दे रहे थे उसमें एलआईसी और एसबीआई भी शामिल था तो इनकी भूमिका जो की जनता का पैसा वहां जा रहा था उसके बाद बहुत साफ तौर पर आरोप है कि
मारीशस समेत दुनिया के कई देशों से कंपनियों में पैसे भेजे गए और उन कंपनियों ने बाहर से पैसे भेज कर अडानी के शेयर खरीद लिए
यानी ईडी एसएफआईओ सीवीसी इस दौर में कर क्या रहे थे और दर्जनभर कंपनियां क्या कर रही थी जब शेल कंपनी और मनी लॉन्ड्रिंग चल रही है क्योंकि पार्लियामेंट के भीतर सरकार ने जवाब दिया हमें जानकारी नहीं है शेल कंपनियों की जो अडानी के लिए काम कर रहे थे इतना ही नहीं यह भी बताया गया कि ग्रुप के साथ
कंपनियां जो अडानी ग्रुप की थी उसके शेयरों की कीमत पचासी फीसदी तक कैसे बढ़ गई यह इस लगभग इसका रॉकेट के हिसाब से चीजें कैसे चल रही थी और खुले तौर पर उनके भाई का नाम भी आया था जो विनोद अडानी है कि बाहर बैठकर शेल कंपनियों को मैनेज करते और इसके जरिए भारत में अडानी ग्रुप की जो में लिस्टेड
कंपनी है प्राइवेट कंपनी है उसमें अरबों डॉलर ट्रांसफर करते हैं यह बात भी निकलकर आई थी जिसकी जांच होनी है ये सारी चीजें उसके बाद था कि सेबी ईडी आईटी डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस डीआरआई और एसएफआईओ सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस इनकी क्या भूमिका होनी चाहिए एक तरफ अगर से
भी यह सब जांच कर रही है एक तरफ अगर सुप्रीम कोर्ट आवाज उठा रही है दूसरी तरफ लोगों के भीतर सवाल है कई पीआईएल दाखिल हुए इसमें इनकी भूमिका क्या थी यानी इस देश की इतनी बड़ी तादाद में ऑर्गनाइजेशन को इस दौर में खामोश कर दिया गया
जाहिर तौर पर सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ जस्टिस पी एस बार सिम्बा और जस्टिस जे भी पार्टी वाला के पास यह पूरा मामला है और अब उनतीस अगस्त को सुनवाई होनी है लेकिन जब आप इसी से जोड़ते हैं मामला और परिस्थिति को समझने की कोशिश करते हैं कि कैसे इस दौर में क्या कुछ हो रहा था तो हमें लगता है कि जो
द लाइट कंपनी ने छोड़ा है ऑडिट करना पोर्ट पोर्ट किंग कहे जाते हैं अडानी और उनका जो छोड़ा उन्होंने जो सवाल खड़े किए हैं वो सवाल पर गौर अभी इसलिए करने की जरूरत है तब आप पूरे सिस्टम को समझ पाएंगे सिस्टम काम कैसे कर राय और क्यों खौफ ज्यादा है सरकार अगर चौबिस और
चौबिस के बाद की परिस्थिति चौबिस में हारे तो उसके बाद की परिस्थिति में कहां खड़े होंगे कोई नहीं जानता है
तो जरा उस आवाज को सुनने के को की दिलाई ग्रुप की तरफ से कहा गया कि दरअसल अडानी ग्रुप ने इंटर्नल एवोल्यूशन और सेबी की जांच के अलावे जो ही दिन भर की रिपोर्ट आई थी जो आरोप लगाए गए थे उसमें किसी बाहरी या इंडिपेंडेंट एजेंसी से काम कराया ही नहीं जो हमें लगता था कि कराना चाहिए जिससे बात सामने आ पाए दूसरा
उसमें जो खासतौर पर निकल कर आया कि अडानी पोर्ट्स ने जो मैन मामी में उनके अपने कंटेनर्स की सेल के लिए सोलर एनर्जी लिमिटेड के साथ दोबारा से कीमत और दूसरी चीजों को शेयर की जो किया उसके चलते कंपनी को लगभग एक हज़ार दो सौ तिहत्तर करोड़ का घाटा हो गया
अब सवाल यह है जो रिव्यू रिपोर्ट सौंपी गई उसमें बहुत साफ तौर पर लिखा गया कि हमने ईपीसी सर्विस देने वाले एक कॉन्ट्रैक्टर से तीन हज़ार आठ सौ इकहत्तर करोड़ रुपये रिकवर करने को कहा ग्रुप से इस बात का जिक्र किया कंपनी ने कहा कि उनका उस कॉन्ट्रैक्टर से कोई लेना देना ही नहीं है इसका जिक्र
एडिनबर्ग की रिपोर्ट में भी था डिलाइट ने कहा जब तक कोई स्वतंत्र जांच नहीं होगी तो फिर कोई सबूत कैसे आएगा
और इस देश के भीतर में चौदह पोर्ट है जो अडानी चलाते हैं अब इस प्रक्रिया के भीतर इस देश के तीन चार बड़े कॉरपोरेट को अगर आप ले लेते हैं जो माना जाता है कि सरकार के करीब है उनके जरिए और उनके नेटवर्थ और उनके कामकाज के जरिए जब आपके जहन में यह सवाल आएगा जो सहयोग से से भी
डांस तो अडानी कांड और भर की रिपोर्ट के मद्देनजर कर रही है चूंकि यह मामला आगे या सामने अगर नहीं आईओटी रिपोर्ट तो चीजें चल रही होती एलआईसी पैसा दे रही होती एसबीआई भी कर्ज पर कर्ज दिए जा रही होती वहां पर नेटवर्क बढ़ते चला जाता ये परिस्थितियां इस देश के छः ऐसे कॉर्पोरेट और है
चीन के साथ चीजें जुड़ी हुई है और वहां को लेकर कोई सवाल इसलिए नहीं क्योंकि अभी कोई रिपोर्ट इस रूप में आई नहीं जो इस देश को बेचैन कर दें तो तीन सवाल इस दौड़ में सबसे बड़े हो गए हैं
एक तरफ सीएजी का काम इस देश में सरकार द्वारा लिए जा रहे किसी भी निर्णय के बाद जो आर्थिक तौर पर खर्चे और होते हैं उसकी वह ऑडिट करें
सरकार के तमाम मंत्रालयों की वह ऑडिट करें आठ मंत्रालयों को लेकर छिटपुट जब रिपोर्ट आई तो वह नेगेटिव ही निकलकर आई वो रेलवे की रिपोर्ट हो वह डिफेंस की रिपोर्ट हो वह एचएएल को लेकर रिपोर्ट हो कि आपने वहां पर जो भी जिस रूप में भी देरी की प्रोडक्शन में देरी आई रिसर्च में देरी थी
उससे भी डेढ़ सौ करोड़ का लगभग नुकसान हो गया अलग अलग क्षेत्रों में लेकर जो भी जानकारी आती है वह खुले तौर पर सीएजी छिटपुट जानकारी तो रख देती है लेकिन एक क्षण के लिए सोचिए कि अगर यही सीएजी जिस दौर में यूपीए काम कर रहा था और यूपीए के दौर में सीएजी काम कर रही थी अगर वो सारी रिपोर्ट आने लगे
तो क्या होगा ये सीएजी की स्थिति यह दूसरी बात सामान्य तौर पर कहीं कोई गड़बड़ी न हो जनता के साथ धोखा फरेब न हो शेयर बाजार में भी इसीलिए बैठी हुई है लेकिन सेबी ने खुद कहा कि बड़े ही कॉम्प्लेक्स में अडानी के पूरे के पूरे जो उसका इकोनॉमिक
मॉडल है इसीलिए हम को वक्त चाहिए सवाल है कि वह कॉम्प्लेक्स कितना क्यों है
उसके तार दुनिया के दूसरे दूसरे देशों से जुडे हुए हैं सीबीआई इसका जिक्र करती है तो दूसरे देशों से जुड़े होने के दौर में ही तमाम डॉक्यूमेंट्स आ जाते हैं सरकार के पास और सेबी के पास क्या वो नहीं थे मनमाफिक चल रही थी चीजें और अगर सरकार के साथ उस दौर में अडानी ग्रुप ऐसे था तो और कॉर्पोरेट जो इस दौर में आ
है उनकी फाइल कौन खोलेगा
डर और खौफ पहला खौफ इस बात को लेकर है कि इस देश के इंस्टीट्यूशंस और उसे शोषण को हेड करने वाले जो लोग मौजूदा वक्त में है कि वह भी जान चुके हैं कि अगर
दो हज़ार चौबिस के चुनाव में मोदी सत्ता चुनाव हार जाती है तो उसके बाद उनके लिए भी मुसीबत होगी तो वो हर हाल में काम ऐसा करते हैं जिससे सरकार पौष्टिक दिखाई दे क्या यह पहला सवाल है
दूसरा सवाल कमोबेश तो एक दर्जन जांच एजेंसियों का जो हमने नाम लिया जो फाइनैंशियल रेगुलर तीस पर नजर रखते हैं मनी लॉन्ड्रिंग का मसला हो या देश के भीतर अलग अलग तरीके से पैसे जो बनाने की प्रक्रिया उस पर जो नजर रखी जाती है वो इस दौर में अगर चीजों को खामोशी के साथ
सिर्फ देख रहे हैं या सरकार के कहने पर वैसा काम कर रहे हैं तो क्या इस देश के भीतर पूरा सिस्टम चरमरा चुका है और दो हज़ार चौबिस के बाद अगर कोई नया फाइनेंस मिनिस्टर आ जाए नई सरकार आ जाए व उन दस्तावेजों को टटोलना शुरू करें तो स्थिति नाजुक हो जाएंगी इसीलिए इस देश के बड़े
कसा जो इंस्टीट्यूशन को चला रहे हैं वह भी क्या इसीलिए काम कर रहे हैं उनके पास भी कोई ऑप्शन नहीं है और तीसरा सवाल इस देश की इकोनॉमी से जुड़ा है जिस इकोनॉमी में ब्लैक मनी और पैरलल इकनॉमी और एक तरीके से पॉलिटिकल फंडिंग की जो इकोनॉमी रहती है उस इकोनॉमी पर सवाल
दो हज़ार दस में जिस बीजेपी और आरएसएस से जुड़े हुए लोगों ने दो हज़ार दस में विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के टास्क फोर्स बनाई
उसकी जो रिपोर्ट है वो रिपोर्ट भी लागू होने से क्यों घबराहट और क्यों कतराते हैं उसी तरीके से ही काम करना शुरू कर दें
यहां मनमोहन सरकार का तो जिक्र नहीं कर सकते हैं खानापूर्ति के लिए उन्होंने व्हाइट पेपर में आए पर दो हज़ार बारह में लेकिन वो सरकार तो दो हज़ार चौदह में हार गई उसके बाद
उसके बाद की जिम्मेदारी ली जाए या जिक्र किया जाए कि बीते पचहत्तर वर्षों में क्या कुछ हुआ है अभी आने वाले वक्त को भूल जाइए और दो हज़ार सैंतालीस में भारत एक विकसित राष्ट्र हो जाएगा हमारी इकोनॉमी जो है तीसरे नंबर पर आ जाएगी और शानदार तरीके से दुनिया में
छाती फैलाते हुए घूमेंगे और बतलायेंगे की देखिए दुनिया के सामने भारत कितना मजबूत देश है भारत एक मार्केट के तौर पर सवाल इस देश के भीतर की परिस्थितियां हैं जिसको इस दौर में छुपाया गया है और उसी के आने से सरकार खौफ चड्ढा है कि दो हज़ार चौबिस के बाद क्या
हो जाएगा
और शायद इसीलिए जो जो इस खेल में शरीक है
डरा हुआ है या फिर वह सिर्फ यह सोचता है कि हर हाल में यह सरकार को आना चाहिए यही वह लाइन हर हाल में मोदी सरकार दो हज़ार चौबिस में हारने को तैयार नहीं है जिसे जो करना है कर ले यह सोच धीरे धीरे भारत की राजनीति में एक नया खौफ
पैदा कर रही है
बहुत बहुत शुक्रिया बहुत बहुत शुक्रिया

Sunday, 13 August 2023

सामाजिक मूमेंट एकता और सहयोग।

 समाज के लिए समय, शर्म, और बुद्धि: व्यक्ति का सामाजिक सेवा में योगदान
समाज वह स्थान होता है जहाँ हम सभी एक साथ रहते हैं और जीवन की अनगिनत धाराओं में बांटते हैं। इस समाज में सभी के योगदान का महत्व होता है, लेकिन समय, शर्म और बुद्धि तीन महत्वपूर्ण उपकरण होते हैं जो हमारे समाज के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

समय, यह एक अमूल्य संसाधन है जिसे हमें सवारन करना चाहिए। समय का अच्छे से प्रबंधन करने से हम समाज के लिए समर्पित बन सकते हैं।सामाजिक बदलाव में समय का योगदान करने से हम उसके बेहतर भविष्य में सहयोग कर सकते हैं और सभी के लिए बेहतर माहौल बना सकते हैं।

शर्म, यह एक मूल्य है जो हमें दूसरों की भलाइयों में योगदान करने की दिशा में प्रेरित करता है। शर्म के साथ हम सामाजिक बदलाव की दिशा में आगे बढ़ते हैं और अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं। यह हमें बताता है कि हमें सिर्फ अपने स्वार्थ की परवाह नहीं होनी चाहिए, बल्कि हमें समाज की मदद करने में भी संलग्न होना चाहिए।

बुद्धि, यह हमारे निर्णयों की गुणवत्ता को सुनिश्चित करती है। जब हम सामाजिक बदलाव के लिए काम करते हैं, तो हमें विचारपूर्ण निर्णय लेने की आवश्यकता होती है कि हम सबसे बेहतर और सबसे प्रभावकारी तरीके से सहयोग प्रदान कर सकें।

इस प्रकार, समाज के लिए समय, शर्म और बुद्धि का सही तरीके से उपयोग करके हम उसके विकास में सहयोग कर सकते हैं। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने समाज के लिए यह सब उपकरणों का सही तरीके से उपयोग करें और उसके सुधार और विकास में योगदान दें।


बिल्कुल, समाज सेवा में सहयोग करने के लिए समय नहीं दे सकने वाले व्यक्तियों के लिए पैसा और बुद्धि का समर्थन एक महत्वपूर्ण तरीका हो सकता है। यह सहयोग उनके योगदान को समर्थन देता है और समाज के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यहाँ कुछ तरीके हैं जिनसे वे लोग समाज सेवा में सहयोग कर सकते हैं:

1. **वित्तीय सहयोग:** वे लोग वित्तीय रूप से समाज संगठनों या अन्य समाज सेवा परियोजनाओं को सहायता प्रदान कर सकते हैं। यह पैसे उन संगठनों को प्राप्त होते हैं जो उनके समर्थन में काम कर रहे हैं।

2. **विशेषज्ञता का समर्थन:** वे लोग अपनी विशेषज्ञता और बुद्धि का समर्थन प्रदान करके समाज सेवा के प्रोजेक्ट्स में मदद कर सकते हैं। उनके विशेष क्षेत्र की जानकारी और कौशल समाज को आगे बढ़ने में मदद कर सकते हैं।

3. **संसाधनों का समर्थन:** वे लोग सामाजिक परियोजनाओं के लिए आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था करने में मदद कर सकते हैं। इससे संगठनों की काम करने की क्षमता में वृद्धि हो सकती है।

4. **संचालन में सहयोग:** वे लोग विभिन्न समाज संगठनों में स्वेच्छापूर्वक संचालन में सहयोग कर सकते हैं। यह उनके सकारात्मक परिवर्तन में मदद कर सकता है और समाज सेवा के कार्यों को सुचारु रूप से चलाने में मदद कर सकता है।


इन तरीकों से, समाज सेवा में समय नहीं दे सकने वाले लोग भी अपनी पैसे और बुद्धि से समाज के विकास में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं। यह उनके सहयोग की महत्वपूर्ण और प्रभावी तरीके हो सकते हैं।

सामाजिक मिलजुल की एकता और सहयोग समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सामूहिक सहयोग की महत्वपूर्णता को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम समाज के विभिन्न पहलुओं को देखें:

1. **समाज में एकता का प्रतीक:** सामूहिक सहयोग समाज की एकता की भावना को प्रोत्साहित करता है। जब लोग साथ मिलकर किसी समस्या का समाधान ढूंढते हैं, तो वे अपने आप को एक एकता का हिस्सा मानने लगते हैं।

2. **समाज में विविधता की समृद्धि:** सहयोग द्वारा समाज में विविधता की समृद्धि होती है। विभिन्न जातियों, धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के लोग एक साथ आकर्षित होते हैं और एक दूसरे के साथ अनुभव और ज्ञान साझा करते हैं।

3. **समस्याओं के समाधान:** सामूहिक सहयोग की शक्ति से हम समाज की समस्याओं का समाधान निकाल सकते हैं। जब लोग एक साथ काम करते हैं, तो उन्हें बेहतर और सुसंगत विकल्पों की ओर देखने का मौका मिलता है।

4. **सामाजिक न्याय और समरसता:** सहयोग से समाज में न्याय और समरसता की भावना मजबूत होती है। जब लोग एक-दूसरे की मदद करते हैं, तो उन्हें दूसरों के साथ सहमति और समरसता बनाने का अवसर मिलता है।

5. **समाज में सकारात्मक परिवर्तन:** सहयोग के माध्यम से हम समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। यह समाज के सभी सदस्यों की सोच और दृष्टिकोण में पॉजिटिव बदलाव लाता है और उन्हें एक बेहतर भविष्य की ओर आग्रह करता है।

इस प्रकार, सामूहिक सहयोग समाज की एक मजबूती और विकास की कुंजी होता है, जो सभी के लिए लाभकारी होता है।

आर्थिक मदद: सामाजिक प्रवृतियों के उत्थान में एक महत्वपूर्ण कारक

समाज विकास का अद्वितीय पहलू होता है, और सामाजिक प्रवृतियाँ इस विकास के मूल आधार होती हैं। ये प्रवृतियाँ समाज के रूचिकरण, सुधार, और सबसे महत्वपूर्ण तरीके से, उसकी वृद्धि में योगदान करती हैं। हालांकि, समाजिक प्रवृतियाँ स्वतंत्र रूप से विकसित नहीं होतीं, और इसके लिए आर्थिक मदद की आवश्यकता होती है।

आर्थिक मदद के बिना, सामाजिक प्रवृतियाँ अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सकती हैं। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं - पहला, समाजिक प्रवृतियों की विकास के लिए आवश्यक संसाधनों की कमी और दूसरा, यह समाज के सदस्यों को समाजिक प्रवृतियों में समर्पित करने के लिए सहायता नहीं कर पाती।

आर्थिक मदद से, समाजिक प्रवृतियों को उनके उद्देश्य तक पहुँचने का अवसर मिलता है। इससे उनके कार्यों की स्थिरता और प्रभावशीलता में सुधार होता है, जो समाज के विकास के लिए आवश्यक है। सही संसाधनों के साथ, समाजिक प्रवृतियाँ अपने कार्यों को समय-समय पर पूरा कर सकती हैं, और यह समाज के सदस्यों को उनके समर्पित योगदान का सही मूल्य देने में मदद करता है।

इस प्रकार, आर्थिक मदद सामाजिक प्रवृतियों के उत्थान और समाज के विकास में एक महत्वपूर्ण रोल निभाती है। यह समाज के सदस्यों को उनके समर्पित योगदान के प्रति प्रेरित करता है, और समाज के निर्माण में उनकी मदद करता है।