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भारतिय समाजके लिये संघर्ष करना हमारा मुल लक्ष्य हे,

Wednesday, 4 September 2024

दुनिया को कंट्रोल करने के लिए कैसे जेफरी एपस्टीन जैसे लोग से कम करवाते हे।


 जेफरी एपस्टीन: एक शैतानी साजिश और शक्ति का दुरुपयोग**

परिचय ।
जेफरी एपस्टीन का नाम सुनते ही एक भयावह और गहरे षड्यंत्र की छवि उभरती है। एक ऐसा व्यक्ति, जो न केवल स्वयं यौन शोषण के अपराधों में लिप्त था, बल्कि उसने अपनी शक्ति और प्रभावशाली संपर्कों का उपयोग करके दुनिया के सबसे प्रभावशाली और प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी अपने जाल में फंसाया। इस ब्लॉग में हम उस अंधेरे पक्ष की चर्चा करेंगे, जिसमें एपस्टीन और उसके जैसे लोगों ने समाज के उच्चतम स्तरों पर अपना प्रभाव फैलाया और मानवता के सबसे नीच रूप का प्रदर्शन किया।

शक्ति और प्रभाव का दुरुपयोग। 

जेफरी एपस्टीन, जो एक सफल फाइनेंसर के रूप में उभरा था, ने अपनी संपत्ति और संपर्कों का उपयोग कर प्रभावशाली व्यक्तियों को अपने जाल में फंसाने की साजिश रची। उसने नाबालिग लड़कियों को धन और अवसर का लालच देकर अपने पास बुलाया और फिर उनका यौन शोषण किया। लेकिन एपस्टीन का अपराध यहीं तक सीमित नहीं था; उसने इन कृत्यों के माध्यम से कई प्रभावशाली लोगों को फंसाया, जिनमें राजनेता, व्यवसायी, और सेलिब्रिटी शामिल थे।

ब्लैकमेल और षड्यंत्र का जाल ।

कहा जाता है कि एपस्टीन ने इन प्रमुख व्यक्तियों को फंसाने के लिए न केवल उनका शोषण किया, बल्कि उनके खिलाफ सबूत जुटाए और उन्हें ब्लैकमेल भी किया। उसने गुप्त कैमरों और अन्य उपकरणों का उपयोग करके इन लोगों के निजी पलों को रिकॉर्ड किया, जिन्हें वह बाद में उनके खिलाफ इस्तेमाल करता था। इस तरह, उसने अपने अपराधों को छिपाने और अपनी शक्ति को बनाए रखने के लिए इन व्यक्तियों का उपयोग किया।

न्याय और सवाल ।
एपस्टीन के अपराधों की गंभीरता को देखते हुए, उसके खिलाफ कई बार कानूनी कार्यवाही हुई। लेकिन उसकी शक्ति और संपर्कों के चलते, वह कई बार कानूनी पचड़ों से बचने में सफल रहा। 2008 में, एक विवादास्पद प्लीडील के माध्यम से उसे केवल 13 महीने की सजा दी गई, जो उसकी अपराधों की गंभीरता के सामने बहुत ही हल्की थी।

हालांकि, 2019 में उसे फिर से गिरफ्तार किया गया और इस बार न्याय की उम्मीद जगी। लेकिन एपस्टीन की मौत ने इस मामले को और भी पेचीदा बना दिया। उसकी आत्महत्या के बाद कई षड्यंत्र सिद्धांत उभरकर सामने आए, जिनमें यह भी शामिल था कि उसकी मौत वास्तव में एक षड्यंत्र का हिस्सा थी, ताकि वह उन रहस्यों को न उजागर कर सके जो उसने इतने वर्षों में इकट्ठे किए थे।

निष्कर्ष

जेफरी एपस्टीन का मामला केवल एक व्यक्ति के अपराधों का नहीं है, बल्कि यह समाज में फैले उस जहर का भी प्रतीक है, जहां शक्ति और प्रभाव का दुरुपयोग किया जाता है। यह घटना हमें इस बात की याद दिलाती है कि कैसे कुछ व्यक्ति अपनी शक्ति का उपयोग करके न केवल अपनी अपराधों को छिपाते हैं, बल्कि अन्य लोगों को भी अपने जाल में फंसा लेते हैं। इस मामले ने समाज के उच्चतम स्तरों पर फैली हुई साजिशों और भ्रष्टाचार को उजागर किया है, और हमें यह सोचने पर मजबूर किया है कि न्याय और सत्य के लिए हमें कितनी मेहनत करनी पड़ेगी।

........जेफरी एपस्टीन आइलैंड की फोटो.......

जेफरी एपस्टीन एक अमेरिकी फाइनेंसर थे, जो नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और तस्करी के बड़े पैमाने पर आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के लिए कुख्यात हो गए थे। उनके मामले से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारी निम्नलिखित है:

1. पृष्ठभूमि : एपस्टीन का संबंध कई प्रभावशाली व्यक्तियों से था, जिनमें राजनेता, सेलिब्रिटी, और व्यापारी शामिल थे। उन्हें अपनी आलीशान जीवनशैली और विभिन्न स्थानों जैसे न्यूयॉर्क, फ्लोरिडा, और कैरिबियन में अपनी संपत्तियों के लिए जाना जाता था।
2. अपराधिक गतिविधियाँ : एपस्टीन पर आरोप था कि उन्होंने एक बड़े पैमाने पर यौन तस्करी का संचालन किया, जिसमें उन्होंने नाबालिग लड़कियों को, जिनमें से कुछ की उम्र केवल 14 वर्ष थी, नौकरी या अन्य अवसरों का झांसा देकर भर्ती किया। उन्होंने इन लड़कियों को पैसे या अन्य लाभ का वादा करके उनका यौन शोषण किया।

3. गिरफ्तारी और कानूनी कार्यवाही : 
▪️2008 की सजा : एपस्टीन को पहली बार 2005 में गिरफ्तार किया गया था, जिसके बाद 2008 में एक विवादास्पद प्लीडील हुआ। इसमें उन्होंने नाबालिग से वेश्यावृत्ति कराने के कम आरोपों को स्वीकार किया और केवल 13 महीने की सजा हुई, जिसमें उन्हें काम के लिए जेल से बाहर जाने की अनुमति दी गई थी। इस सजा को उसकी कठोरता के लिए भारी आलोचना का सामना करना पड़ा।
 ▪️ 2019 की गिरफ्तारी : एपस्टीन को 6 जुलाई, 2019 को फिर से गिरफ्तार किया गया, इस बार नाबालिगों की यौन तस्करी के आरोपों में। यह गिरफ्तारी नए जांच और उनके पिछले कानूनी सौदों की बढ़ती सार्वजनिक जांच के बाद हुई थी।

4.मौत : 10 अगस्त, 2019 को एपस्टीन न्यूयॉर्क सिटी के मेट्रोपॉलिटन करेक्शनल सेंटर में अपने जेल सेल में मृत पाए गए, और उनकी मौत को फांसी लगाकर आत्महत्या माना गया। हालांकि, उनकी मौत ने कई षड्यंत्र सिद्धांतों को जन्म दिया, खासकर उनके मामले की उच्च प्रोफ़ाइल और उनके साथ जुड़े शक्तिशाली व्यक्तियों के कारण।

5. प्रभाव : एपस्टीन की मौत के बाद उनकी सहयोगी घिसलीन मैक्सवेल पर भी मामले चले और उन्हें उनकी तस्करी योजना में उनकी भूमिका के लिए दोषी ठहराया गया।
      

यह मामला हाल के इतिहास में शक्ति और विशेषाधिकार के दुरुपयोग का एक प्रमुख उदाहरण है, जिसने न्याय और जवाबदेही के गंभीर सवाल उठाए हैं।
यह हमारे समाज के लिए एक चेतावनी है कि हमें उन सभी लोगों के खिलाफ सतर्क रहना चाहिए जो अपनी शक्ति और प्रभाव का दुरुपयोग करते हैं, और हमें न्याय और सच्चाई की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।
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शैतानी ताकतों का अंत: दुनिया को नियंत्रित करने वाले षड्यंत्रकारियों का पर्दाफाश .....

दुनिया के इतिहास में हमेशा से कुछ शक्तिशाली लोग और समूह रहे हैं जो अपनी स्वार्थी महत्वाकांक्षाओं के लिए मानवता को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश करते रहे हैं। जेफरी एपस्टीन जैसा व्यक्ति इस अंधेरे पक्ष का एक प्रतीक बन गया, जो न केवल अपने आपराधिक कृत्यों के लिए बल्कि उन शैतानी ताकतों के लिए भी जो उसकी तरह लोगों को आगे बढ़ाती हैं, जिन्हें दुनिया को अपने जाल में फंसाने का उद्देश्य है। 
एपस्टीन जैसे लोग, जो अपने प्रभावशाली संपर्कों और अपार धन का उपयोग करके समाज के सबसे कमजोर वर्गों का शोषण करते हैं, हमें यह याद दिलाते हैं कि दुनिया पर कब्जा जमाने की कोशिशें केवल राजनीतिक या आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी हो रही हैं। 

शैतानी ताकतों का षड्यंत्र ।
शैतानी ताकतें, जो समाज में अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए हर संभव साधन का उपयोग करती हैं, अक्सर ऐसे व्यक्तियों को आगे करती हैं जो उनके लिए काम करने के लिए तैयार होते हैं। ये ताकतें समाज के नैतिक ताने-बाने को तोड़ने, लोगों के बीच भय और संदेह फैलाने, और एक ऐसी स्थिति पैदा करने का प्रयास करती हैं जहां वे बिना किसी विरोध के दुनिया को नियंत्रित कर सकें।

जेफरी एपस्टीन जैसे लोग उन शैतानी ताकतों के मुखौटे होते हैं, जो पीछे से धागों को खींचते हैं। वे दुनिया की कमजोरियों का लाभ उठाते हैं, और अपने स्वार्थी उद्देश्यों को पूरा करने के लिए नैतिकता और न्याय के मूल्यों को ताक पर रखते हैं। लेकिन आखिरकार, ये षड्यंत्रकारी अपने ही जाल में फंस जाते हैं, क्योंकि उनके अपराधों का पर्दाफाश होना तय है।
अंतिम विराम की शुरुआत :
जब जेफरी एपस्टीन जैसे व्यक्तियों के अपराध उजागर होते हैं, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की हार नहीं होती, बल्कि उन शैतानी ताकतों के खिलाफ भी एक महत्वपूर्ण कदम होता है जो उन्हें आगे बढ़ाती हैं। मानवता ने हमेशा इस प्रकार की चुनौतियों का सामना किया है, और हर बार जब अंधकार ने अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है, तो प्रकाश ने उसे पराजित किया है।

दुनिया को नियंत्रित करने वाली ये शैतानी ताकतें हमेशा यह भूल जाती हैं कि अंततः सत्य और न्याय की विजय होती है। भले ही ये ताकतें समय-समय पर शक्तिशाली नजर आती हैं, लेकिन जब समाज जागरूक होता है, और लोग एकजुट होकर उनके खिलाफ खड़े होते हैं, तो उनके सभी षड्यंत्र ध्वस्त हो जाते हैं।



जेफरी एपस्टीन का मामला हमें यह सिखाता है कि चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, शैतानी ताकतें कभी भी स्थायी रूप से दुनिया को नियंत्रित नहीं कर सकतीं। मानवता के पास नैतिकता, साहस, और एकता की ताकत है, जो इन ताकतों को पराजित करने के लिए पर्याप्त है। अब समय आ गया है कि हम अपनी जिम्मेदारियों को समझें, और उन सभी शैतानी ताकतों के खिलाफ एकजुट होकर खड़े हों, जो हमारी दुनिया को अंधकार में धकेलने का प्रयास कर रही हैं।

यह लेख एक चेतावनी और प्रेरणा दोनों है कि हमें कभी भी उन शक्तियों के सामने झुकना नहीं चाहिए जो दुनिया को अपने स्वार्थी उद्देश्यों के लिए नियंत्रित करना चाहती हैं। न्याय, सत्य, और मानवता की विजय ही हमारा अंतिम लक्ष्य होना चाहिए, और इसके लिए हमें हर संभव प्रयास करना चाहिए।

Wednesday, 15 May 2024

हमे वो लोग चाहिये. . . . . .

Date:10 Dec 2021 
SAFTEAMGUJ.

  हमे वो लोग चाहिये जो हौसला रखते हे.

हमे वो लोग चाहिये जो कुच करने की सोचते हे.

हमे वो लोग चाहिये जो बदलाव के लिये बदलना चाहते हे.

हमे वो लोग चाहिये जो हर मुश्किल हालात मे जिम्मेदारी निभा सकते हे.

हमे वो लोग चाहिये जिनकी चाहत कौम का बेहतरीन मुस्तकबिल(भविष्य) हो.

हमे वो लोग चाहिये जो निडर होकर सच को बोलने और हक के लिये साहसिक हो.

हमे वो लोग चाहिये जो अपना सबकुछ देकर भी अपने आपको छोटा समझता हो.

 हमे वो लोग चाहिये जो हर कदम साथ चलने और रेहना का हुनर रखते हो.

हमे वो लोग चाहिये सच और जुठ की पेहचान करने की महारत रखते हो.

हमे वो लोग चाहिये जो हर वक्त मिल्लत के लिये कुच करने को बेचैन हो.

हम वो लोग चाहिये मुश्किलों का सामना करने के लिये सिना तानकर खरे रहे.

हमे वो लोग चाहिये जो समाज की दशा बदनले के लिये खास दिशा की तलास मे हे.

हमे वो लोग चाहिये जिनमें रब को राजी करने की मजबूत सोच हो.

हमे वो लोग चाहिये जो मुस्तकबिल के लिये अपना आज दावपर लगा सकता हो.

हमे वो लोग चाहिये जमाने की करवाहत को बर्दाश्त करने मे सबर रखता हो.

हमे वो लोग चाहिये जो समस्याओं का समधान करने के लिये संघर्ष करने का हुनर रखते हो.

हमे वो लोग चाहिये झूठ के बहाव को रोककर हक गालिब करने की जद्दोजहद मे लगे हो.

हमे वो लोग चाहिये जो डर और खौफ़ से निकलकर निडरता और होशियारी को अपना हमसफर बनाना चाहते हो.

हमे वो लोग चाहिये जो कुच करने के लिये मकसद की तलास मे हो.

हमे वो लोग चाहिये जो कुच करने के लिये सबसे बेहतरीन मुस्तकबिल की तलास में हे।

हमारे साथे जुडने के लिये हमारे WhatsApp 9898335767 नंबर पर संपर्क करे.

Tuesday, 16 April 2024

EVM और VVPET मशीन पर सुप्रीम कोर्ट और वकील।

Date 16 April 2024  
दोस्तों नमस्कार कल शाम पाँच बजे लोकसभा की एक सौ दो सीटों पर चुनाव प्रचार थम जाएगा क्योंकि इन एक सौ दो लोकसभा सीटों पर उन्नीस तारीख को वोटिंग होगी
और सत्रह तारीख को प्रचार का थमना यानी कल और दो दिनों के बाद यानी उन्नीस तारीख को वोटिंग का होना इन दो तारीख को के बीच में एक तारीख अट्ठारह एप्रिल की है
और अट्ठारह अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट को यह फैसला ईवीएम के बारे में लेना है कि इस देश के भीतर में जो मौजूदा स्थिति ईवीएम को लेकर है उसी रास्ते चुनाव होगा या फिर जो मांग लगातार की जा रही है कि वीवीपैट हंड्रेड परसेंट होना चाहिए और जब कोई
वोटर वोट डालता है तो जो वीवीपैट पर्ची जाती है उसमें दी गई संख्या जानी ईवीएम की संख्या और दूसरी तरफ वीवीपैट में पड़ी पर्ची इन दोनों का मिलान होना चाहिए या नहीं होना चाहिए
तो क्या यह वाकई संभव है कि एक दिन के बाद वोटिंग है और एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट को फैसला देना है आज तकरीबन ढाई तीन घंटे लंबी बहस चली इस बहस के भीतर ले एडवोकेट प्रशांत भूषण एडवोकेट संजय हेगड़े और एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने
जिन बातों को रखा उसने दो तीन मैसेज इस देश के भीतर साफ करती है
पहला सवाल तो यही था कि अंतरराष्ट्रीय तौर पर ईवीएम को लेकर जो भी सवाल जिन भी देशों में उठे क्या वो सवाल गैर वाजिब थे
इस दौर में वोटर अगर अपने हाथों में पर्ची को छू लेगा तो इससे चुनाव आयोग को क्या असर पड जायेगा जब उसे इस बात का अंदेशा है कि वह जिसे वोट दे रहा है ईवीएम के मशीन के बाद व वोट उसे नहीं पढ़ रहे हैं
और तीसरी परिस्थिति है सिर्फ सात सेकेंड के लिए एक लाइट जलती है और उस लाइट के जरिए व देख पाता है कि उसे वोट जिसे दिया है उसे व पर्ची के तौर पर गया है या नहीं गया है
इस सात सेकंड के खेल के भीतर क्या यह संभव नहीं है जो सवाल इस देश के भीतर में है उन सवालों का समाधान सुप्रीम कोर्ट करें चुनाव आयोग को निर्देश दे इतनी बड़ी तादाद में ईवीएम की मशीन पर जो खर्च हुआ पाँच हज़ार करोड़ का तो इस देश के भीतर न तो पैसे
की कमी है और ना ही वक्त की क्योंकि लोकसभा चुनाव दो महीने तक चलेगा
और खुद चुनाव आयोग ने कहा है कि अगर वीवीपैट के जरिए पर्चियों का मिलान ईवीएम से किया जाएगा तो बारह दिन उसकी गिनती में लग जाएंगे तो क्या फर्क पड़ता है बारह दिन की गिनती हो या फिर इस दौर में चुनाव प्रक्रिया को लेकर जो सवाल जनता के भीतर है जो
अलग अलग पोल सर्वे में निकल कर आ रहे हैं यहां तक कि एक हफ्ते पहले जो सीएसडीएस जो कि केन्द्र सरकार द्वारा ग्रांट के जरिए जो संस्था चलती है उसने भी जो ईवीएम को लेकर चुनाव आयोग को लेकर जो सवाल किए व दो हज़ार उन्नीस की तुलना में दो हज़ार चौबिस
में दोगुने से ज्यादा लोग बढ़ गए जिनको विश्वास नहीं है चुनाव आयोग को लेकर या ईवीएम को लेकर लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने तौर पर उस तर्क को खारिज कर दिया कि ऐसे सर्वे को हम नहीं मानते हैं लेकिन इन सबके बावजूद भी एडवोकेट प्रशांत भूषण एडवोकेट
संजय हेगड़े और एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने जो तर्क दिए हमें लगता है आज उन बातों को आपको सुनना चाहिए क्योंकि दो दिन के बाद सुप्रीम कोर्ट को यह फैसला देना है और आज जब ढाई घंटे की तमाम सुनवाई होती रही तो सुप्रीम कोर्ट की आखिरी लाइन यही टी वी विल टेक का कौन थे
विल यू बी हैप्पी विदा प्राइवेट सेक्टर मैन्युफैक्चरिंग मशीन यानी हम गुरुवार को सुनवाई करेंगे और क्या आप निजी क्षेत्र द्वारा मशीन निर्माण से खुश होंगे यहीं पर बहस आकर रुक गई
तो क्या यह माना जाए कि सुप्रीम कोर्ट अट्ठारह तारीख को कुछ और मशीनों के मैन्युफैक्चरिंग का निर्देश किसी प्राइवेट सेक्टर के मशीन निर्माता को दिए सकता है क्या इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट फैसला लेगा
क्या यह मान लिया जाए कि चूंकि एक दिन के बाद ही वोटिंग होनी है तो अब बैलेट पेपर की बात तो दूर की गोटी हो गई लेकिन इस दौर में पचास फीसदी भी वीवीपैट होगा या नहीं होगा क्योंकि बहस के दौर में यह मुद्दा भी उठा कि पचास फीसदी भी हो जाए तो इससे जनता के भीतर एक राहत
महसूस की जायेगी और मानेगा कि हां एक ट्रांसपेरेंट इलेक्शन हो रहा है चुनाव आयोग करा रहा है
इन दोनों परिस्थिति के बीच में कई चीजें राजनीतिक तौर पर इस देश में बड़ी मायने रखती है
और हमें लगता है कि आज उन एक के पन्नों को खोला जाए
उससे पहले चुनाव आयोग को लेकर कल प्रधान मंत्री ने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि चुनाव आयोग में सुधार तो उन्होंने ही किया है
इससे पहले तो न जाने कैसे कैसे चुनाव आयुक्त पार्टियों द्वारा तय हो जाते थे उसके बाद व पार्टियों के चुनाव पर युद्ध पर चुनाव लड़ लेते थे यानी को पार्टी मेम्बर होते थे और चुनाव आयोग उन्हें बना दिया जाता था उन्होंने ही सुधार किया कि जब विपक्ष के नेता की भी मौजूदगी चुनाव
आयुक्त की नियुक्ति को लेकर होगी
प्रधानमंत्री ने यह क्यों कहा जबकि उससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने जिस पैनल का जिक्र किया था उस पैनल में प्रधानमंत्री देश के चीफ जस्टिस और विपक्ष के नेता की मौजूदगी के रहने को सही बताया गया था लेकिन एक झटके में महीने भर के भीतर पार्लियामेंट में
विधेयक लाकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलट दिया गया और कहा गया जी नहीं चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में चीफ जस्टिस का क्या का तो प्रधानमंत्री करेंगे और प्रधान मंत्री द्वारा नियुक्त कोई कैबिनेट मिनिस्टर रहेगा और एक विपक्ष का नेता रहेगा और इस बार भी चुनाव ऐलान के ऐन पहले जो दो चुनाव आयुक्तों
की नियुक्ति हुई उस पर विपक्ष के नेता के तौर पर अधीर रंजन चौधरी ने खुल्लम खुल्ला कह दिया कि देखिए सब फिक्स है
लेकिन फिर भी आज आप सुन लीजिए चुनाव आयोग के बारे में प्रधानमंत्री की राय है क्या हमने इलेक्शन कमीशन में सुधार किया है
आज इलेक्शन कमीशन बनता है तो कोई दूसरा होता है पहले तो प्रधानमंत्री एक फाइल पर साइन कर गए इलेक्शन कमीशन बना दे
और जो उनके परिवार में निकट जुड़े ऐसे मिले हैं
कमीशन मध्यम गर्मी बढ़ेगी
ऐसे लोग इलेक्शन कमीशन बने रहें जो वहां से निकलने के बाद राज्यसभा मेंबर बने उनके सरकार के मिनिस्टर बने ऐसे इलेक्शन कमिश्नर बनर्जी जो कांग्रेस के बाद में कैंडिडेट बने और इसलिए
हम उस लेवल पे ले नहीं कर सकते हैं
हमारा लेवल प्रभेद हो ही नहीं सकता हम ऐसे बनी नहीं रण में हम अच्छे रास्ते भर जाना चाहते हैं गुजरात में जाना जाता है
दूसरी बात है
आखिर ईडी सीबीआई जैसे बड़ी दीदी वगैरह का दर्द आप देखेंगे
कमीशन अपने कहावत है
नाथ न जाने आंगन रहा
इसलिए कभी ईवीएम का बहाना कर देंगे कभी मूलतः
पराजय के लिए वो कुछ
रीजनिंग अभी से सेट करने में लगे
तो प्रधान मंत्री का कहना है नाच न जाने आंगन टेढ़ा इस देश के भीतर चुनाव होने जा रहे दो तीन दिनों के भीतर वोटिंग शुरू हो जाएगी
राजनीतिक तौर पर इस देश के भीतर विपक्ष के तमाम पॉलिटिकल पार्टीज और जनता के भीतर ईवीएम को लेकर सवाल है
और ईवीएम को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कोई सवाल नहीं है
जब चुनाव का ऐलान हो रहा था उस वक्त भी जब चुनाव आयोग से यह पूछा गया तो उन्होंने शायरी भरे अंदाज में इस बात को टाल दिया और आज कल प्रधानमंत्री ने हिन्दी मुहावरे की तर्ज पर नई चीजें गढ़ने की कोशिश की लेकिन सच क्या है और आज सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ
दरअसल इस देश के भीतर जो वीवीपैट की स्थिति है उसमें औसतन हर कॉन्फ्रेंसिंग में लगभग पाँच सौ
ईवीएम होती है और वीवीपैट की व्यवस्था उसमें से पाँच में होती है यह एवरेज है
लेकिन अगर एवरेज का मतलब हुआ सिर्फ एक परसेंट वीवीपैट की व्यवस्था है लेकिन पूरे देश के ऐवरेज में जवाब जिक्र कीजिएगा तो इस देश के भीतर जितनी वीवीपैट की व्यवस्था है वह प्वाइंट जीरो जीरो वन एक फाइव परसेंट है
यही स्थिति है
के भीतर में वीवीपैट को लेता है और यही सवाल आज इस बात को लेकर उठा और याद कीजिए पंद्रह दिन पहले यही मुद्दा जस्टिस गवई की अदालत में गया था
जो एडवोकेट अग्रवाल के जरिए उठाया गया था उस वक्त बकायदा नोटिस जस्टिस गवई ने इलेक्शन कमीशन को दे दिया था आज एडीआर का मामला और एडवोकेट अग्रवाल का मामला दोनों मामले को क्लब करके जस्टिस संजीव खन्ना की अदालत में लाया गया जहां पर इन तीन वकीलों ने सवाल जवाब के
बाद अपनी बात को रखना शुरू किया हमें लगता है उन बातों को सुन लीजिए क्योंकि शुरुआत इसी से हुई कि हम यह नहीं कह रहे हैं कि इस ईवीएम में हेरफेर किया गया
हम कह रहे हैं कि उसमें हेर फेर किया जा सकता है क्योंकि ईवीएम और वीवीपैट दोनों में दो तरह के चुप होते हैं
मैं पहली मेमरी जिसमें प्रोग्राम किया जा सकता है और एक फ्लैश मेमोरी जिसका उपयोग सिम्बल लोडिंग के वक्त किया जाता है और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में प्रतीकों का क्रम अलग अलग होगा और वीवीपैट को प्रतीक के साथ पर्ची प्रिंट करनी होगी और प्रत्येक मशीन में एक प्रोग्राम स्थापित करना
होगा जो यह बताएगा कि यदि नंबर तीन बटन दबाया जाता है तो पर्ची में प्रतीक भी वही दिखाई दे जाए तो यह प्रोग्राम योग्य चिप कही जाती है कोर्ट ने इसके बाद पूछा कि प्रतीक लोडिंग फ्लैश मेमोरी में होती है और यह प्रोग्राम करने योग्य है जो दूसरी तरफ से इन तीन वकीलों का
था इसीलिए आप दुर्भावनापूर्ण प्रोग्राम इंस्टॉल कर सकते हैं यह सवाल उठा यानी मशीन गलत नहीं है उसमें जो इंस्टॉल कर रहा है वह गलत हो सकता इस पर सहमति थी कि मशीन गलत नहीं होती है उसमें जो आप इंस्टॉल कर दीजिएगा वही गलत होगा और इसी को लेकर सवाल फिर इन तीन वकीलों की तरफ से उठा कि
था काश यानी दुनिया के अधिकांश देशों और खासतौर से यूरोपीय देशों में पेपर पर्चियां वापस लौट आई है
तब अदालत ने कहा उस बात का जिक्र करने की जरूरत नहीं तब को अदालत को बताया गया जर्मनी में तो बकायदा इस बात को कहा गया कि ईवीएम पर भरोसा नहीं किया जा सकता तब पूछा गया कि दरअसल जर्मनी की जनसंख्या कितनी है तो कहा गया पाँच छः करोड़ तो वाले भारत भारत में तो पचानवे छियानवे करोड़
रजिस्टर्ड वोटर हो चले हैं यहां चीजें कैसे होंगी तब तीन वकीलों की तरफ से कॉमेंट और आया कि सवाल यह है कि डेमोक्रेसी और चुनाव के बीच में अगर मतदाता को ये एहसास हो जाए कि उसका वोट सही है और सही तरीके से गणना होगी जहां डाला वहीं पड़ा है यह महत्वपूर्ण है या जनसंख्या महत्वपूर्ण
और इन सबके बीच यह भी जानकारी इन तीन वकीलों ने अदालत को दी कि यहां तक भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि आपको पेपर रोल रखना होगा क्योंकि ईवीएम पर भरोसा नहीं किया जा सकता इसीलिए तो वीवीपैट की व्यवस्था की गई और फिर भी प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में पांच
वीवीपैट मशीनों का नमूना लिया गया
और ऐसे में यदि कोई बेमेल है यानी प्रोटोकॉल यह कहता है कि यदि बेमेल वाले निर्वाचन क्षेत्र के अलावे बाकी निर्वाचन क्षेत्र में अंतर उस मतदान केंद्र में मतदाताओं की कुल संख्या से अधिक है तो आप बेमेल को नजरअंदाज कर सकते हैं और ऐसे में या तो दोबारा गिनती कि अगर
स्थिति आती है तो वीवीपैट की गिनती ईवीएम की गिनती पर भारी हो जाए
यानी वीवीपैट की महत्ता बढ़ जाएगी क्योंकि ईवीएम को लेकर सवाल तो पहले से है लेकिन बात यहीं नहीं रुकी दरअसल यह पूरा का पूरा डॉक्यूमेंट इस बात को बतलाता है कि इन सबके बीच जब इन बातों का जिक्र किया जा रहा था तो उसमें एक चीज और थी कि क्या इस चीजों को नजरअंदाज किया जा सकता है और ऐसे
में वक्त थोड़ा बढ़ाया गया और कहा कि आप लंच के बाद हमलोग डिस्कशन करेंगे
और उसके बाद जब हुआ
तब एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कहा हम बैलेट पेपर पर लौट सकते हैं एक और ऑप्शन है कि वोटर्स को वीवीपैट की स्लिप दे दी जाए नहीं तो स्लिप मशीन में जाएगी और यह असली वोटर को दी जा सकती है जो इसे बैलेट बॉक्स में डालेगा
तब कोर्ट ने का ठीक हम आपकी दलील समझ गए तब जस्टिस जवाब देते हुए वकील ने कहा संजय हेगल ने कहा कि दरअसल ईवीएम में पड़े वोट का वीवीपैट स्लिप के साथ मिलान किया जाना चाहिए इतनी सी बात है तब अदालत ने का तो क्या साठ करोड़ वोटों की स्लिप का मिलान ईवीएम
के साथ किया जाएगा तब इस पर गोपाल शंकर नारायण जो एडवोकेट थे उनका कहना है हाँ अदालत ने कहा है बारह दिन लगेंगे
तो बारह दिन लगेंगे तो क्या यह वाकई बहुत ज्यादा है जब दो महीने से ज्यादा वक्त चुनाव में लग रहा है
और जब
आप बता रहे हैं कि एक परसेंट ही वीवीपैट की व्यवस्थाएं तो इसको कैसे सही ठहराया जा सकता है
इस पर एडवोकेट गोपाल शंकर ने कहा कि दरअसल याचिका में बहुत साफ तौर पर लिखा गया में ईवीएम की गड़बड़ी का जिक्र नहीं कर रहे हैं यह तो वोटिंग के दौरान वोटर के भरोसे का सवाल है यानी इस देश के वोटर में भरोसा है या नहीं है यह सवाल बड़ा महत्वपूर्ण है और किसी दूर दराज इलाके में रहने वाले
आदमी के बारे में भी सोच लीजिए जो वोटिंग बूथ में संघर्ष करता है और स्लिप तभी दिखाता है जब सात सेकंड के लिए लाइट ऑन होती है तो वोट डालने में जो स्पर्श का एहसास होता है बैलेट पेपर के जरिए व पूरी तरह खत्म हो चुका है और इसी आधार पर जर्मनी के भीतर
फैसला दिया गया था तो क्या यही यहां पर फैसला नहीं लागू किया जा सकता है
अगर ध्यान दीजिए इस दौर में और इसके ठीक समानांतर इलेक्टोरल बॉन्ड को याद कर लीजिए तो इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर जो सवाल लगातार एटॉर्नी जनरल उठा रहे थे वह भी वैसा ही सवाल था जिसमें इस देश के वोटरों को जानकारी नहीं दी जानी चाहिए कि दरअसल पैसा किसने दिया कि से
दिया
और शायद यह ऐसी प्रक्रिया है इस देश के भीतर में जहां पर पहली बार सवाल सुप्रीम कोर्ट को लेकर इसलिए हो रहा है क्योंकि चीफ जस्टिस की अदालत में इलेक्टोरल बॉन्ड पर फैसला दिया और एक झटके में इस देश के भीतर में वो तमाम कच्चा चिट्ठा निकलकर सामने आ गया कि किसने किस पार्टी
को पैसा दिया और उसका पूरा ट्रॉयल समझ में आया तो यह मान लिया गया कि इससे बड़ा स्कैन कुछ हो नहीं सकता है
लेकिन ध्यान दीजिए जो अदालत में एटॉर्नी जनरल इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर कह रहे थे और आज जो सवाल
तीन एडवोकेट्स उठा रहे थे और कोर्ट ने खामोशी बढ़ते हुए कहा कि हम अट्ठारह को सुनवाई करेंगे तो ऐसे में प्रधानमंत्री से भी जब इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर उनके इंटरव्यू में पूछा गया था तो उन्होंने क्या कहा था उन्होंने कहा था कि दरअसल देखें ये इलेक्टोरल बॉन्ड की खासियत है कि पता चल गया
मनी ट्रेल पता चल गया लेकिन सवाल यह तो सुप्रीम कोर्ट के जरिए पता चला और सुप्रीम कोर्ट के जरिए पता चला और प्रधानमंत्री यह भी कह गए कि उससे पहले पता ही नहीं चलता था तो उससे पहले पता चलता था हमें लगता यह बात हमें आज आपको बतानी चाहिए कि उससे पहले जब इलेक्टोरल बॉन्ड नहीं था उससे पहले की क्या स्थिति थी और प्रधान
स्त्री जब इन बातों का जिक्र कर रहे हैं तो इसका मतलब मायने क्या माना जाए प्रधानमंत्री ने क्या कहा इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर भी जरूर सुनी है
अब देखिए इलेक्टोरल बॉन्ड न होते हैं
तो क्रिस व्यवस्था मतदाता थे कोर्ट रूम के निकालते है कि पैसा कहां से आए और कहा गया है
जितने इलेक्टोरल बॉन्ड सक्सेस स्टोरी है
इलेक्टोरल बॉन्ड थे
आपको ट्रेन मिल रहा है मनिका
जिस कंपनी में भी दिया कैसे दिया कहा दिया तो प्रधान मंत्री ने इलेक्टोरल बॉन्ड को भी अपने हक में बता दिया जबकि पहली बार इस देश के भीतर में संसद द्वारा पास किए गए किसी निर्णय को असंवैधानिक करार दिया सुप्रीम कोर्ट ने यानी इलेक्ट
बॉन्ड पूरे तरीके से गैर कानूनी सुप्रीम कोर्ट ने करार दिया और चूंकि चुनाव का वक्त है और राजनीतिक तौर पर ये मुद्दे प्रधानमंत्री जो कह रहे लेकिन इसके ठीक समानांतर अगर आप राहुल गांधी को सुनेंगे
वो तमाम जगहों पर घूम घूमकर बता रहे हैं कि दरअसल प्रधानमंत्री अपने इंटरव्यू में भी क्यों झूठ बोल रहे हैं या जिन बातों को कह रहे हैं वो किस तरीके से गलत है और केरल में चुनाव प्रचार के पट पत्रकार का सवाल हो क्योंकि इंटरव्यू एएनआई को दिया गया तो एएनआई के
बाइक को देखकर ही राहुल गांधी जो जवाब देते हैं और उसके बाद पब्लिक के बीच में जाकर जो वह विरोध करते हैं कि प्रधानमंत्री ने क्या कहा एक क्षण के लिए पूरे दृश्य को जरूर देखना चाहिए
अगर आप नाम और तारीख को देखोगे तो आपको पता लगेगा
आपको पता लगेगा
कि
जब उन लोगों ने इलेक्टोरल बॉन्ड दिया है
उसी के एकदम बाद एकदम बाद उनको या तो कॉन्ट्रैक्ट मिला है
या फिर जो सीबीआई का उन पर इंक्वायरी हो रही थी
वहां टाइम तो ये पड़ा था
मंत्री पकड़े गए हैं इसीलिए हैं
एनआईए को इंटरव्यू दे रहे हैं
पकड़े गए हैं
दुनिया का सबसे बड़ा एक संरक्षण स्कीम है और इसके मास्टर माइंड नरेंद्र मोदी जी
अगर आप उनकी आंखों में देख मैंने देखा नहीं है मगर अगर आप उनके हैं किंतु उनकी आंखों में देखेंगे तो आपको झलक दिख जाएगी
जाए
है
है
क्यों नहीं है
है
का हाल
एक सौ तीन कृष्ण
है
आए हैं
है
यानी जनता के बीच सरकार के निर्णय प्रधानमंत्री का इंटरव्यू भी मुद्दा बन सकता है यह अंदेशा इससे पहले जाहिर है मोदी सरकार को रहा नहीं होगा
लेकिन सवाल उसके आगे कहा हमने दरअसल ईवीएम और इलेक्टोरल बॉन्ड दोनों का जिक्र इसलिए किया क्योंकि इस देश के भीतर में सुप्रीम कोर्ट आरबीआई और फाइनेंस मिनिस्ट्री के भीतर से भी जो सवाल उस दौर में उठे थे जब बॉन्ड आया था
और जब ईवीएम को लेकर पहली बार इस देश के भीतर में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया तब कांग्रेस की सरकार थी उस समय बीजेपी विरोध में थी और उसी ने यह सवाल उठाया था यानी परिस्थितियों का उलटना देखी और राजनीतिक सत्ता के जरिए अपने अनुकूल की परिस्थिति को
सही बताने के लिए संवैधानिक संस्थानों के इस्तेमाल को भी देखिए और चूंकि हम यहां पर ईवीएम के समानांतर इलेक्टोरल बॉन्ड का जिक्र आपसे कर रहे हैं तो जरा यह समझ यह जब इलेक्टोरल बॉन्ड नहीं था क्योंकि इससे पहले यह भी सवाल आएगा जब ईवीएम नहीं थी तब कौन सी परिस्थिति थी बूथ लूटने जाते थे कितने दिन पहले
पेपर को गिनने में वक्त लगता था तीन दिन लगता था फैसले तीन से चौथे दिन में आ जाते थे लेकिन एक क्षण के लिए सोचिए कि जब इलेक्टोरल बॉन्ड भी नहीं था इलेक्ट्रोड ट्रस्ट टाटा ने उन्नीस सौ छियानवे में बनाया बिरला ने उन्नीस सौ अट्ठानवे में बनाया और जिस बात का जिक्र किया जा रहा है कि उस वक्त पता नहीं चलता था पैसा का
हा से किस रूप में गया तो सिंगुर में नैनो फैक्ट्री को लेकर ममता से झगड़ा टाटा का हुआ बावजूद इसके टाटा ट्रस्ट ने सत्ताईस लाख रुपए
एमसी को दिए सीपीएम ने मना कर दिया और डोनेशन उसने नहीं लिया उसी दौर में अगर याद कीजियेगा तो शिवसेना ने डोनेशन के लिए दरवाजा खटखटाया था और समाजवादी पार्टी ने भी टाटा का दरवाजा खटखटाया था तो ट्रस्ट जब बना था तो उसके जरिए पैसों की आवाजाही किस कंपनी के जरिए
रही है यह जानकारी होती थी और दो हज़ार नौ दस में यह निर्णय लिया गया था कि सौ फीसदी टैक्स माँ जो भी इलेक्टोरल ट्रस्ट के जरिए पैसा देगा और दो हज़ार छः से लेकर दो हज़ार बारह के बीच में कांग्रेस के पास कुल एक हज़ार छः सौ बासठ करोड़ रुपए गए और बीजेपी के पास
आठ सौ बावन करोड़ रुपये का एक बरस दर बरस का डाटा इलेक्शन कमीशन के पास है फाइनेंस मिनिस्ट्री के पास है
चुनाव आयोग ने बकायदा पार्टियों से लिया हुआ है बरस दर बरस देखिएगा तो ग्यारह दो हज़ार ग्यारह बारह के फाइनेंशियल ईयर में कांग्रेस के पास तीन सौ साठ करोड आते हैं बीजेपी के पास एक सौ अड़सठ करवाते आते हैं
दो हज़ार दस ग्यारह में चार सौ अड़सठ करोड़ कांग्रेस के पास आते हैं दो सौ अट्ठावन करोड़ बीजेपी के पास आते हैं इसी तरीके से बरस बरस हर चीज का जिक्र है और इतना ही नहीं इस दौर के भीतर में उस दौर में क्या कुछ हो रहा था दो हज़ार नौ में आदित्य बिड़ला ग्रुप ने तीस करोड़ रुपए जो मैक्सिमम था उसमें
बीजेपी को सोलह करोड़ साठ लाख दिए कांग्रेस को तेरह करोड़ पचानवे लाख दिए इस दौर में भी आदित्य बिड़ला ग्रुप ने दिया है तो सवाल ऐसा नहीं है कि उस वक्त नहीं पता चलता था पता चल जाता है पता उस वक्त भी चलता था और शायद यही वजह है कि जब आप चीजों को परखेंगे और देखेंगे तो उसमें आप
को एक के चीन की जानकारी आएगी छत्तीस कॉर्पोरेट ने एक करोड़ या उससे ज्यादा राजनीतिक चंदा पॉलिटिकल पार्टीज को दिया था दो हज़ार नौ में एशिया ने टीवी होल्डिंग ने साढ़े बारह करोड़ दिए थे टोरेंट पावर जिसके साथ तमाम अलग अलग कॉर्पोरेट जुड़े थे साढ़े दस फोड़ दिए थे टाटा इलेक्टोरल ट्रस्ट ने नौ कोड
तलाक सारी जानकारी है भारतीय इलेक्टोरल ट्रस्ट जो भारती ग्रुप जो एयरटेल का है उसने भी बनाया उसमें भी छत्तीस कंपनियां थीं जिन्होंने एक करोड़ से ज्यादा पैसा दिया था जानकारी सब निकलती थी और सवाल यह था कि जब इलेक्टोरल बॉन्ड आ रहा था उस वक्त जो सुप्रीम कोर्ट कह रहा था जो आरबीआई कह रही थी और चुनाव
आयोग भी जो कह रहा था कि ब्लैक मनी को बढ़ावा मिलेगा क्या वह पन्ने खोलने की जरूरत नहीं है या फिर जब ईवीएम को लेकर पहली बार दो हज़ार आठ नौ में जो सवाल पहुंचा अदालतों के भीतर में और बीजेपी के भीतर से आवाज उठी उसमें जो सवाल थे वह सवाल मायने नहीं रखते हैं क्योंकि बीजेपी सत्ता में है यानी इस दौर में वोट
का ध्यान नहीं है और आज तीनों वकीलों ने इसी बात पर जोर दिया कि सवाल उम्मीदवारों का नहीं है सवाल इस देश के वोटरों का है उम्मीदवार में तो चालीस पर्सेंट से ज्यादा आपराधिक छवि के हैं उनके हलफनामे बतलाते हैं कौन करप्ट है इस पर आपराधिक मामले चल रहे हैं लेकिन वोटरों के बारे में सोचिए
और सुप्रीम कोर्ट से यही आग्रह किया गया कि आप हर हाल में वोटरों के बारे में सोचिए आखिर में एक सवाल आपके जहन में जरूर आएगा जब कल इक्कीस रिटायर्ड जजों ने एक पत्र दिया था और सुप्रीम कोर्ट से यह कहा था कि देखिए यहां पर जिस तरीके
इससे काम होता है उसमें ऐसा लगता है कि संकीर्ण राजनीतिक हितों और व्यक्तिगत लाभ के लिए न्यायपालिका को कमजोर और न्यायिक प्रणाली पर जनता के विश्वास को कम करने का प्रयास किया जा रहा है
उसमें साइन करने वालों में सुप्रीम कोर्ट के चार पूर्व जज भी थे जस्टिस दीपक वर्मा जस्टिस कृष्ण मुरारी जस्टिस दिनेश माहेश्वरी जस्टिस एमआर शाह उसमें दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एसएन ढींगरा और के गौबा ज्ञान प्रकाश मित्तल अजीत भर योग इलाहाबाद हाईकोर्ट के भी तीन थे राजेश कुमार श्रीवास्तव राजीव
मुंबई हाईकोर्ट के भी एक थे अम्बा दास जोशी गुजरात हाईकोर्ट के भी एक थे जस्टिस एफएम सोनी इन सवालों के बीच में पूछा कि आप ऐसा क्यों कह रहे हैं तो जस्टिस एसएन ढींगरा ने कैमरे पर कहा देखिए किस तरीके से अदालत को प्रभावित किया जाता और अदालत के भी
वकील जीरा करते करते कहते हैं कि इतिहास आपको माफ नहीं करेगा इसके क्या मतलब है दरअसल यह मामला अरविंद केजरीवाल को लेकर था जहाँ पे जो फैसला दिया जा रहा था उसको लेकर एडवोकेट जो जिरह कर रहे थे उन्होंने सवाल खड़ा किया था उन्होंने क्या कहा सुनी है यह कल कही हुई बात
है लेकिन सुनना चाहिए
कई के सीनियर वकील जो एक
आइडियोलॉजी से बिलॉन्ग करते हैं या पार्टी को रिप्रेजेंट करते हैं
वो जो है केस में जब उनके मन मुताबिक फैसला नहीं होता तो वह बजाय यह बताने के के फैसले में क्या कमी है
ग़ैर क़ानूनी कमी है वो नहीं बताते हैं ना ही उसके ऊपर उनकी होते हैं
है कोर्ट में भी वह पैसा एक्सचेंज जुडीशियल बहस करते हैं कानून के ऊपर बैठ नहीं करते कि यह रैली की जाएगी ये हो जाएगा देख टूट जाएगा इस तरह की बहस करते हैं और दबाव बनाते हैं कि कैसे धर्म संकट में फंसा हुआ है और रूस को बचाना मुश्किल
रहेगा
नहीं तो रीसेंट है
अभी एक सीनियर वकील को मन मुताबिक फैसला नहीं हुआ तो कोर्ट में ही बोल दिया के रिश्ते नाते टेक गाइड फॉर न्यू लुक फाउंडेशन
भूतनाथ का इंटरव्यू अभी क्या है
क्या एक है पर टायरों के जज को के इतिहास को माफ नहीं करेगा
दरअसल जस्टिस ढींगरा जिस एडवोकेट का जिक्र कर रहे हैं वह एडवोकेट सिंह भी हैं जो अपने तर्क में उन्होंने अपनी बात रखी
लेकिन सवाल इस दौर में यह नहीं है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता या न्यायपालिका को लेकर जो सवाल इस देश के भीतर उठ रहे हैं या प्रधानमंत्री ने अपने इंटरव्यू में कहा जब चुनाव आयुक्तों को भी इस देश के भीतर में राजनीतिक तौर पर चुनाव तक लगाया गया तो कोई भी पूछ सके
आता है क्या इससे पहले इस देश में कोई ऐसे चीफ जस्टिस थे

Friday, 5 April 2024

केंद्र ने 62% नए सैनिक स्कूलों को संघ परिवार, भाजपा राजनेताओं और सहयोगियों को सौंप दिया।

इसका अंग्रेजी खबर से हिंदी किया गया हे।

केंद्र ने 62% नए सैनिक स्कूलों को संघ परिवार, भाजपा राजनेताओं और सहयोगियों को सौंप दिया।

रक्षा मंत्रालय के मार्गदर्शन में चलने वाले सैनिक स्कूल, भारत के सशस्त्र बलों में कैडेट भेजते हैं। हालाँकि, नई पहल भविष्य के कैडेटों को प्रशिक्षित करने के लिए वैचारिक रूप से झुके हुए संगठनों पर निर्भर करती है।


नई दिल्ली: देश के पवित्र शहरों में से एक, वृन्दावन में, हिंदू राष्ट्रवादी विचारक साध्वी ऋतंभरा लड़कियों के लिए एक स्कूल, संविद गुरुकुलम गर्ल्स सैनिक स्कूल चलाती हैं। विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की महिला शाखा, दुर्गा वाहिनी की संस्थापक, वह राम मंदिर आंदोलन में एक प्रमुख व्यक्ति थीं। 

पिछले साल जून में एक स्कूल कार्यक्रम के दौरान, 60 वर्षीय भगवाधारी महिला एक व्यक्तित्व विकास शिविर के दौरान छात्रों को 'सम्मान', परंपराओं और रीति-रिवाजों के बारे में संबोधित करने के लिए मंच पर आती है। स्कूल के फेसबुक पेज पर साझा किए गए एक वीडियो में , ऋतंभरा को यह टिप्पणी करते हुए देखा जा सकता है कि कॉलेजों और सोशल मीडिया में लड़कियां कैसे "नियंत्रण से बाहर" हैं।

“हमें कॉलेजों में क्या मिलता है? आधी रात को सिगरेट पीती लड़कियाँ. शिक्षा के इन केंद्रों में महिलाएं शराब की बोतलें तोड़ रही हैं और मोटरसाइकिल पर अपने बॉयफ्रेंड के साथ अभद्रता फैला रही हैं... हमने कभी नहीं सोचा था कि भारत की बेटियां इतनी बेकाबू हो जाएंगी. वे सोशल मीडिया पर गाली-गलौज वाली रीलें पोस्ट कर रहे हैं. वे न्यूड फोटोशूट करा रहे हैं. वे अंडरगारमेंट्स में अपने शरीर का प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि ये महिलाएं मानसिक रूप से बीमार हैं... इन लड़कियों में संस्कार नहीं हैं,'' ऋतंभरा कहती हैं।


शासन
केंद्र ने 62% नए सैनिक स्कूलों को संघ परिवार, भाजपा राजनेताओं और सहयोगियों को सौंप दिया।
रक्षा मंत्रालय के मार्गदर्शन में चलने वाले सैनिक स्कूल, भारत के सशस्त्र बलों में कैडेट भेजते हैं। हालाँकि, नई पहल भविष्य के कैडेटों को प्रशिक्षित करने के लिए वैचारिक रूप से झुके हुए संगठनों पर निर्भर करती है

आस्था सव्यसाची
3 अप्रैल 2024

तस्वीर: 
नितिन सेठी/एआई

नई दिल्ली: देश के पवित्र शहरों में से एक, वृन्दावन में, हिंदू राष्ट्रवादी विचारक साध्वी ऋतंभरा लड़कियों के लिए एक स्कूल, संविद गुरुकुलम गर्ल्स सैनिक स्कूल चलाती हैं। विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की महिला शाखा, दुर्गा वाहिनी की संस्थापक, वह राम मंदिर आंदोलन में एक प्रमुख व्यक्ति थीं। 

पिछले साल जून में एक स्कूल कार्यक्रम के दौरान, 60 वर्षीय भगवाधारी महिला एक व्यक्तित्व विकास शिविर के दौरान छात्रों को 'सम्मान', परंपराओं और रीति-रिवाजों के बारे में संबोधित करने के लिए मंच पर आती है। स्कूल के फेसबुक पेज पर साझा किए गए एक वीडियो में , ऋतंभरा को यह टिप्पणी करते हुए देखा जा सकता है कि कॉलेजों और सोशल मीडिया में लड़कियां कैसे "नियंत्रण से बाहर" हैं।

“हमें कॉलेजों में क्या मिलता है? आधी रात को सिगरेट पीती लड़कियाँ. शिक्षा के इन केंद्रों में महिलाएं शराब की बोतलें तोड़ रही हैं और मोटरसाइकिल पर अपने बॉयफ्रेंड के साथ अभद्रता फैला रही हैं... हमने कभी नहीं सोचा था कि भारत की बेटियां इतनी बेकाबू हो जाएंगी. वे सोशल मीडिया पर गाली-गलौज वाली रीलें पोस्ट कर रहे हैं. वे न्यूड फोटोशूट करा रहे हैं. वे अंडरगारमेंट्स में अपने शरीर का प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि ये महिलाएं मानसिक रूप से बीमार हैं... इन लड़कियों में संस्कार नहीं हैं,'' ऋतंभरा कहती हैं।


साध्वी ऋतंभरा 21 जून, 2023 को एक व्यक्तित्व विकास शिविर में संविद गुरुकुलम गर्ल्स सैनिक स्कूल के छात्रों को संबोधित करती हैं। [स्रोत: स्कूल का फेसबुक पेज]

वृन्दावन में उनका गर्ल्स स्कूल और दूसरा, सोलन, हिमाचल प्रदेश में राज लक्ष्मी संविद गुरुकुलम हाल ही में कम से कम 40 स्कूलों की सूची में शामिल हो गए हैं, जिन्होंने सैनिक स्कूल सोसाइटी (एसएसएस) के साथ एक स्वायत्त निकाय के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओए) पर हस्ताक्षर किए हैं। रक्षा मंत्रालय (MoD), सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत सैनिक स्कूल चलाएगा। 

2021 में, केंद्र सरकार ने भारत में सैनिक स्कूल चलाने के लिए निजी खिलाड़ियों के लिए दरवाजे खोल दिए। उस वर्ष अपने वार्षिक बजट में, सरकार ने पूरे भारत में 100 नए सैनिक स्कूल स्थापित करने की योजना की घोषणा की। 

एसएसएस निर्दिष्ट बुनियादी ढांचे वाले किसी भी स्कूल - भूमि, भौतिक और आईटी बुनियादी ढांचे, वित्तीय संसाधन, कर्मचारी इत्यादि - को संभावित रूप से नए सैनिक स्कूलों में से एक के रूप में अनुमोदित किया जा सकता है। अनुमोदन नीति दस्तावेज़ के अनुसार, बुनियादी ढाँचा ही एकमात्र निर्दिष्ट मानदंड था जो किसी स्कूल को अनुमोदन के लिए पात्र बनाता था। इस सीमा ने संघ परिवार से जुड़े स्कूलों और समान विचारधारा वाले संगठनों को आवेदन करने में सक्षम बनाया।

केंद्र सरकार की प्रेस विज्ञप्तियों और सूचना के अधिकार (आरटीआई) के जवाबों से एकत्रित जानकारी एक चिंताजनक प्रवृत्ति दिखाती है। हमारे निष्कर्षों से पता चलता है कि अब तक हुए 40 सैनिक स्कूल समझौतों में से कम से कम 62% राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उसके सहयोगी संगठनों, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राजनेताओं, उसके राजनीतिक सहयोगियों और दोस्तों, हिंदुत्व से जुड़े स्कूलों को दिए गए थे। संगठन, व्यक्ति और अन्य हिंदू धार्मिक संगठन। 

जबकि सरकार को उम्मीद है कि नए पीपीपी मॉडल से सशस्त्र बलों के लिए भर्ती पूल को बढ़ावा मिलेगा, राजनीतिक खिलाड़ियों और दक्षिणपंथी संस्थानों को सैन्य पारिस्थितिकी तंत्र में लाने वाली पहल ने चिंताएं बढ़ा दी हैं।

सैनिक स्कूल शिक्षा प्रणाली के इतिहास में, यह पहली बार था जब सरकार ने निजी खिलाड़ियों को एसएसएस से संबद्ध होने, " आंशिक वित्तीय सहायता " प्राप्त करने और अपनी शाखाएं चलाने की अनुमति दी। 12 अक्टूबर, 2021 को, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने एक कैबिनेट बैठक का नेतृत्व किया , जिसमें स्कूलों को "एक विशेष वर्टिकल के रूप में चलाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई, जो रक्षा मंत्रालय के मौजूदा सैनिक स्कूलों से अलग और अलग होगा।"
नीति दस्तावेज़ के अनुसार , सरकार एसएसएस के माध्यम से, “वर्ग की 50% ताकत के लिए 50% शुल्क (प्रति वर्ष 40000/- रुपये की ऊपरी सीमा के अधीन) का वार्षिक शुल्क समर्थन प्रदान करती है। मेरिट-कम-मीन्स के आधार पर, कक्षा 6 से कक्षा 12 तक प्रति वर्ष 50 छात्र) , जिसका अर्थ है, ऐसे स्कूल के लिए जहां 12वीं कक्षा तक कक्षाएं हैं, एसएसएस प्रति वर्ष अधिकतम 1.2 करोड़ रुपये का समर्थन प्रदान करता है छात्रों को आंशिक वित्तीय सहायता के रूप में दिया जाता है। स्कूलों को दिए जाने वाले अन्य प्रोत्साहनों में "12वीं कक्षा में छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन के आधार पर सालाना प्रशिक्षण अनुदान के रूप में 10 लाख रुपये की राशि दी जाती है।" 

सरकारी समर्थन और प्रोत्साहन के बावजूद, रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने पाया कि वरिष्ठ माध्यमिक के लिए वार्षिक शुल्क नाममात्र 13,800 रुपये प्रति वर्ष से लेकर 2,47,900 रुपये तक है , जो नए सैनिक स्कूलों की शुल्क संरचनाओं में एक महत्वपूर्ण असमानता का संकेत देता है।

नए सैनिक स्कूल कौन चलाएगा?
नई नीति तक, देश में 16,000 कैडेटों के लिए 33 सैनिक स्कूल मौजूद थे और एसएसएस इसकी मूल संस्था के रूप में कार्य करता था। एसएसएस रक्षा मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संगठन है। कई सरकारी रिपोर्ट रक्षा संस्थानों में कैडेटों को भेजने में सैनिक स्कूलों के महत्व की ओर इशारा करती हैं। रक्षा संबंधी स्थायी समितियों ने अक्सर राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) और भारतीय नौसेना अकादमी के लिए कैडेटों को तैयार करने में सैनिक स्कूलों की भूमिका पर जोर दिया है। 2013-14 की स्थायी समिति के अनुसार, एनडीए में शामिल होने के लिए सबसे अधिक मांग वाली सैन्य प्रवेश परीक्षाओं में से एक में, सैनिक स्कूल के लगभग 20% छात्र हर साल परीक्षा में शामिल होते हैं। इस साल की शुरुआत में राज्यसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले छह वर्षों में सैनिक स्कूल के 11 प्रतिशत से अधिक कैडेट सशस्त्र बलों में शामिल हुए। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सशस्त्र बलों में 7,000 से अधिक अधिकारियों के योगदान के लिए सैनिक स्कूलों को श्रेय देते हैं ।

सैनिक स्कूल, राष्ट्रीय भारतीय सैन्य कॉलेज और राष्ट्रीय भारतीय सैन्य स्कूलों के साथ, 25-30 प्रतिशत से अधिक कैडेटों को भारतीय सशस्त्र बलों की विभिन्न प्रशिक्षण अकादमियों में भेजते हैं। 

“सिद्धांत रूप में, पीपीपी मॉडल एक अच्छा विचार है। लेकिन मेरी आशंका उस तरह के संगठनों को लेकर है जो ये अनुबंध जीतेंगे। यदि अधिकांश स्वामित्व भाजपा से संबंधित व्यक्तियों/संगठनों के हाथों में है, तो यह पूर्वाग्रह प्रदान की जाने वाली शिक्षा की प्रकृति को प्रभावित करेगा। अगर, नियमित सैनिक स्कूलों की तरह, इन छात्रों को भी एनडीए और सशस्त्र बलों के लिए अन्य प्रवेश परीक्षाओं के लिए आवेदन करना होगा, तो जिस तरह की शिक्षा उन्होंने प्राप्त की है, वह निश्चित रूप से सशस्त्र बलों के दृष्टिकोण को प्रभावित करेगी, ”एक सेवानिवृत्त मेजर जनरल ने कहा, जिन्होंने ऐसा नहीं किया। नामित होना चाहते हैं.

आरटीआई प्रतिक्रियाओं के अनुसार, कम से कम 40 स्कूलों ने 05 मई, 2022 और 27 दिसंबर, 2023 के बीच सैनिक स्कूल सोसायटी के साथ एमओए पर हस्ताक्षर किए हैं। द कलेक्टिव की एक करीबी समीक्षा से पता चलता है कि 40 स्कूलों में से 11 सीधे तौर पर भाजपा राजनेताओं के स्वामित्व में हैं। या उनकी अध्यक्षता वाले ट्रस्टों द्वारा प्रबंधित, या भाजपा के मित्रों और राजनीतिक सहयोगियों से संबंधित हैं। आठ का प्रबंधन सीधे तौर पर आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों द्वारा किया जाता है। इसके अतिरिक्त, छह स्कूलों का हिंदुत्व संगठनों या दूर-दक्षिणपंथी दंगाइयों और अन्य हिंदू धार्मिक संगठनों से घनिष्ठ संबंध है। कोई भी स्वीकृत स्कूल ईसाई या मुस्लिम संगठनों या भारत के किसी भी धार्मिक अल्पसंख्यक द्वारा नहीं चलाया जाता है। 
पार्टी के सदस्यों और दोस्तों के लिए स्वीकृत
गुजरात से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक, बड़ी संख्या में इन नए सैनिक स्कूलों में या तो भाजपा नेताओं की प्रत्यक्ष भागीदारी देखी जाती है या उन ट्रस्टों के स्वामित्व में हैं जिनके वे प्रमुख हैं।

अरुणाचल के सीमावर्ती शहर तवांग में तवांग पब्लिक स्कूल राज्य में स्वीकृत एकमात्र सैनिक स्कूल है। इस स्कूल का स्वामित्व राज्य के मुख्यमंत्री पेमा खांडू के पास है। हितेंद्र त्रिपाठी, पूर्व स्कूल प्रबंध समिति के अधिकारी सचिव, जो स्कूल के प्रिंसिपल के रूप में भी कार्य करते हैं, ने स्कूल समिति के अध्यक्ष के रूप में खांडू की भूमिका की पुष्टि की। खांडू के भाई तवांग से भाजपा विधायक सेरिंग ताशी स्कूल के प्रबंध निदेशक हैं। 

यह पूछे जाने पर कि क्या सरकार ने उनके भाजपा संबंधों के कारण उनके स्कूल का पक्ष लिया है, त्रिपाठी ने कहा, "मुझे उस दावे में कोई सच्चाई नहीं दिखती क्योंकि संबंधित अधिकारियों द्वारा तीन गहन निरीक्षण किए गए थे।" हालाँकि, ताशी और खांडू ने हमारे सवालों का जवाब नहीं दिया है।

गुजरात के मेहसाणा में, श्री मोतीभाई आर. चौधरी सागर सैनिक स्कूल दूधसागर डेयरी से संबद्ध है, जिसके अध्यक्ष मेहसाणा के पूर्व भाजपा महासचिव अशोककुमार भावसंगभाई चौधरी हैं। पिछले साल गृह मंत्री अमित शाह ने वर्चुअल तरीके से स्कूल का शिलान्यास किया था. गुजरात में एक और स्कूल, बनासकांठा में बनास सैनिक स्कूल, बनास डेयरी के तहत गल्बाभाई नानजीभाई पटेल चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा प्रबंधित किया जाता है। इस संगठन का नेतृत्व थराद से भाजपा विधायक और गुजरात विधानसभा के वर्तमान अध्यक्ष शंकर चौधरी कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में, इटावा में शकुंतलम इंटरनेशनल स्कूल मुन्ना स्मृति संस्थान द्वारा चलाया जाता है, जो एक गैर-लाभकारी संस्था है, जिसकी अध्यक्ष भाजपा विधायक सरिता भदौरिया हैं। उनके बेटे आशीष भदौरिया, जो स्कूल का कामकाज देखते हैं, ने कहा, “हमारे पास सैनिक स्कूल चलाने का कोई अनुभव नहीं है। हम इसे आगामी सत्र से शुरू करेंगे।” उन्होंने दावा किया, ''चयन प्रक्रिया बहुत व्यापक थी.'' जब उनसे पूछा गया कि क्या पार्टी एसोसिएशन के लिए उनके आवेदन को मंजूरी दी गई है, तो उन्होंने कहा, 'आपको यह सरकार से पूछना चाहिए।'

जांच में पाया गया कि इस नए पीपीपी मॉडल से लाभान्वित होने वाले लोगों में कई भाजपा राजनेता भी शामिल हैं। इस लंबी सूची में अलग-अलग राज्यों के बीजेपी नेता हैं. 

हरियाणा में, रोहतक का श्री बाबा मस्तनाथ आवासीय पब्लिक स्कूल अब एक सैनिक स्कूल है। पूर्व भाजपा सांसद महंत चांदनाथ ने इसकी स्थापना की थी और वर्तमान में इसका संचालन उनके उत्तराधिकारी महंत बालकनाथ योगी द्वारा किया जाता है, जो राजस्थान के तिजारा से मौजूदा भाजपा विधायक हैं।

महाराष्ट्र के नव स्वीकृत स्कूलों में अहमदनगर का पद्मश्री डॉ. विट्ठलराव विखे पाटिल स्कूल शामिल है - यह एक संस्था है जिसके अध्यक्ष पूर्व कांग्रेस विधायक राधाकृष्ण विखे पाटिल हैं, जो 2019 में भाजपा में शामिल हुए थे। राजस्थान में सीकर जिले के पूर्व भाजपा अध्यक्ष, हरिराम रणवा उस ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं जो भारतीय जनता का प्रबंधन करता है। विद्यालय। सांगली में एसके इंटरनेशनल स्कूल, जिसे सैनिक स्कूल से संबद्धता मिली है, की स्थापना भाजपा के सहयोगी सदाभाऊ खोत ने की थी, जो 2014 की देवेंद्र फड़नवीस के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार में मंत्री थे। मध्य प्रदेश के कटनी में जिस सिना इंटरनेशनल स्कूल को मंजूरी मिली है, उसकी प्रमुख मध्य प्रदेश में बीजेपी विधायक संजय पाठक की पत्नी निधि पाठक हैं।

उपर्युक्त स्कूलों में से कुछ मौजूदा स्कूल हैं जिन्हें सैनिक स्कूल बनने की मंजूरी मिल गई है। सैनिक स्कूल, देश के कई अन्य सरकारी स्कूलों की तरह, मुख्य रूप से नैतिक मूल्यों, देशभक्ति, सांप्रदायिक सद्भाव और व्यक्तित्व विकास जैसे कुछ अतिरिक्त विषयों के साथ केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड पाठ्यक्रम का पालन करते हैं।

भाजपा के करीबी अदाणी ग्रुप के तहत एक फाउंडेशन द्वारा संचालित स्कूल को भी संबद्धता दी गई।

आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में अदानी वर्ल्ड स्कूल भी संबद्ध था। स्कूल कृष्णापट्टनम बंदरगाह के पास स्थित है, जो पूर्वी तट पर अदानी समूह द्वारा संचालित एक गहरे पानी का बंदरगाह है। स्कूल का स्वामित्व अदानी कम्युनिटी एम्पावरमेंट फाउंडेशन के पास है। फाउंडेशन की अध्यक्ष प्रीति अदानी ने हमारे प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया है।


आरटीआई जवाब का स्क्रीनग्रैब जहां रक्षा मंत्रालय ने नए स्कूलों की चयन प्रक्रिया पर जानकारी साझा करने से इनकार कर दिया।


सैनिक स्कूलों का भगवाकरण
मंजूरी की सूची में सिर्फ बीजेपी नेता ही शामिल नहीं थे, निजी सैनिक स्कूलों को चलाने का अधिकार आरएसएस संस्थानों और उससे जुड़े कई हिंदू दक्षिणपंथी समूहों को भी दिया गया था। विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान (विद्या भारती) आरएसएस की शैक्षिक शाखा है। ऐसी सात संबद्धताएँ भारत भर में पहले से मौजूद विद्या भारती स्कूलों को मिलीं - उनमें से तीन बिहार में स्थित हैं, और एक-एक मध्य प्रदेश, पंजाब, केरल और दादरा और नगर हवेली में स्थित हैं। भाऊसाहब भुस्कुटे स्मृति लोक न्यास, आरएसएस की सामाजिक सेवा शाखा, राष्ट्रीय सेवा भारती से संबद्ध, भी स्कूलों को चलाने वाले समूह का हिस्सा है। होसंगाबाद में उनके स्कूल, सरस्वती ग्रामोदय हायर सेकेंडरी स्कूल को मंजूरी मिली।

अक्सर इतिहास को फिर से लिखने, शिक्षा देने और मुस्लिम विरोधी पाठ्यक्रम का आरोप लगाया जाता है, विद्या भारती इस बारे में स्पष्ट है कि वे अपने मिशन को कैसे परिभाषित करते हैं। आरएसएस ने अपने अधीन स्कूलों की बढ़ती संख्या को संचालित करने के लिए 1978 में विद्या भारती की स्थापना की। वर्तमान में इसके अंतर्गत 12,065 औपचारिक स्कूल हैं, जिनमें 3,158,658 छात्र हैं, जो संभवतः इसे भारत में निजी स्कूलों के सबसे बड़े नेटवर्क में से एक बनाता है। जैसा कि उनकी वेबसाइट पर उल्लेख किया गया है, वे "एक ऐसी युवा पीढ़ी का निर्माण करना चाहते हैं जो हिंदुत्व के लिए प्रतिबद्ध हो और देशभक्ति के उत्साह से ओत-प्रोत हो।"


मानचित्र नए सैनिक स्कूलों को दर्शाता है जो भाजपा नेताओं, उनके दोस्तों या राजनीतिक सहयोगियों से जुड़े हुए हैं।



शासन
केंद्र ने 62% नए सैनिक स्कूलों को संघ परिवार, भाजपा राजनेताओं और सहयोगियों को सौंप दिया।
रक्षा मंत्रालय के मार्गदर्शन में चलने वाले सैनिक स्कूल, भारत के सशस्त्र बलों में कैडेट भेजते हैं। हालाँकि, नई पहल भविष्य के कैडेटों को प्रशिक्षित करने के लिए वैचारिक रूप से झुके हुए संगठनों पर निर्भर करती है

आस्था सव्यसाची
3 अप्रैल 2024

तस्वीर: 
नितिन सेठी/एआई

नई दिल्ली: देश के पवित्र शहरों में से एक, वृन्दावन में, हिंदू राष्ट्रवादी विचारक साध्वी ऋतंभरा लड़कियों के लिए एक स्कूल, संविद गुरुकुलम गर्ल्स सैनिक स्कूल चलाती हैं। विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की महिला शाखा, दुर्गा वाहिनी की संस्थापक, वह राम मंदिर आंदोलन में एक प्रमुख व्यक्ति थीं। 

पिछले साल जून में एक स्कूल कार्यक्रम के दौरान, 60 वर्षीय भगवाधारी महिला एक व्यक्तित्व विकास शिविर के दौरान छात्रों को 'सम्मान', परंपराओं और रीति-रिवाजों के बारे में संबोधित करने के लिए मंच पर आती है। स्कूल के फेसबुक पेज पर साझा किए गए एक वीडियो में , ऋतंभरा को यह टिप्पणी करते हुए देखा जा सकता है कि कॉलेजों और सोशल मीडिया में लड़कियां कैसे "नियंत्रण से बाहर" हैं।

“हमें कॉलेजों में क्या मिलता है? आधी रात को सिगरेट पीती लड़कियाँ. शिक्षा के इन केंद्रों में महिलाएं शराब की बोतलें तोड़ रही हैं और मोटरसाइकिल पर अपने बॉयफ्रेंड के साथ अभद्रता फैला रही हैं... हमने कभी नहीं सोचा था कि भारत की बेटियां इतनी बेकाबू हो जाएंगी. वे सोशल मीडिया पर गाली-गलौज वाली रीलें पोस्ट कर रहे हैं. वे न्यूड फोटोशूट करा रहे हैं. वे अंडरगारमेंट्स में अपने शरीर का प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि ये महिलाएं मानसिक रूप से बीमार हैं... इन लड़कियों में संस्कार नहीं हैं,'' ऋतंभरा कहती हैं।


साध्वी ऋतंभरा 21 जून, 2023 को एक व्यक्तित्व विकास शिविर में संविद गुरुकुलम गर्ल्स सैनिक स्कूल के छात्रों को संबोधित करती हैं। [स्रोत: स्कूल का फेसबुक पेज]

वृन्दावन में उनका गर्ल्स स्कूल और दूसरा, सोलन, हिमाचल प्रदेश में राज लक्ष्मी संविद गुरुकुलम हाल ही में कम से कम 40 स्कूलों की सूची में शामिल हो गए हैं, जिन्होंने सैनिक स्कूल सोसाइटी (एसएसएस) के साथ एक स्वायत्त निकाय के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओए) पर हस्ताक्षर किए हैं। रक्षा मंत्रालय (MoD), सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत सैनिक स्कूल चलाएगा। 

2021 में, केंद्र सरकार ने भारत में सैनिक स्कूल चलाने के लिए निजी खिलाड़ियों के लिए दरवाजे खोल दिए। उस वर्ष अपने वार्षिक बजट में, सरकार ने पूरे भारत में 100 नए सैनिक स्कूल स्थापित करने की योजना की घोषणा की। 

एसएसएस निर्दिष्ट बुनियादी ढांचे वाले किसी भी स्कूल - भूमि, भौतिक और आईटी बुनियादी ढांचे, वित्तीय संसाधन, कर्मचारी इत्यादि - को संभावित रूप से नए सैनिक स्कूलों में से एक के रूप में अनुमोदित किया जा सकता है। अनुमोदन नीति दस्तावेज़ के अनुसार, बुनियादी ढाँचा ही एकमात्र निर्दिष्ट मानदंड था जो किसी स्कूल को अनुमोदन के लिए पात्र बनाता था। इस सीमा ने संघ परिवार से जुड़े स्कूलों और समान विचारधारा वाले संगठनों को आवेदन करने में सक्षम बनाया।

Collated information from the Union government’s press releases and Right to Information (RTI) replies show a concerning trend. Our findings reveal that of the 40 Sainik School agreements so far, at least 62% were awarded to schools linked to Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) and its allied organisations, politicians of Bharatiya Janata Party (BJP), its political allies and friends, Hindutva organisations, individuals, and other Hindu religious organisations. 

While the government expects the new PPP model to bolster the recruitment pool for the armed forces, the initiative that brings in political players and right-wing institutions into the military ecosystem has raised concerns.

In the history of the Sainik School education system, this was the first time the government allowed private players to get affiliated with the SSS, receive “part financial support” and run their branches. On October 12, 2021, Prime Minister Narendra Modi led a cabinet meeting that approved a proposal to run the schools “as an exclusive vertical which will be distinct and different from existing Sainik Schools of MoD.”

According to the policy document, the government provides, through SSS, “an Annual Fee Support of 50% of fee (subject to an upper limit of Rs.40000/- per annum for 50% of the class strength (subject to an upper limit of 50 students) per year from Class 6 onwards till class 12, on Merit-cum-Means basis,” which means, for a school that has classes till 12th standard, SSS offers to provide support of maximum Rs 1.2 crore per annum. This is given as partial financial support to the students. Other incentives offered to the schools include “an amount of Rs.10 lakhs as training grant given annually based on academic performance of the students in class 12.” 

Despite the government support and incentivisation, The Reporters’ Collective found that the annual fee for the senior secondary ranges from a nominal Rs 13,800 a year to as high as Rs 2,47,900, indicating a significant disparity across fee structures of the new Sainik Schools.

Who will run the new Sainik Schools?
Until the new policy, 33 Sainik Schools housing 16,000 cadets existed in the country with SSS acting as its parent body. SSS is an autonomous organisation under the Defence Ministry. Multiple government reports point to the importance of Sainik Schools in sending cadets to defence institutions. The Standing Committees on Defence have often emphasised Sainik Schools' role in preparing cadets for the National Defence Academy (NDA) and Indian Naval Academy. In one of the most sought-after military entrance exams to join NDA, according to the 2013-14 Standing Committee, nearly 20% of Sainik School students appearing every year for the exam make the cut. According to data submitted in Rajya Sabha earlier this year, over 11 percent of Sainik School cadets joined the armed forces in the last six years. Defence Minister Rajnath Singh credits Sainik Schools for contributing more than 7,000 officers to the armed forces.

Sainik Schools, along with Rashtriya Indian Military College and the Rashtriya Indian Military Schools, send more than 25-30 percent of the cadets to various training academies of the Indian armed forces. 

“In principle, the PPP model is a good idea. But my apprehension is about the kind of organisations which will win these contracts. If the majority of the ownership is in the hands of BJP-related individuals/organisations, then that bias will impact the nature of education imparted. If, like regular Sainik Schools, these students also have to apply for NDA and other entrance exams for armed forces, the kind of education they have received will definitely impact the outlook of the armed forces,” said a retired Major General who didn’t want to be named.

According to the RTI responses, at least 40 schools have signed MoAs with the Sainik Schools Society between May 05, 2022 and December 27, 2023. A closer review by The Collective reveals that out of the 40 schools, 11 are directly owned by BJP politicians or managed by trusts chaired by them, or belong to friends and political allies of the BJP. Eight are managed by RSS and its allied organisations directly. Additionally, six schools have close ties to Hindutva organisations or far-right rabble-rousers, and other Hindu religious organisations. None of the approved schools are run by Christian or Muslim organisations or any of the religious minorities of India. 


Different categories of organisations running the new approved Sainik schools
Sanctioned for party members and friends
From Gujarat to Arunachal Pradesh, a large number of these new Sainik Schools either see direct involvement of BJP leaders or are owned by trusts that they head.

Tawang Public School in Arunachal’s border town of Tawang is the sole Sainik School approved in the state. The school is owned by the state chief minister Pema Khandu. Hitendra Tripathi, Ex. Officio Secretary of the school managing committee, who also serves as the school principal, confirmed Khandu’s role as chairman of the school committee. Khandu’s brother Tsering Tashi, a BJP MLA from Tawang, is the managing director of the school. 

When asked if the government has favoured their school because of their BJP links, Tripathi said, “I don’t find any truth in that claim because three thorough inspections were carried out by the concerned authorities.” Tashi and Khandu, however, have not responded to our queries.

In Mehsana, Gujarat, Shri Motibhai R. Chaudhary Sagar Sainik School is affiliated with Dudhsagar Dairy, which is chaired by Ashokkumar Bhavsangbhai Chaudhari, a former BJP general secretary for Mehsana. Last year, Home Minister Amit Shah had virtually laid the foundation stone of the school. Another school in Gujarat, Banas Sainik School in Banaskantha, is managed by the Galbabhai Nanjibhai Patel Charitable Trust under Banas Dairy. The organisation is led by BJP MLA from Tharad and the current speaker of the Gujarat Legislative Assembly, Shankar Chaudhary.

In Uttar Pradesh, Shakuntlam International School in Etawah is run by Munna Smriti Sansthan, a non-profit chaired by BJP MLA Sarita Bhadauria. Her son, Ashish Bhadauria, who oversees the functioning of the school said, “We don’t have any experience in running Sainik Schools. We will be starting it from the coming session.” He claimed, “The selection process was very extensive.” When asked whether their application was favoured for party association, he said, “You should ask this from the government.”

The investigation found many of the people benefiting from this new PPP model include several BJP politicians. This long list has BJP leaders from different states. 

In Haryana, Shri Baba Mastnath Residential Public School of Rohtak is now a Sainik school. Former BJP MP Mahant Chandnath founded it and is currently run by his successor Mahant Balaknath Yogi, the incumbent BJP MLA from Tijara in Rajasthan.


Mahant Balaknath Yogi, BJP MLA from Tijara, Rajasthan runs a Sainik School in Rohtak, Haryana. [Source: Facebook page of the school]
महाराष्ट्र के नव स्वीकृत स्कूलों में अहमदनगर का पद्मश्री डॉ. विट्ठलराव विखे पाटिल स्कूल शामिल है - यह एक संस्था है जिसके अध्यक्ष पूर्व कांग्रेस विधायक राधाकृष्ण विखे पाटिल हैं, जो 2019 में भाजपा में शामिल हुए थे। राजस्थान में सीकर जिले के पूर्व भाजपा अध्यक्ष, हरिराम रणवा उस ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं जो भारतीय जनता का प्रबंधन करता है। विद्यालय। सांगली में एसके इंटरनेशनल स्कूल, जिसे सैनिक स्कूल से संबद्धता मिली है, की स्थापना भाजपा के सहयोगी सदाभाऊ खोत ने की थी, जो 2014 की देवेंद्र फड़नवीस के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार में मंत्री थे। मध्य प्रदेश के कटनी में जिस सिना इंटरनेशनल स्कूल को मंजूरी मिली है, उसकी प्रमुख मध्य प्रदेश में बीजेपी विधायक संजय पाठक की पत्नी निधि पाठक हैं।

उपर्युक्त स्कूलों में से कुछ मौजूदा स्कूल हैं जिन्हें सैनिक स्कूल बनने की मंजूरी मिल गई है। सैनिक स्कूल, देश के कई अन्य सरकारी स्कूलों की तरह, मुख्य रूप से नैतिक मूल्यों, देशभक्ति, सांप्रदायिक सद्भाव और व्यक्तित्व विकास जैसे कुछ अतिरिक्त विषयों के साथ केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड पाठ्यक्रम का पालन करते हैं।

भाजपा के करीबी अदाणी ग्रुप के तहत एक फाउंडेशन द्वारा संचालित स्कूल को भी संबद्धता दी गई।

आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में अदानी वर्ल्ड स्कूल भी संबद्ध था। स्कूल कृष्णापट्टनम बंदरगाह के पास स्थित है, जो पूर्वी तट पर अदानी समूह द्वारा संचालित एक गहरे पानी का बंदरगाह है। स्कूल का स्वामित्व अदानी कम्युनिटी एम्पावरमेंट फाउंडेशन के पास है। फाउंडेशन की अध्यक्ष प्रीति अदानी ने हमारे प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया है।


आरटीआई जवाब का स्क्रीनग्रैब जहां रक्षा मंत्रालय ने नए स्कूलों की चयन प्रक्रिया पर जानकारी साझा करने से इनकार कर दिया।
सैनिक स्कूलों का भगवाकरण
मंजूरी की सूची में सिर्फ बीजेपी नेता ही शामिल नहीं थे, निजी सैनिक स्कूलों को चलाने का अधिकार आरएसएस संस्थानों और उससे जुड़े कई हिंदू दक्षिणपंथी समूहों को भी दिया गया था। विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान (विद्या भारती) आरएसएस की शैक्षिक शाखा है। ऐसी सात संबद्धताएँ भारत भर में पहले से मौजूद विद्या भारती स्कूलों को मिलीं - उनमें से तीन बिहार में स्थित हैं, और एक-एक मध्य प्रदेश, पंजाब, केरल और दादरा और नगर हवेली में स्थित हैं। भाऊसाहब भुस्कुटे स्मृति लोक न्यास, आरएसएस की सामाजिक सेवा शाखा, राष्ट्रीय सेवा भारती से संबद्ध, भी स्कूलों को चलाने वाले समूह का हिस्सा है। होसंगाबाद में उनके स्कूल, सरस्वती ग्रामोदय हायर सेकेंडरी स्कूल को मंजूरी मिली।

अक्सर इतिहास को फिर से लिखने, शिक्षा देने और मुस्लिम विरोधी पाठ्यक्रम का आरोप लगाया जाता है, विद्या भारती इस बारे में स्पष्ट है कि वे अपने मिशन को कैसे परिभाषित करते हैं। आरएसएस ने अपने अधीन स्कूलों की बढ़ती संख्या को संचालित करने के लिए 1978 में विद्या भारती की स्थापना की। वर्तमान में इसके अंतर्गत 12,065 औपचारिक स्कूल हैं, जिनमें 3,158,658 छात्र हैं, जो संभवतः इसे भारत में निजी स्कूलों के सबसे बड़े नेटवर्क में से एक बनाता है। जैसा कि उनकी वेबसाइट पर उल्लेख किया गया है, वे "एक ऐसी युवा पीढ़ी का निर्माण करना चाहते हैं जो हिंदुत्व के लिए प्रतिबद्ध हो और देशभक्ति के उत्साह से ओत-प्रोत हो।"


मानचित्र नए सैनिक स्कूलों को दर्शाता है जो भाजपा नेताओं, उनके दोस्तों या राजनीतिक सहयोगियों से जुड़े हुए हैं।
नए नीतिगत बदलावों ने सैनिक स्कूलों को चलाने वाले वैचारिक रूप से विकृत निजी खिलाड़ियों को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। “यह स्पष्ट है, 'उन्हें युवा अवस्था में पकड़ो' की अवधारणा है। सशस्त्र बलों के लिए अच्छा नहीं है, ”पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल प्रकाश मेनन ने कहा, इस बात पर सहमति जताते हुए कि ऐसे संगठनों को अनुबंध देने से सशस्त्र बलों के चरित्र और लोकाचार पर असर पड़ेगा। मेनन वर्तमान में तक्षशिला संस्थान में रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक हैं।

एक लेख में , मेनन ने "शिक्षा के वैचारिक रूप से झुके हुए संस्करण को बढ़ावा देने के लिए संघ और निजी पार्टियों के बीच विकसित होने वाले सांठगांठ के संभावित खतरे पर प्रकाश डाला, जो संविधान में निहित मूल्यों से बहुत दूर है।" 

आरएसएस, स्कूल टेक्स्ट्स एंड द मर्डर ऑफ महात्मा गांधी: द हिंदू कम्युनल प्रोजेक्ट पुस्तक के सह-लेखक आदित्य मुखर्जी को यह चौंकाने वाला लगा कि ऐसे स्कूलों को रक्षा मंत्रालय से प्रायोजन और आधिकारिक समर्थन प्राप्त हुआ। “लोकतंत्र में, विद्या भारती जैसे स्कूलों का अस्तित्व ही नहीं होना चाहिए क्योंकि वे अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैला रहे हैं। लेकिन कम से कम वे केवल आरएसएस स्कूल थे। उन्हें राष्ट्रीय संस्थानों, विशेषकर रक्षा संस्थानों से संबद्ध करके, सरकार देश के लिए अकथनीय खतरा ला रही है। मुखर्जी ने द कलेक्टिव को बताया, ''यह रक्षा बलों को बहुसंख्यकवादी, सांप्रदायिक दृष्टिकोण से संक्रमित करने के लिए बाध्य है।''

द कलेक्टिव के साथ एक साक्षात्कार में , विद्या भारती केंद्रीय कार्यकारी समिति के महासचिव अवनीश भटनागर ने कहा, “हम इन अनुप्रयोगों को केंद्रीय रूप से प्रबंधित नहीं करते हैं। प्रत्येक स्कूल व्यक्तिगत स्तर पर लागू होता है। स्कूल समिति को पता होगा कि क्या उनका पक्ष लिया गया था। मैं इसका उत्तर नहीं दे सकता।” 

हालाँकि, विद्या भारती केंद्रीय कार्यकारी समिति के अध्यक्ष डी. रामकृष्ण राव ने इस तरह की और अधिक संबद्धताओं के लिए आवेदन करने की योजना के बारे में बात की, “अभी के लिए, हमने केवल कुछ स्कूलों के साथ प्रयास किया है। राव ने कहा, लेकिन, हम और अधिक विद्या भारती स्कूलों को आवेदन करने और एसएसएस से संबद्ध करने की योजना बना रहे हैं।

सेंट्रल हिंदू मिलिट्री एजुकेशन सोसाइटी द्वारा संचालित भोंसाला मिलिट्री स्कूल, नागपुर को भी सैनिक स्कूल के रूप में चलाने की मंजूरी दी गई। स्कूल की स्थापना 1937 में हिंदू दक्षिणपंथी विचारक बीएस मुंजे ने की थी। 2006 के नांदेड़ बम विस्फोट और 2008 के मालेगांव विस्फोटों की जांच के दौरान, महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते ने भोंसाला मिलिट्री स्कूल की जांच की, जहां विस्फोट के आरोपियों को कथित तौर पर प्रशिक्षित किया गया था। 

बीएमएस की तरह ही, कई अन्य हिंदू धार्मिक ट्रस्टों, जिनमें से कुछ की स्थापना हिंदुत्व समर्थकों द्वारा की गई थी, को अपने मौजूदा ढांचे में सैनिक स्कूल चलाने की मंजूरी मिल गई है। इसमें हिंदुत्व नेता साध्वी ऋतंभरा के ऊपर बताए गए दोनों स्कूल शामिल हैं।

दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लिए अपने भाषणों के लिए कुख्यात, इतिहासकार तनिका सरकार ने ऋतंभरा और उनके भाषणों को "मुस्लिम विरोधी हिंसा भड़काने का सबसे शक्तिशाली साधन" बताया । अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस की जांच करने वाले लिब्रहान आयोग ने ऋतंभरा सहित 68 लोगों पर देश को "सांप्रदायिक कलह के कगार पर ले जाने" का आरोप लगाया ।

वह संघ परिवार में महत्वपूर्ण हैं और कई भाजपा नेताओं की करीबी हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिसंबर 2023 में उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं देने के लिए वृंदावन की यात्रा की। जनवरी में, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सभी लड़कियों के लिए संविद गुरुकुलम गर्ल्स सैनिक स्कूल का उद्घाटन किया । समारोह के दौरान, सिंह ने राम मंदिर आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका के लिए ऋतंभरा की सराहना की। “दीदी मां [ऋतंभरा] ने राम मंदिर आंदोलन के दौरान महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने समाज को अपना परिवार माना है, ”सिंह को समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने उद्धृत किया था।

श्रीमती हरियाणा के कुरूक्षेत्र में केसरी देवी लोहिया जयराम पब्लिक स्कूल, हिंदू संन्यासियों के समाज, भारत साधु समाज (बीएसएस) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के स्वामित्व में है। श्री. गुजरात के जूनागढ़ में ब्रह्मानंद विद्या मंदिर, जिसे भी सैनिक स्कूल की मान्यता मिली है, भगवतीनंदजी एजुकेशन ट्रस्ट द्वारा चलाया जाता है , जिसके प्रबंध ट्रस्टी - मुक्तानंद 'बापू' - 2019 से भारत साधु समाज (बीएसएस) के अध्यक्ष भी रहे हैं।

श्री सारदा विद्यालय, एर्नाकुलम, केरल एक हिंदू धार्मिक संगठन आदि शंकर ट्रस्ट द्वारा चलाया जाता है, जो श्रृंगेरी शारदा पीठम की एक इकाई है - एक सनातन हिंदू मठ - माना जाता है कि इसे 8 वीं शताब्दी के हिंदू दार्शनिक और विद्वान आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित किया गया था।

कलेक्टिव ने रक्षा मंत्रालय और सैनिक स्कूल सोसायटी को विस्तृत प्रश्न भेजे। अनुस्मारक के बावजूद हमें अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है। परम शक्ति पीठ की संस्थापक, साध्वी ऋतंभरा और इसके महासचिव संजय गुप्ता के साथ बैठक की व्यवस्था करने का अनुरोध भी अनुत्तरित रहा।



रक्षा मंत्रालय ने इस स्टोरी के लिए एक प्रेस नोट जारी किया. हमारा फॉलो-अप यहां पढ़ें।


नोट: रिपोर्ट के मूल संस्करण में राष्ट्रीय भारतीय सैन्य कॉलेज और राष्ट्रीय भारतीय सैन्य स्कूलों को गलती से 'रॉयल इंडियन मिलिट्री कॉलेज' और 'रॉयल इंडियन मिलिट्री स्कूल' लिखा गया था।



Thursday, 28 March 2024

THE STATE OF DEMOCRACY AROUND THE WORLD ! HINDI

 1. एशिया और ओशिनिया


सामान्य अवलोकन
हाल के वर्षों में एशिया-ओशिनिया क्षेत्र का कद और महत्व काफी बढ़ गया है। यह कई उभरते देशों का घर है, उच्च आर्थिक विकास दर का दावा करता है, और प्रचुर मात्रा में मानव संसाधनों से संपन्न है। एशिया-ओशिनिया क्षेत्र एक विश्व विकास केंद्र है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है। दुनिया की 7 अरब की आबादी में से लगभग 3.4 अरब लोग पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (ईएएस) के सदस्य देशों 2 (अमेरिका और रूस को छोड़कर) में रहते हैं। यह विश्व की जनसंख्या का 48.3% 3 दर्शाता है। आसियान सदस्य देशों, चीन और भारत की संयुक्त नाममात्र जीडीपी पिछले 10 वर्षों में 370% 4 बढ़ी है , जबकि विश्व औसत 110% है। ईएएस सदस्य देशों (अमेरिका और रूस को छोड़कर) का कुल निर्यात और आयात 10.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है, जो इसे यूरोपीय संघ (11.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर) के बाद दूसरा सबसे बड़ा बाजार बनाता है। इन निर्यातों और आयातों में से 43.3% अंतर -क्षेत्रीय हैं, जो इन देशों के बीच घनिष्ठ आर्थिक संबंधों और उनकी उच्च स्तर की आर्थिक परस्पर निर्भरता को दर्शाता है। हाल के वर्षों में, जापानी नेतृत्व वाले विदेशी निवेश ने बारीकी से एकीकृत आपूर्ति श्रृंखलाओं के विकास को सक्षम किया है जो पूरे क्षेत्र में फैली हुई हैं। जैसे-जैसे मध्यम वर्ग का विस्तार हो रहा है, समग्र क्रय शक्ति में तेजी से वृद्धि होने की उम्मीद है। यह क्षेत्र के भीतर मजबूत आर्थिक विकास का समर्थन करेगा, और बुनियादी ढांचे की भारी मांग और इस बड़े मध्यम वर्ग की विशाल क्रय शक्ति भी जापान में नए सिरे से समृद्धि और जीवन शक्ति लाने में मदद करेगी। पूरे एशिया और ओशिनिया में समृद्धि और स्थिरता को महसूस करना जापान की शांति और समृद्धि के लिए अपरिहार्य है।



अनुकूल आर्थिक विकास माहौल के विपरीत, एशिया-ओशिनिया क्षेत्र के भीतर जापान के आसपास का सुरक्षा माहौल तेजी से गंभीर होता जा रहा है। उत्तर कोरिया ने अपना परमाणु और मिसाइल विकास जारी रखा है और उकसावे में लगा हुआ है; क्षेत्र के देश अपने सैन्य बलों का इस तरह से आधुनिकीकरण कर रहे हैं जिसमें पारदर्शिता का अभाव है, और बल या जबरदस्ती के उपयोग के माध्यम से यथास्थिति को बदलने की कोशिश कर रहे हैं; और दक्षिण चीन सागर के मुद्दों सहित समुद्री मुद्दों पर क्षेत्र के भीतर तनाव बढ़ रहा है। क्षेत्र के स्थिर विकास में बाधा डालने वाले अन्य कारकों में अपरिपक्व वित्तीय बाजार, पर्यावरण प्रदूषण, भोजन और ऊर्जा की सीमित आपूर्ति और उम्रदराज़ आबादी शामिल हैं।

2 आसियान (सदस्य देश: इंडोनेशिया, कंबोडिया, सिंगापुर, थाईलैंड, फिलीपींस, ब्रुनेई, वियतनाम, मलेशिया, म्यांमार, लाओस), जापान, चीन, आरओके, भारत, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड।
3 विश्व बैंक (डब्ल्यूबी) विश्व विकास संकेतक।
4 डब्ल्यूबी विश्व विकास संकेतक
5 अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) व्यापार सांख्यिकी की दिशा मई 2012


टकराव होना अपरिहार्य है।

सेनकाकू द्वीप समूह के संबंध में, ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में और अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर, ये द्वीप स्पष्ट रूप से जापान के क्षेत्र का एक अंतर्निहित हिस्सा हैं। दरअसल, वे जापान के वैध नियंत्रण में हैं। सेनकाकू द्वीप समूह के संबंध में क्षेत्रीय संप्रभुता का कोई मुद्दा नहीं है जिसे हल किया जाना है। जापान ने 1885 में शुरू करके सेनकाकू द्वीपों के क्षेत्रीय सर्वेक्षणों की एक श्रृंखला आयोजित की, और यह सुनिश्चित करने के बाद कि उनके चीन के किंग राजवंश सहित किसी अन्य राज्य के नियंत्रण में होने का कोई निशान नहीं था, सेनकाकू द्वीपों को औपचारिक रूप से के क्षेत्र में शामिल कर लिया गया। जनवरी 1895 में जापान। बाद में, जापानी सरकार की अनुमति से, द्वीपों पर निजी उद्यम स्थापित किए गए, जो सूखे बोनिटो के प्रसंस्करण जैसी गतिविधियों में लगे हुए थे, और द्वीपों में एक समय में 200 से अधिक निवासी थे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, सैन फ्रांसिस्को शांति संधि ने सेनकाकू द्वीपों को ओकिनावा के एक हिस्से के रूप में अमेरिका के प्रशासन के अधीन कर दिया। 1895 में, जब जापान ने उस समय मौजूद अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचे के तहत वैध तरीकों से सेनकाकू द्वीपों पर संप्रभुता हासिल कर ली, और 1970 के दशक तक, पूर्वी चीन सागर में तेल भंडार के संभावित अस्तित्व की सूचना मिलने के बाद, चीन ने कोई आपत्ति नहीं की। सेनकाकस पर जापान की संप्रभुता के संबंध में। इसके अलावा, चीन ने इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है कि वह इस अवधि के दौरान ऐसी कोई आपत्ति उठाने में विफल क्यों रहा।

बयान जारी करके इन मुद्दों पर अपनी चिंता व्यक्त की है, और तुरंत चीन से कड़ा विरोध जताया है, जिसमें मांग की गई है कि चीन अंतरराष्ट्रीय हवाई क्षेत्र में उड़ान की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने वाले सभी उपायों को रद्द कर दे। जापान चीन द्वारा बलपूर्वक यथास्थिति को एकतरफा बदलने के प्रयासों से सख्ती से लेकिन शांत तरीके से निपटना जारी रखेगा और चीन से स्थिति को बिगड़ने नहीं देने का आग्रह करेगा।

इन कठिनाइयों के बावजूद, चीन के साथ जापान का संबंध जापान के सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों में से एक का प्रतिनिधित्व करता है। हालाँकि सितंबर 2012 में सेनकाकू द्वीपों में से तीन का स्वामित्व जापान सरकार को हस्तांतरित करने के बाद, जापान और चीन के बीच तनाव ने विभिन्न तरीकों से आर्थिक संबंधों को प्रभावित किया, आर्थिक क्षेत्र में संबंध और जापान में चीनी आगंतुकों की संख्या में सुधार होने लगा। 2013 की दूसरी छमाही। लोगों से लोगों के आदान-प्रदान के संदर्भ में भी, जापान समाज के विभिन्न स्तरों और क्षेत्रों से चीनियों को जापान आने के लिए आमंत्रित करके संबंधों की एक विस्तृत श्रृंखला बनाने और मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। दोनों देश क्षेत्र और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की शांति और स्थिरता के लिए जिम्मेदारी साझा करते हैं। जापान का मानना है कि यह जापान और चीन के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय के हित में भी है कि दोनों देश व्यापक दृष्टिकोण अपनाएं और "सामान्य रणनीतिक हितों पर आधारित पारस्परिक लाभकारी संबंध" के बुनियादी सिद्धांतों की पुष्टि करके अपने संबंधों में सुधार करें। ।” जापान की ओर से बातचीत का दरवाजा हमेशा खुला है। सभी मुद्दों का समाधान होने तक बातचीत में शामिल होने से इनकार करने का रवैया अपनाने के बजाय, जापान की स्थिति यह है कि दोनों देशों के बीच चुनौतीपूर्ण मुद्दे मौजूद हैं, इसलिए स्पष्ट चर्चा होनी चाहिए।

जहां तक "आरामदेह महिलाओं" के मुद्दे का संबंध है, जापान ने इस मुद्दे के समाधान के लिए गंभीर प्रयास किए हैं। जापान की स्थिति यह है कि दोनों देशों के बीच संपत्ति और दावों के मुद्दे, जिनमें "कम्फर्ट वुमेन" मुद्दा भी शामिल है, पहले ही कानूनी रूप से सुलझाए जा चुके हैं। हालाँकि, पूर्व "आराम महिलाओं" को व्यावहारिक सहायता प्रदान करने के लिए, जापानी नागरिकों और जापानी सरकार ने एशियाई महिला कोष की स्थापना की, जिसने विभिन्न चिकित्सा और कल्याण सहायता परियोजनाओं और "प्रायश्चित धन" के लिए धन प्रदान किया। इसके अलावा, जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्रियों ने पूर्व "आरामदायक महिलाओं" में से प्रत्येक को सीधे माफी और पश्चाताप व्यक्त करते हुए एक पत्र भेजा। जापान अपनी स्थिति और अपने द्वारा किए गए गंभीर और ईमानदार प्रयासों को समझने के लिए अपना अधिकतम प्रयास जारी रखेगा।

कोरियाई प्रायद्वीप से "नागरिकों की मांग" के संबंध में कोरिया गणराज्य में न्यायिक निर्णयों से उत्पन्न होने वाली समस्याओं के संबंध में, जापान ने लगातार यह रुख अपनाया है कि जापान और कोरिया गणराज्य के बीच संपत्ति और दावों के मुद्दों को पूरी तरह से और अंततः इसके माध्यम से सुलझा लिया गया है। संपत्ति और दावों से संबंधित समस्या के निपटान और जापान और कोरिया गणराज्य के बीच आर्थिक सहयोग पर समझौता, और उस आधार पर मुद्दों से उचित रूप से निपटना जारी रहेगा।

लंबे इतिहास के आधार पर, जापान आसियान के प्रत्येक सदस्य देश के साथ संबंधों को मजबूत करने के लिए काम कर रहा है। 2013 आसियान-जापान मैत्री और सहयोग का 40वां वर्ष है। उस वर्ष के दौरान, प्रधान मंत्री शिंजो आबे ने आसियान के प्रत्येक सदस्य देश का आधिकारिक दौरा किया और दिसंबर में टोक्यो में आसियान-जापान स्मारक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। इसके अलावा, विदेश मंत्री किशिदा और अन्य कैबिनेट सदस्यों द्वारा आसियान सदस्य देशों की लगातार यात्राओं के माध्यम से अन्य उच्च-स्तरीय आदान-प्रदान बनाए रखा गया। एशिया-ओशिनिया क्षेत्र का रणनीतिक वातावरण हाल के वर्षों में बदल गया है, और क्षेत्र में शांति और समृद्धि प्राप्त करने के लिए, जापान राजनीति और सुरक्षा के क्षेत्र में दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ अपनी बातचीत और सहयोग को मजबूत करना जारी रखेगा। इसके अलावा, 21वीं सदी के विकास केंद्र के रूप में, दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र, विशेष रूप से हाल के वर्षों में, निवेश और व्यापार के लिए एक वांछनीय भागीदार के रूप में ध्यान आकर्षित कर रहा है। इस पृष्ठभूमि में, और अपनी अर्थव्यवस्था को फिर से मजबूत करने के लिए इस क्षेत्र की जीवन शक्ति का लाभ उठाने की उम्मीद करते हुए, जापान इस क्षेत्र में बुनियादी ढांचे और निवेश वातावरण के विकास का समर्थन करता है। जापान लोगों से लोगों के बीच और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को सुदृढ़ करने के लिए भी काम कर रहा है, और इस तथ्य का लाभ उठाया कि 2013 में जापान और कंबोडिया के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 60 वीं वर्षगांठ थी, जापान और कंबोडिया के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 40 वीं वर्षगांठ थी। वियतनाम (जापान-वियतनाम मैत्री वर्ष), और दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों को और बढ़ावा देने के लिए जापान और इंडोनेशिया के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 55वीं वर्षगांठ है। इसके अलावा, जेनेसिस 2.0 जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से युवा आदान-प्रदान आयोजित किए गए, और वीजा आवश्यकताओं में ढील से थाईलैंड, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, फिलीपींस, वियतनाम और म्यांमार सहित दक्षिण पूर्व एशियाई देशों से जापान आने वाले पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हुई। .

समुद्री व्यवस्था, संसाधन प्रबंधन और व्यापार और निवेश के क्षेत्रों में।

दक्षिण एशिया
लगभग 1.6 बिलियन की बड़ी आबादी, अपने भू-राजनीतिक महत्व और क्षेत्र के कई देशों द्वारा प्राप्त आर्थिक विकास की निरंतर उच्च दर के कारण दक्षिण एशिया अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है। जापान दक्षिण एशियाई देशों के साथ आर्थिक संबंधों को और मजबूत करेगा जिनके साथ उसके पारंपरिक रूप से मैत्रीपूर्ण और सहयोगात्मक संबंध हैं। इसके अलावा, जापान राष्ट्रीय सुलह और लोकतंत्रीकरण स्थापित करने जैसे प्रत्येक देश के प्रयासों के लिए अपना सहयोग जारी रखेगा। जापान ने 2006 में भारत के साथ रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी की स्थापना की, और दोनों देश लोकतंत्र और कानून के शासन के प्रति सम्मान जैसे मूल्यों को साझा करते हैं। जापान सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और लोगों के बीच आदान-प्रदान सहित कई क्षेत्रों में भारत के साथ अपने बुनियादी संबंधों को और मजबूत करने के लिए काम कर रहा है। मई 2013 में, प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने जापान का दौरा किया, और प्रधान मंत्री अबे ने जनवरी 2014 में भारत का दौरा किया। पाकिस्तान में, जो आतंकवाद से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नागरिक सरकार ने पहली बार कार्यालय में पूर्ण कार्यकाल पूरा किया , और मई में हुए चुनावों के माध्यम से सत्ता का लोकतांत्रिक परिवर्तन हासिल किया। जापान पाकिस्तान के सकारात्मक प्रयास को प्रोत्साहित करना जारी रखेगा और क्षेत्र और पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए उसके साथ सहयोग करेगा।

कि हम इस रास्ते पर आगे बढ़ते रहेंगे। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की भावना के तहत जापान विश्व की शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करेगा।

अफसोस की बात है कि यह हकीकत है कि यासुकुनी तीर्थ की यात्रा एक राजनीतिक और कूटनीतिक मुद्दा बन गई है। कुछ लोग युद्ध अपराधियों को श्रद्धांजलि देने के रूप में यासुकुनी की यात्रा की आलोचना करते हैं, लेकिन आज मेरी यात्रा का उद्देश्य, मेरे प्रशासन के कार्यभार संभालने की वर्षगांठ पर, युद्ध में मारे गए लोगों की आत्माओं के सामने रिपोर्ट करना है कि मेरे प्रशासन ने एक वर्ष तक कैसे काम किया है और इस प्रतिज्ञा को नवीनीकृत करने के लिए कि जापान को फिर कभी युद्ध नहीं छेड़ना चाहिए।

चीनी और कोरियाई लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना मेरा बिल्कुल भी इरादा नहीं है।' मेरी इच्छा है कि एक-दूसरे के चरित्र का सम्मान करें, स्वतंत्रता और लोकतंत्र की रक्षा करें, और चीन और कोरिया के साथ सम्मानपूर्वक दोस्ती करें, जैसा कि यासुकुनी तीर्थ का दौरा करने वाले पिछले सभी प्रधानमंत्रियों ने किया था।

मैं आप सभी से दयालु समझ का अनुरोध करना चाहता हूँ।



પેહલા ખલીફા અને સામાજિક કાર્યકર .

 *મુસલમાનો વિચારો આ તરફ.*


   મુસ્લિમ સમાજ માટે સક્રિય સામાજિક કાર્યકર્તા અને મીડિયા કર્મીઓ જેઓ સમાજની વર્તમાન અલગ અલગ પરિસ્થિતિમાં પોતાની ભૂમિકા ભજવી રહેલ છે, જેઓ હાલ પોતાના જીવનના લાંબા અને *અગણિત પ્રયાસ કરવામાં આર્થિક ભિસામણમાં ચાલી રહેલ છે,* જેમાં ઘણા મુસ્લિમ સમાજ માટે નિસ્વાર્થ મેહનત કરી રહેલ છે. જેમના કાર્યો માટે સમાજ આર્થિક મદદ નહિ કરે તો *વિચારો આગળ મુસ્લિમ સમાજ ક્યાં પોહચી શકે છે .*

ઇસ્લામના પેહલા ખલીફા હજરત અબુબકર સિદ્દીક ર. અ. જેમણે સરકારે દોઆલમ સ. અ. વ. ના દુનિયાથી પરદો ફરમાવી ગયા બાદ મુસ્લિમ સમાજ માટે નેતવૃત્વ કરવા માટે ખલીફા બનીયા પણ તેમણે *પોતાની જવાબદારી સંભાળતા પેહલા મુસલમાનો ને આહવાન કરીયું કે હું ત્યારેજ મારી સંપૂર્ણ ખિદમત આપી શકું* જ્યારે માલે ગનીમત માથી એક હિસ્સો મરા પરિવાર માટે નક્કી કરવામાં આવે. *ખુલાસો હદીસ નંબર ૨૦૭૦ ના હવાલાથી લખેલ છે.*

હવે વિચારો જ્યારે ઇસ્લામના પેહલા ખલીફા પોતાના પરિવાર માટે મુસલમાનો ને માલે ગનીમત માથી નિર્ધારિત રકમ માટે આપણાં સામે એક મોટો મેસેજ આપી રહ્યા છે, તો આવા કપરા સમયે જ્યારે ભારતના મુસલમાનો સામાજિક અન્યાય અને ઘણા વિવાદોનો સામનો કરતા હોય ત્યારે પોતાની ફર્ઝ સમજી પોતાની ઈચ્છાથી સમાજ માટે પોતાનાથી બનતા પ્રયાસ કરતા હોય ત્યારે શું સમાજ આવા નીડર બાહોશ અને સમાજના સાહસીક યુવાનો માટે પોતાની હલાલ કમાઈ માથી નાની રકમ નથી આપી શકતા ❓ઘણા મુસ્લિમ એક્ટિવિસ્ટ અને પત્રકાર આજે આર્થિક ભિસામણમાં ચાલી રહેલ છે, જેમના હોસ્લા પસ્ત થઈ રહેલ છે. જેમના કાર્યોને અને તેમના હાથ મજબૂત કરવા માટે સમાજ માથી ૧૦% લોકો નાની નાની રકમ આપવા માટે તૈયાર થાય તો ઘણા કામો મજબૂતી સાથે મુસ્લિમ સમાજ માટે આગળ વધી શકે છે.


 *આપનો વિશ્વાસુ.*
✒️ Huzaifa Patel
    Dedicated Worker
   Wh. 9898335767

Thursday, 21 March 2024

सहल कुरेशी ।

Date. 20 मार्च 2024।

 डरा किसी के बाप से नहीं हूं, सिवाए हम सब के एक पालनहार के!

दोस्तों बड़े ही दुख और भारी मन के साथ आप लोगों को बताना चाहता हूँ की मैंने अपने 17 साल के पत्रकारिता के करियर पर पूर्णविराम लगाने का फ़ैसला किया है। मैं एक आलिम का बेटा हूं, मेरे वालिदेन ने मुझे हमेशा हलाल लुक्मा खिलाया और हराम लुक्मे से दूर रहने की हर क़दम नसीहत की। अल्हुम्दुल्लाह मेरे रब ने आज तक हराम लुक्मे से मुझे बचाए रखा और इंशाअल्लाह मरते दम तक बचाकर ही रखेगा। हराम लुकमा कभी भी इस गले से नीचे नहीं उतरा, शायद यही वजह थी कि बेताबी, बेक़रारी, बेबसी और मज़बूती के साथ इस हलक से मज़लूमों के लिये और इंसाफ़ के लिए दहाड़ कर आवाज़ दिल से निकला करती थी, चाहे सामने कितनी ही बड़ी कोई ताक़त क्यों ना हो!

मैं कभी भी शोहरत का भूखा नहीं रहा लेकिन मेरे रब ने आप लोगों के ज़रिये बेपनाह मुहब्बत और इज़्ज़त दी। इतनी इज़्ज़त दी जितनी मैंने ख़्वाबों में भी नहीं सोची थी। Desh Live का माइक देखकर मज़लूम की आँखों में इंसाफ़ की उम्मीद की चमक को मैंने काफ़ी क़रीब से देखा है। उन उम्मीदों के पहाड़ को अब ज़्यादा नहीं ढो सकता इसके लिए तहें दिल से आप लोगों से माफ़ी भी चाहता हूँ।

मैंने अपनी पत्रकारिता के पूरे 17 साल के करियर में हमेशा ग़रीब, मज़लूम, सच और इंसाफ़ की लड़ाई को हमेशा पहले पायदान पर रखा और कभी भी किसी भी हाल में अपने ज़मीर का सौदा नहीं किया!

मैं कभी भी उन तोड़बाज़ या ब्लैकमैलर पत्रकारों की गैंग का हिस्सा नहीं रहा या मैंने उन तोड़बाज़ या उगाही करनेवाले पत्रकारों की क़तार में कभी ख़ुद को नहीं रखा। खुदको अगर उनकी क़तार में रखता तो शायद आज ऐश की ज़िंदगी जी रहा होता! लेकिन मेरे रब को क्या मुँह दिखाता?

माना कि गुजरात का मुसलमान धनाढ्य है, पैसेवाला है लेकिन वह पैसा शायद डराने-धमकानेवाले ब्लैकमैलर और तोड़बाज़ पत्रकारों के लिए ही निकलता है, इंसाफ़ के पैरोकारों के लिये नहीं! वरना क्या पूरे गुजरात में या अहमदाबाद में ऐसे 100 साहिबेमाल नहीं होंगे जो हर महीने बिला नागा सिर्फ़ 1000 रुपया इंसाफ़ के नाम पर दे सके?

मेरा भी परिवार है बीवी बच्चे हैं, काफ़ी और ज़िम्मेदारियां भी है क्यों कि मैं भी एक पिता हूँ, पति हूँ, बेटा हूँ और भाई भी हूँ। उन तमाम ज़िम्मेदारियों को पूरा करना भी मेरा दायित्व है इसीलिए लाइट, कैमरा, एक्शन की चका चौंध से दूर पत्रकारिता को अलविदा कर अब मीडिया से अलग किसी नौकरी की तलाश में हूँ। (सेल्स, मार्केटिंग या रिसेपशनिस्ट)

मैंने हमेशा लोगों से आर्थिक समर्थन माँगा (कुछ लोगों ने इसके लिए मुझे बुरा-भला भी कहा) और 100-50 या उस से कुछ ज़्यादा जो पैसा मुझे मिला उसकी एक-एक पाई इंसाफ़ की लड़ाई में ही खर्च की मैंने (आप लोगों की तरफ़ से महीने में तक़रीबन 2-3 हज़ार रुपया मिलता था और किसी महीने कुछ भी नहीं)

आप लोगों की तरफ़ से की गई छोटी से छोटी मदद का एक-एक पैसा भी मैंने कहीं बेजा ख़र्च नहीं किया। और फ़ख़्र से कह सकता हूं कि कोई यह नहीं कह सकता कि किसी का एक पैसा भी हराम रास्ते से या काम करवाने के नाम पर मैंने लिया हो। वरना पत्रकार तो FIR करवाने के भी 5 हज़ार वसूल लेते हैं, बिल्डरों से भी 20-25 हज़ार हर महीने ले ही लेते हैं! ख़ैर उनका जवाब क़ब्र मैं वह ख़ुद देंगे! मुझे सुकून है कि मेरे रब के सामने मुस्कुराते हुवे ख़ाली हाथ खड़ा रहूँगा 😇

मेरे लायक़ कोई Respectful नौकरी हो तो बताइएगा, उम्मत से थोड़े से respect की उम्मीद तो मीडिया का माइक हाथ में लिए बिना भी कर ही सकता हुना? Desh Live अब कौन चलाएगा वह तो रब ही जाने!

आपकी दुआओं का तलबगार

आपका सहल क़ुरैशी Sahal Qureshi Official😊

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Tuesday, 5 March 2024

शब्दो की मायाजाल ।

 *शब्दो की मायाजाल*

      युगा युग समय स्माय पर इंसान ने शब्दो के बदलाव में बहुत सी चालाकी की हे, जिससे कुछ लोगों को फायदा हुवा और मानव समाज के बड़े हिस्से को नुकसान हुवा जिसको समझने के लिए में आपके सामने तीन शब्द (अल्फाज) लेकर आया हु।

1 Romance ।
2 वेदना ।
3 दिने इस्लाम Vs मजहबे इस्लाम।

सबसे पहले *Romance* जिसको हम सुनने के बाद क्या समझते हे ? इसका अर्थ क्या हे ? इसको समझे। रोमांस का मतलब क्या होता है? *रोमांस एक अहसास है जिसकी गहराई को सिर्फ महसूस किया जा सकता है। किसी प्रिय से निगाहे मिलने पर दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं और तन-मन में स्पंदन सा महसूस होता है, इसे ही तो रोमांस कहते हैं। रोमांस शब्दों का मोहताज नहीं है, यह आंखों और इशारों की भाषा खूब समझता है। रोमांस के बिना प्रेम का अस्तित्व नहीं होता।*

ये आजकल अभ्यास में बताया जाता हे, असल में Romance एक रोमन कालकी भाषा का शब्द हे जिसका अर्थ (मतलब) *रोज मर्रा के काम* यानी के रोज की गतिविधियां होता हे। 

अब दूसरे शब्द को लेकर आगे बढ़ते हे, *वेदना* जो एक पाली भाषा का शब्द हे, *जिसको हम आज समझते हे दर्द अथवा तकलीफ समझते हे* लेकिन इसको बड़ी चालाकी से बदल दिया गया हे, जिसका असल में मतलब होता हे, स्वयम की अनुभूति से हासिल की हुई विद्या को *वेदना* पाली भाषा में होता हे। *विद्या*


तीसरे नंबर पर इस्लाम से जुड़े विषय पर हे, *दिने इस्लाम और मजहब इस्लाम* हम मुस्लाम मजहब ज्यादा बोलते हे, जिसका कारण हे दीने इस्लाम के मेकिनिजम जो हे उसको बड़ी चालाकी से इस्लाम और इंसानियत के दुश्मनों ने बदल दिया हे, मजहबे इस्लाम में सिर्फ कुछ रस्मे हे, इबादत हे, अखलाक हे, बाकी सभी दीने इस्लाम के मेकिनिजाम को बदल दिया गया हे, दिन का मतलब होता हे *निजाम* जिसको मजहब से बदल दिया गया दुश्मन इस्लाम ने बड़ी चालाकी से इसको हमारी किताबो और दिमागो में बिठा दिया है, जेसिका मकसद था मुस्लिम दीने इस्लाम से हटकर मजहबे इस्लाम पर आ जाए, निजाम को छोड़कर चंद अमल को इस्लाम समझने लगे। जिसमे ये लोग सफल हुए जिसकी वजह से दुनिया में आज मुस्लिम अल्लाह के निजाम से दूर और शैतानी निजाम के शिकार होते हे।

      ✒️ Huziafa Patel
       Dedicated Worker
       Wha.9898335767

   शब्दों की मायाजाल दिमाग के साथ खेलवर करने के लिए शैतानी और शोषण करने वाली ताकत हमेशा करती हे।


   आर्टिकल उपयोगी हो तो आगे शेर करे।

Monday, 4 March 2024

हैदराबाद हाईकोर्ट मुस्लिम सादी सुदा महिला लिविंग रिलेशनशिप ।

  शादीशुदा मुस्लिम महिला का लिव-इन में रहना हराम है', HC ने शरीयत का हवाला देकर खारिज की महिला की याचिका
हिंदू पुरुष के साथ रह रही एक शादीशुदा मुस्लिम म..

   

. https://www.aajtak.in/uttar-pradesh/story/allahabad-hc-denied-protection-to-a-muslim-married-woman-who-was-in-a-live-in-relationship-with-hindu-man-ntc-1890581-2024-03-02