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Monday, 15 December 2025

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                              ભરૂચ 
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                           અંકલેશ્વર 
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                             હાંસોટ 
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                            વાલિયા 
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                               ઝઘડીયા 
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                             નેત્રંગ 
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                              વાગરા 
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                              આમોદ
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                            જંબુસર 


જે મિત્રો ને પોતાના તાલુકા ક્ષેત્રે  ગુરૂપ મા જોડવામાં  કોઈપણ  ટેકનિકલ  સમસ્યા આવે તેવા સમયે અથવા આપના તાલુકા ના ગુરૂપ મા મેમ્બર્સ વધુ થવાથી આપ ગુરૂપ મેમ્બર્સ ના બની સકતા હોય તેવી  સમસ્યા સમયે ગુરૂપ એડમીન નો સંપર્ક કરવા વિનંતિ છે.

ગુરૂપ ઉદ્દેશ્ય  અને નિયમો સાથે  તેના લાભો વિષયમાં  વધુ  નિચે વાંચો.


Thursday, 19 June 2025

टेस्ला वायरलेस इलेक्ट्रिकसिटी फ्री कम दामों में इलेक्ट्रिक भविष्य ।


 निकोला टेस्ला (Nikola Tesla) ने वायरलेस इलेक्ट्रिसिटी यानी बिना तार के बिजली ट्रांसफर का सपना देखा था, और उस पर कुछ हद तक काम भी किया था। लेकिन इसे पूरी तरह कभी लागू नहीं किया जा सका। आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
      
        
🔌 टेस्ला का वायरलेस इलेक्ट्रिसिटी का सपना

टेस्ला ने 1890 के दशक में वायरलेस पावर ट्रांसमिशन की थ्योरी दी थी।

उनका मानना था कि धरती की सतह और आयनमंडल (ionosphere) के बीच एक तरह का "रेज़ोनेन्स" बनाकर बिजली को वायरलेस तरीके से कहीं भी भेजा जा सकता है।

उन्होंने वॉर्डेनक्लिफ टावर (Wardenclyffe Tower) नाम का एक बड़ा प्रोजेक्ट शुरू किया, इसका उद्देश्य था पूरी दुनिया में मुफ्त वायरलेस बिजली और वायरलेस संचार भेजना।

❌ क्या इसे रोका गया❓

हाँ, इसे रोका गया कारण:

1. फंडिंग का रुक जाना:
टेस्ला को इस प्रोजेक्ट के लिए पैसे J.P. Morgan जैसे निवेशकों से मिले थे, लेकिन जब उन्हें पता चला कि इससे बिजली मुफ्त में मिलेगी, तो उन्होंने फंडिंग बंद कर दी।

2. बिजनेस मॉडल को खतरा:
उस दौर में बड़ी कंपनियाँ बिजली बेचने के बिज़नेस में थीं। टेस्ला का सपना बिना बिल के बिजली देना था, जो इन कंपनियों को बिल्कुल भी मंज़ूर नहीं था।

3. तकनीकी सीमाएं:
उस समय की टेक्नोलॉजी इतनी विकसित नहीं थी कि टेस्ला का आइडिया पूरी तरह कारगर साबित हो सके।

⚡ क्या वायरलेस इलेक्ट्रिसिटी से मुफ्त बिजली मिलती❓

तकनीकी रूप से नहीं, लेकिन टेस्ला की सोच थी कि:

एक बार वायरलेस पावर नेटवर्क बन जाए, तो लोग किसी भी जगह पर रिसीवर लगाकर बिजली ले सकते हैं।
इसका मतलब यह हुआ कि बिजली का metering (नापना) और बिलिंग मुश्किल हो जाता,इसलिए कंपनियों को घाटा होता।

इसलिए टेस्ला चाहते थे कि बिजली को इंसानी ज़रूरत की तरह ‘मुफ्त और सार्वभौमिक अधिकार’ बनाया जाए, जैसे हवा और पानी।

🔍 आज की स्थिति क्या है❓
आज वायरलेस चार्जिंग (जैसे मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक कार) संभव है, लेकिन यह छोटे स्केल पर है।
एलन मस्क की टेस्ला कंपनी का नाम निकोला टेस्ला के सम्मान में रखा गया है, लेकिन वह फिलहाल वायरलेस पावर पर नहीं, बल्कि बैटरी स्टोरेज और सोलर एनर्जी पर काम करती है।

🧠 निष्कर्ष
हाँ, निकोला टेस्ला ने वायरलेस इलेक्ट्रिसिटी का सपना देखा था।
हाँ, उसे बड़े कॉर्पोरेट और निवेशकों ने बंद करवा दिया क्योंकि इससे मुफ्त बिजली मिलती और मुनाफा खत्म होता।
यह विज्ञान और पूंजीवाद के टकराव का एक बड़ा उदाहरण है।

Wednesday, 18 June 2025

सेक्युलरिज़्म का छलावा: वोट लिया, हिस्सेदारी छीनी।


🔴 "मुसलमानों का सत्यानाश, यह है कांग्रेस की कमाल"

यह 67 साल की तथाकथित आज़ादी (1947–2014) में सरकारी सेवाओं और विभागों में मुस्लिम भागीदारी को लेकर आरोप लगाती है कि कांग्रेस और अन्य सेक्युलर कहे जाने वाले दलों ने मुसलमानों को राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल किया, लेकिन वास्तविक भागीदारी से वंचित रखा।

📊 टेबल का विश्लेषण — सरल और स्पष्ट भाषा में

1. UPSC सेवाएं (IAS, IFS, IPS)

सेवा कुल कर्मचारी मुस्लिम प्रतिशत

IAS 4790 142 2.96%
IFS 828 15 1.8%
IPS 3209 128 4.0%


👉 निष्कर्ष: सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवाओं में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 3% से भी कम है।

2. अन्य सरकारी विभाग

विभाग कुल कर्मचारी मुस्लिम कर्मचारी गैर-मुस्लिम (%)

भारतीय रेल 14 लाख 64,000 98.7%
राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी 1.9 लाख 60,000 96%
डाक व तार विभाग 2.7 लाख 13,759 98.6%
राष्ट्रीयकृत बैंक 6.8 लाख 15,030 2.2%
रिज़र्व बैंक 19,000 150 0.78%
सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम 6.88 लाख 22,387 3.3%


👉 निष्कर्ष: जहां कर्मचारियों की संख्या लाखों में है, वहां मुस्लिम प्रतिनिधित्व केवल 1–3% के बीच है।

⚖️ पृष्ठभूमि का विश्लेषण — कांग्रेस बनाम हक़ीक़त

1. 1947 में मुस्लिम भागीदारी:

आरोप है कि आज़ादी के समय मुस्लिमों की हिस्सेदारी लगभग 33% थी, लेकिन अब घटकर मात्र 1.5%–2% रह गई है।

जबकि जनसंख्या अनुपात 14% से ऊपर है।

2. कांग्रेस की भूमिका:

मुस्लिम समाज ने कांग्रेस को लगातार वोट दिया।

बदले में क्या मिला? — न न्यायपालिका, न प्रशासन, न बैंकिंग, न सुरक्षा तंत्र में जगह।



3. धोखा किसने दिया?

BJP को दुश्मन बताया गया, लेकिन कांग्रेस व अन्य सेक्युलर दलों ने शब्दों में दोस्ती और हकीकत में बेजारी दिखाई।

सच्चा शोषण तो उन्हीं दलों ने किया जिनका मुस्लिमों पर “तथाकथित भरोसा” था।

🧠 क्रिटिकल प्वाइंट्स (हमारे अंदाज़ में):

🔻 1. टेबल का उपयोग भावनात्मक है, लेकिन आंकड़े सच्चाई का आइना हैं।

अगर ये आंकड़े सच्चे हैं (जो सच्चर कमेटी रिपोर्ट, NSSO और सरकारी आंकड़ों से मेल खाते हैं), तो ये अलार्मिंग हैं।


🔻 2. कांग्रेस और सेक्युलर दलों की असली रणनीति:

"वोट लो, मगर बराबरी मत दो।"

Representation से ज्यादा Importance सिर्फ Emotion को दी गई।


🔻 3. ये आंकड़े BJP की पैरवी नहीं करते, बल्कि कांग्रेस की असलियत उजागर करते हैं।

पोस्ट के आखिर में जो लिखा है:

> "बीजेपी दुश्मन है, कांग्रेस उससे भी खतरनाक दुश्मन है।"
यह लाइन दर्शाती है कि मुस्लिम नेतृत्व ने बार-बार गलत भरोसा किया।





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🤔 प्रश्न जो उठते हैं (और उठने चाहिए):

1. मुस्लिम युवा प्रशासनिक सेवाओं से दूर क्यों हैं?

क्या यह सिस्टम का पक्षपात है या अवसर की कमी?



2. क्या कांग्रेस ने कभी मुस्लिम नेतृत्व तैयार किया या सिर्फ 'इमेज' बनाई?


3. क्या मुस्लिम समाज को अब नए राजनीतिक विकल्पों की जरूरत है?

🔍 निष्कर्ष:

ये टेबल सिर्फ डेटा नहीं है, बल्कि राजनीतिक धोखे का इतिहास है।

अगर मुस्लिम समाज ने वोट किया, तो बदले में सम्मानजनक हिस्सेदारी क्यों नहीं मिली?

अब वक्त है फैसले का, कि सिर्फ नारे और वादों से नहीं, हकीकत की बुनियाद पर राजनीतिक समर्थन तय किया जाए।

Tuesday, 17 June 2025

उमर की पहचान । शारीरिक और मानसिक उमर ।

✒️  Huzaifa Dedicated 

विषय: शारीरिक नहीं, मानसिक उम्र बनाती है इंसान को बड़ा

इंसान की उम्र को समझने का एक आम तरीका है — जन्म प्रमाण पत्र में दर्ज वर्षों को देखना। यह उसकी शारीरिक उम्र होती है, जो समय के साथ बढ़ती है और उसके शरीर में झुर्रियों, कमज़ोरी और चाल में ठहराव के रूप में दिखाई देती है। मगर इंसान की एक दूसरी उम्र भी होती है — मानसिक (या वैचारिक) उम्र, जो न तो कैलेंडर से तय होती है, न ही शरीर की चाल से। यह उम्र बनती है उसके अनुभवों, ज्ञान, सोचने-समझने की क्षमता, व्यवहार, संवाद की परिपक्वता और सामाजिक जिम्मेदारियों के निर्वाह से।

मानसिक उम्र का पैमाना

कई बार हमने देखा है कि कुछ लोग भले ही 50 की उम्र पार कर चुके होते हैं, लेकिन उनका सोचने का तरीका, फैसले लेने की शैली, और व्यवहार ऐसा होता है जैसे कोई बचपना अब भी बाकी हो। वे बिना सोचे समझे निर्णय लेते हैं, जिद्द करते हैं, केवल अपनी ही बात को सही मानते हैं और सामाजिक दृष्टिकोण से अपरिपक्व दिखाई देते हैं। यह मानसिक रूप से अपरिपक्व होने का लक्षण है।

वहीं दूसरी ओर, ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जब कोई 25–30 साल का युवा इतना परिपक्व, सुलझा हुआ, संतुलित और विचारशील होता है कि उसके विचार सुनकर लगता है जैसे अनुभवों की पूरी उम्र उसने जी ली हो। उसकी बातें, सोच और निर्णय समाज को दिशा दे सकते हैं। यह होती है मानसिक परिपक्वता — वह अमूल्य तत्व जो केवल आयु से नहीं, ज्ञान, जिज्ञासा, अनुभव और आत्मनिरीक्षण से प्राप्त होता है।

मानसिक उम्र: समाज का भविष्य

जब कोई समाज केवल शारीरिक उम्र को महत्व देने की बजाय, मानसिक उम्र को विकसित करने पर ध्यान देता है — जैसे कि शिक्षा, विमर्श, साहित्य, इतिहास, विचारशील संवाद और सामाजिक मूल्यों पर मंथन — तब उस समाज में वैचारिक क्रांति जन्म लेती है। यह क्रांति तलवार से नहीं, विचारों से आती है; यह दीवारें गिराती नहीं, नई दिशाएं दिखाती है

ऐसे समाजों में युवा पीढ़ी सिर्फ नौकरी या व्यवसाय में कुशल नहीं होती, बल्कि विचारों में नेतृत्वकारी होती है। वे समाज को जोड़ते हैं, समझाते हैं, और ज़िम्मेदारी से बदलते हैं।

निष्कर्ष

इंसान की असली परिपक्वता उसकी उम्र से नहीं, उसके सोचने के स्तर से आंकी जाती है। एक अक्लमंद इंसान वह है जिसकी मानसिक उम्र उसके शारीरिक उम्र से आगे हो। वह युवा होते हुए भी समाज की गहराइयों को समझता है, निर्णयों में संतुलन रखता है, और परिवर्तन का वाहक बनता है।

इसलिए, आज की ज़रूरत यह नहीं कि लोग सिर्फ उम्रदराज़ हों, बल्कि यह है कि वे अंदर से बड़े बनें — विचारों से, व्यवहार से, दृष्टिकोण से

"शरीर की उम्र से नहीं, सोच की ऊंचाई से मापा जाता है इंसान।"



हमने देखा हे. CORONA VIRUS & LOCKDOWN

था। ेवरेॆ


                               हमने देखा हे.
                       🖋️ Huzaifa patel
Date:- 10 jul 2020

     "कोरोना वायरस & लोकडाउन"

इमान के दावों को चिल्लाने वालो के खोखले इमान को हमने देखा हे.

इमान के बडे बडे दावों  को बिमारी के दरसे कमजोर होते हमने देखा हे.

मस्जिदों मे फरज नमाज मे नमाजीयों को कंद से कंदा छोड़कर दुर दुर खडे हमने देखा हे.

मिंम्बरो से खिताब करने वालो मे इमानी कुव्वत भुलाकर कोरोना का दर  हमने देखा हे.

मिल्लत को मजलूम, लाचार और गुलाम बनाने वाली रेहबरी को हमने देखा हे.

दिने इस्लाम के नाम पर मजहबी फिरका वारी सोच पर कोम की बली चरहाने वालों को हमने देखा हे.

इस्लाम के इन्कलाब को मुस्लिम  रहबरों के हाथों से कमजोर होते हमने देखा हे.

इमान की कुव्वत के साथ  कुरबान होने वालों को इस जमाने मे गुमनाम होते हमने देखा हे.

मुस्लमान होने पर मुस्लिम नौजवानों को बरसों जेलों मे केडी बनाकर रखने वाले निजाम को .हमने देखा हे.

मुसलमान होने पर करोड़ों इन्सानों को जालीम के जुल्म का शिकार होते हमने देखा हे.

इन्तिहाइ गुरबत के हालात मे दुनिया के निजाम बदलने वाले इतिहास को सिर्फ और सिर्फ किताबों और बयानों मे हमने देखा हे.

वुसअत और गूर्बत  का जमाना हमने देखा हे.

अपने आपको हालात से कभी गिरकर उठना और हक की आवाज को बुलंद करते  हमने देखा हे.

इमान की ताकत पर हक बोलते हुये अपने आपको हमने देखा हे.

गुलामी और बरबादी की रेहबरी मे शिकार होते जमाने को हमने देखा हे.

झूठे मक्कारों को रेहबरी की सकल सुरत मे सौदेबाजी करते रहेबरों को हमने देखा हे.

गुलाम जमाने को रेहबर (लीडरशिप) की मक्कारी मे बरबाद होते  हमने देखा हे.

सर उठाकर लीडर के दावेदारों को हमारे सामने जलील होकर सर झुका ने वालों को  हमने देखा हे.

चंद दौलत के लिये इमान का सौदा करने वाले सौदागरों को हमने देखा हे.

दुनिया को बदलने का दावा करने वालो को दुनिया का गुलाम बनते  हमने देखा हे.

जमाने मे झूठी  तारीफ और ताने (बुराई) करते मतलब परसत गद्दारों को हमने देखा हे.

बडे बडे बुरे हालात से निकाल ने  खुदा की मदद का सुकर करते अपने आपको  हमने देखा हे.

खुदा का सुकर हे हमेशा हक बात पर अपने आपको हमने देखा हे.

हालात कैसे भी हो डटकर सामना करते हुये अपने आपको हमने देखा हे.


सुकरीया साथियों पूरा पढ़ने के लिये.

Huzaifa Patel, Bharuch GUJ.
      (Dadicated Worker)