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Tuesday, 16 April 2024

EVM और VVPET मशीन पर सुप्रीम कोर्ट और वकील।

Date 16 April 2024  
दोस्तों नमस्कार कल शाम पाँच बजे लोकसभा की एक सौ दो सीटों पर चुनाव प्रचार थम जाएगा क्योंकि इन एक सौ दो लोकसभा सीटों पर उन्नीस तारीख को वोटिंग होगी
और सत्रह तारीख को प्रचार का थमना यानी कल और दो दिनों के बाद यानी उन्नीस तारीख को वोटिंग का होना इन दो तारीख को के बीच में एक तारीख अट्ठारह एप्रिल की है
और अट्ठारह अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट को यह फैसला ईवीएम के बारे में लेना है कि इस देश के भीतर में जो मौजूदा स्थिति ईवीएम को लेकर है उसी रास्ते चुनाव होगा या फिर जो मांग लगातार की जा रही है कि वीवीपैट हंड्रेड परसेंट होना चाहिए और जब कोई
वोटर वोट डालता है तो जो वीवीपैट पर्ची जाती है उसमें दी गई संख्या जानी ईवीएम की संख्या और दूसरी तरफ वीवीपैट में पड़ी पर्ची इन दोनों का मिलान होना चाहिए या नहीं होना चाहिए
तो क्या यह वाकई संभव है कि एक दिन के बाद वोटिंग है और एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट को फैसला देना है आज तकरीबन ढाई तीन घंटे लंबी बहस चली इस बहस के भीतर ले एडवोकेट प्रशांत भूषण एडवोकेट संजय हेगड़े और एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने
जिन बातों को रखा उसने दो तीन मैसेज इस देश के भीतर साफ करती है
पहला सवाल तो यही था कि अंतरराष्ट्रीय तौर पर ईवीएम को लेकर जो भी सवाल जिन भी देशों में उठे क्या वो सवाल गैर वाजिब थे
इस दौर में वोटर अगर अपने हाथों में पर्ची को छू लेगा तो इससे चुनाव आयोग को क्या असर पड जायेगा जब उसे इस बात का अंदेशा है कि वह जिसे वोट दे रहा है ईवीएम के मशीन के बाद व वोट उसे नहीं पढ़ रहे हैं
और तीसरी परिस्थिति है सिर्फ सात सेकेंड के लिए एक लाइट जलती है और उस लाइट के जरिए व देख पाता है कि उसे वोट जिसे दिया है उसे व पर्ची के तौर पर गया है या नहीं गया है
इस सात सेकंड के खेल के भीतर क्या यह संभव नहीं है जो सवाल इस देश के भीतर में है उन सवालों का समाधान सुप्रीम कोर्ट करें चुनाव आयोग को निर्देश दे इतनी बड़ी तादाद में ईवीएम की मशीन पर जो खर्च हुआ पाँच हज़ार करोड़ का तो इस देश के भीतर न तो पैसे
की कमी है और ना ही वक्त की क्योंकि लोकसभा चुनाव दो महीने तक चलेगा
और खुद चुनाव आयोग ने कहा है कि अगर वीवीपैट के जरिए पर्चियों का मिलान ईवीएम से किया जाएगा तो बारह दिन उसकी गिनती में लग जाएंगे तो क्या फर्क पड़ता है बारह दिन की गिनती हो या फिर इस दौर में चुनाव प्रक्रिया को लेकर जो सवाल जनता के भीतर है जो
अलग अलग पोल सर्वे में निकल कर आ रहे हैं यहां तक कि एक हफ्ते पहले जो सीएसडीएस जो कि केन्द्र सरकार द्वारा ग्रांट के जरिए जो संस्था चलती है उसने भी जो ईवीएम को लेकर चुनाव आयोग को लेकर जो सवाल किए व दो हज़ार उन्नीस की तुलना में दो हज़ार चौबिस
में दोगुने से ज्यादा लोग बढ़ गए जिनको विश्वास नहीं है चुनाव आयोग को लेकर या ईवीएम को लेकर लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने तौर पर उस तर्क को खारिज कर दिया कि ऐसे सर्वे को हम नहीं मानते हैं लेकिन इन सबके बावजूद भी एडवोकेट प्रशांत भूषण एडवोकेट
संजय हेगड़े और एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने जो तर्क दिए हमें लगता है आज उन बातों को आपको सुनना चाहिए क्योंकि दो दिन के बाद सुप्रीम कोर्ट को यह फैसला देना है और आज जब ढाई घंटे की तमाम सुनवाई होती रही तो सुप्रीम कोर्ट की आखिरी लाइन यही टी वी विल टेक का कौन थे
विल यू बी हैप्पी विदा प्राइवेट सेक्टर मैन्युफैक्चरिंग मशीन यानी हम गुरुवार को सुनवाई करेंगे और क्या आप निजी क्षेत्र द्वारा मशीन निर्माण से खुश होंगे यहीं पर बहस आकर रुक गई
तो क्या यह माना जाए कि सुप्रीम कोर्ट अट्ठारह तारीख को कुछ और मशीनों के मैन्युफैक्चरिंग का निर्देश किसी प्राइवेट सेक्टर के मशीन निर्माता को दिए सकता है क्या इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट फैसला लेगा
क्या यह मान लिया जाए कि चूंकि एक दिन के बाद ही वोटिंग होनी है तो अब बैलेट पेपर की बात तो दूर की गोटी हो गई लेकिन इस दौर में पचास फीसदी भी वीवीपैट होगा या नहीं होगा क्योंकि बहस के दौर में यह मुद्दा भी उठा कि पचास फीसदी भी हो जाए तो इससे जनता के भीतर एक राहत
महसूस की जायेगी और मानेगा कि हां एक ट्रांसपेरेंट इलेक्शन हो रहा है चुनाव आयोग करा रहा है
इन दोनों परिस्थिति के बीच में कई चीजें राजनीतिक तौर पर इस देश में बड़ी मायने रखती है
और हमें लगता है कि आज उन एक के पन्नों को खोला जाए
उससे पहले चुनाव आयोग को लेकर कल प्रधान मंत्री ने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि चुनाव आयोग में सुधार तो उन्होंने ही किया है
इससे पहले तो न जाने कैसे कैसे चुनाव आयुक्त पार्टियों द्वारा तय हो जाते थे उसके बाद व पार्टियों के चुनाव पर युद्ध पर चुनाव लड़ लेते थे यानी को पार्टी मेम्बर होते थे और चुनाव आयोग उन्हें बना दिया जाता था उन्होंने ही सुधार किया कि जब विपक्ष के नेता की भी मौजूदगी चुनाव
आयुक्त की नियुक्ति को लेकर होगी
प्रधानमंत्री ने यह क्यों कहा जबकि उससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने जिस पैनल का जिक्र किया था उस पैनल में प्रधानमंत्री देश के चीफ जस्टिस और विपक्ष के नेता की मौजूदगी के रहने को सही बताया गया था लेकिन एक झटके में महीने भर के भीतर पार्लियामेंट में
विधेयक लाकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलट दिया गया और कहा गया जी नहीं चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में चीफ जस्टिस का क्या का तो प्रधानमंत्री करेंगे और प्रधान मंत्री द्वारा नियुक्त कोई कैबिनेट मिनिस्टर रहेगा और एक विपक्ष का नेता रहेगा और इस बार भी चुनाव ऐलान के ऐन पहले जो दो चुनाव आयुक्तों
की नियुक्ति हुई उस पर विपक्ष के नेता के तौर पर अधीर रंजन चौधरी ने खुल्लम खुल्ला कह दिया कि देखिए सब फिक्स है
लेकिन फिर भी आज आप सुन लीजिए चुनाव आयोग के बारे में प्रधानमंत्री की राय है क्या हमने इलेक्शन कमीशन में सुधार किया है
आज इलेक्शन कमीशन बनता है तो कोई दूसरा होता है पहले तो प्रधानमंत्री एक फाइल पर साइन कर गए इलेक्शन कमीशन बना दे
और जो उनके परिवार में निकट जुड़े ऐसे मिले हैं
कमीशन मध्यम गर्मी बढ़ेगी
ऐसे लोग इलेक्शन कमीशन बने रहें जो वहां से निकलने के बाद राज्यसभा मेंबर बने उनके सरकार के मिनिस्टर बने ऐसे इलेक्शन कमिश्नर बनर्जी जो कांग्रेस के बाद में कैंडिडेट बने और इसलिए
हम उस लेवल पे ले नहीं कर सकते हैं
हमारा लेवल प्रभेद हो ही नहीं सकता हम ऐसे बनी नहीं रण में हम अच्छे रास्ते भर जाना चाहते हैं गुजरात में जाना जाता है
दूसरी बात है
आखिर ईडी सीबीआई जैसे बड़ी दीदी वगैरह का दर्द आप देखेंगे
कमीशन अपने कहावत है
नाथ न जाने आंगन रहा
इसलिए कभी ईवीएम का बहाना कर देंगे कभी मूलतः
पराजय के लिए वो कुछ
रीजनिंग अभी से सेट करने में लगे
तो प्रधान मंत्री का कहना है नाच न जाने आंगन टेढ़ा इस देश के भीतर चुनाव होने जा रहे दो तीन दिनों के भीतर वोटिंग शुरू हो जाएगी
राजनीतिक तौर पर इस देश के भीतर विपक्ष के तमाम पॉलिटिकल पार्टीज और जनता के भीतर ईवीएम को लेकर सवाल है
और ईवीएम को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कोई सवाल नहीं है
जब चुनाव का ऐलान हो रहा था उस वक्त भी जब चुनाव आयोग से यह पूछा गया तो उन्होंने शायरी भरे अंदाज में इस बात को टाल दिया और आज कल प्रधानमंत्री ने हिन्दी मुहावरे की तर्ज पर नई चीजें गढ़ने की कोशिश की लेकिन सच क्या है और आज सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ
दरअसल इस देश के भीतर जो वीवीपैट की स्थिति है उसमें औसतन हर कॉन्फ्रेंसिंग में लगभग पाँच सौ
ईवीएम होती है और वीवीपैट की व्यवस्था उसमें से पाँच में होती है यह एवरेज है
लेकिन अगर एवरेज का मतलब हुआ सिर्फ एक परसेंट वीवीपैट की व्यवस्था है लेकिन पूरे देश के ऐवरेज में जवाब जिक्र कीजिएगा तो इस देश के भीतर जितनी वीवीपैट की व्यवस्था है वह प्वाइंट जीरो जीरो वन एक फाइव परसेंट है
यही स्थिति है
के भीतर में वीवीपैट को लेता है और यही सवाल आज इस बात को लेकर उठा और याद कीजिए पंद्रह दिन पहले यही मुद्दा जस्टिस गवई की अदालत में गया था
जो एडवोकेट अग्रवाल के जरिए उठाया गया था उस वक्त बकायदा नोटिस जस्टिस गवई ने इलेक्शन कमीशन को दे दिया था आज एडीआर का मामला और एडवोकेट अग्रवाल का मामला दोनों मामले को क्लब करके जस्टिस संजीव खन्ना की अदालत में लाया गया जहां पर इन तीन वकीलों ने सवाल जवाब के
बाद अपनी बात को रखना शुरू किया हमें लगता है उन बातों को सुन लीजिए क्योंकि शुरुआत इसी से हुई कि हम यह नहीं कह रहे हैं कि इस ईवीएम में हेरफेर किया गया
हम कह रहे हैं कि उसमें हेर फेर किया जा सकता है क्योंकि ईवीएम और वीवीपैट दोनों में दो तरह के चुप होते हैं
मैं पहली मेमरी जिसमें प्रोग्राम किया जा सकता है और एक फ्लैश मेमोरी जिसका उपयोग सिम्बल लोडिंग के वक्त किया जाता है और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में प्रतीकों का क्रम अलग अलग होगा और वीवीपैट को प्रतीक के साथ पर्ची प्रिंट करनी होगी और प्रत्येक मशीन में एक प्रोग्राम स्थापित करना
होगा जो यह बताएगा कि यदि नंबर तीन बटन दबाया जाता है तो पर्ची में प्रतीक भी वही दिखाई दे जाए तो यह प्रोग्राम योग्य चिप कही जाती है कोर्ट ने इसके बाद पूछा कि प्रतीक लोडिंग फ्लैश मेमोरी में होती है और यह प्रोग्राम करने योग्य है जो दूसरी तरफ से इन तीन वकीलों का
था इसीलिए आप दुर्भावनापूर्ण प्रोग्राम इंस्टॉल कर सकते हैं यह सवाल उठा यानी मशीन गलत नहीं है उसमें जो इंस्टॉल कर रहा है वह गलत हो सकता इस पर सहमति थी कि मशीन गलत नहीं होती है उसमें जो आप इंस्टॉल कर दीजिएगा वही गलत होगा और इसी को लेकर सवाल फिर इन तीन वकीलों की तरफ से उठा कि
था काश यानी दुनिया के अधिकांश देशों और खासतौर से यूरोपीय देशों में पेपर पर्चियां वापस लौट आई है
तब अदालत ने कहा उस बात का जिक्र करने की जरूरत नहीं तब को अदालत को बताया गया जर्मनी में तो बकायदा इस बात को कहा गया कि ईवीएम पर भरोसा नहीं किया जा सकता तब पूछा गया कि दरअसल जर्मनी की जनसंख्या कितनी है तो कहा गया पाँच छः करोड़ तो वाले भारत भारत में तो पचानवे छियानवे करोड़
रजिस्टर्ड वोटर हो चले हैं यहां चीजें कैसे होंगी तब तीन वकीलों की तरफ से कॉमेंट और आया कि सवाल यह है कि डेमोक्रेसी और चुनाव के बीच में अगर मतदाता को ये एहसास हो जाए कि उसका वोट सही है और सही तरीके से गणना होगी जहां डाला वहीं पड़ा है यह महत्वपूर्ण है या जनसंख्या महत्वपूर्ण
और इन सबके बीच यह भी जानकारी इन तीन वकीलों ने अदालत को दी कि यहां तक भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि आपको पेपर रोल रखना होगा क्योंकि ईवीएम पर भरोसा नहीं किया जा सकता इसीलिए तो वीवीपैट की व्यवस्था की गई और फिर भी प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में पांच
वीवीपैट मशीनों का नमूना लिया गया
और ऐसे में यदि कोई बेमेल है यानी प्रोटोकॉल यह कहता है कि यदि बेमेल वाले निर्वाचन क्षेत्र के अलावे बाकी निर्वाचन क्षेत्र में अंतर उस मतदान केंद्र में मतदाताओं की कुल संख्या से अधिक है तो आप बेमेल को नजरअंदाज कर सकते हैं और ऐसे में या तो दोबारा गिनती कि अगर
स्थिति आती है तो वीवीपैट की गिनती ईवीएम की गिनती पर भारी हो जाए
यानी वीवीपैट की महत्ता बढ़ जाएगी क्योंकि ईवीएम को लेकर सवाल तो पहले से है लेकिन बात यहीं नहीं रुकी दरअसल यह पूरा का पूरा डॉक्यूमेंट इस बात को बतलाता है कि इन सबके बीच जब इन बातों का जिक्र किया जा रहा था तो उसमें एक चीज और थी कि क्या इस चीजों को नजरअंदाज किया जा सकता है और ऐसे
में वक्त थोड़ा बढ़ाया गया और कहा कि आप लंच के बाद हमलोग डिस्कशन करेंगे
और उसके बाद जब हुआ
तब एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कहा हम बैलेट पेपर पर लौट सकते हैं एक और ऑप्शन है कि वोटर्स को वीवीपैट की स्लिप दे दी जाए नहीं तो स्लिप मशीन में जाएगी और यह असली वोटर को दी जा सकती है जो इसे बैलेट बॉक्स में डालेगा
तब कोर्ट ने का ठीक हम आपकी दलील समझ गए तब जस्टिस जवाब देते हुए वकील ने कहा संजय हेगल ने कहा कि दरअसल ईवीएम में पड़े वोट का वीवीपैट स्लिप के साथ मिलान किया जाना चाहिए इतनी सी बात है तब अदालत ने का तो क्या साठ करोड़ वोटों की स्लिप का मिलान ईवीएम
के साथ किया जाएगा तब इस पर गोपाल शंकर नारायण जो एडवोकेट थे उनका कहना है हाँ अदालत ने कहा है बारह दिन लगेंगे
तो बारह दिन लगेंगे तो क्या यह वाकई बहुत ज्यादा है जब दो महीने से ज्यादा वक्त चुनाव में लग रहा है
और जब
आप बता रहे हैं कि एक परसेंट ही वीवीपैट की व्यवस्थाएं तो इसको कैसे सही ठहराया जा सकता है
इस पर एडवोकेट गोपाल शंकर ने कहा कि दरअसल याचिका में बहुत साफ तौर पर लिखा गया में ईवीएम की गड़बड़ी का जिक्र नहीं कर रहे हैं यह तो वोटिंग के दौरान वोटर के भरोसे का सवाल है यानी इस देश के वोटर में भरोसा है या नहीं है यह सवाल बड़ा महत्वपूर्ण है और किसी दूर दराज इलाके में रहने वाले
आदमी के बारे में भी सोच लीजिए जो वोटिंग बूथ में संघर्ष करता है और स्लिप तभी दिखाता है जब सात सेकंड के लिए लाइट ऑन होती है तो वोट डालने में जो स्पर्श का एहसास होता है बैलेट पेपर के जरिए व पूरी तरह खत्म हो चुका है और इसी आधार पर जर्मनी के भीतर
फैसला दिया गया था तो क्या यही यहां पर फैसला नहीं लागू किया जा सकता है
अगर ध्यान दीजिए इस दौर में और इसके ठीक समानांतर इलेक्टोरल बॉन्ड को याद कर लीजिए तो इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर जो सवाल लगातार एटॉर्नी जनरल उठा रहे थे वह भी वैसा ही सवाल था जिसमें इस देश के वोटरों को जानकारी नहीं दी जानी चाहिए कि दरअसल पैसा किसने दिया कि से
दिया
और शायद यह ऐसी प्रक्रिया है इस देश के भीतर में जहां पर पहली बार सवाल सुप्रीम कोर्ट को लेकर इसलिए हो रहा है क्योंकि चीफ जस्टिस की अदालत में इलेक्टोरल बॉन्ड पर फैसला दिया और एक झटके में इस देश के भीतर में वो तमाम कच्चा चिट्ठा निकलकर सामने आ गया कि किसने किस पार्टी
को पैसा दिया और उसका पूरा ट्रॉयल समझ में आया तो यह मान लिया गया कि इससे बड़ा स्कैन कुछ हो नहीं सकता है
लेकिन ध्यान दीजिए जो अदालत में एटॉर्नी जनरल इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर कह रहे थे और आज जो सवाल
तीन एडवोकेट्स उठा रहे थे और कोर्ट ने खामोशी बढ़ते हुए कहा कि हम अट्ठारह को सुनवाई करेंगे तो ऐसे में प्रधानमंत्री से भी जब इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर उनके इंटरव्यू में पूछा गया था तो उन्होंने क्या कहा था उन्होंने कहा था कि दरअसल देखें ये इलेक्टोरल बॉन्ड की खासियत है कि पता चल गया
मनी ट्रेल पता चल गया लेकिन सवाल यह तो सुप्रीम कोर्ट के जरिए पता चला और सुप्रीम कोर्ट के जरिए पता चला और प्रधानमंत्री यह भी कह गए कि उससे पहले पता ही नहीं चलता था तो उससे पहले पता चलता था हमें लगता यह बात हमें आज आपको बतानी चाहिए कि उससे पहले जब इलेक्टोरल बॉन्ड नहीं था उससे पहले की क्या स्थिति थी और प्रधान
स्त्री जब इन बातों का जिक्र कर रहे हैं तो इसका मतलब मायने क्या माना जाए प्रधानमंत्री ने क्या कहा इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर भी जरूर सुनी है
अब देखिए इलेक्टोरल बॉन्ड न होते हैं
तो क्रिस व्यवस्था मतदाता थे कोर्ट रूम के निकालते है कि पैसा कहां से आए और कहा गया है
जितने इलेक्टोरल बॉन्ड सक्सेस स्टोरी है
इलेक्टोरल बॉन्ड थे
आपको ट्रेन मिल रहा है मनिका
जिस कंपनी में भी दिया कैसे दिया कहा दिया तो प्रधान मंत्री ने इलेक्टोरल बॉन्ड को भी अपने हक में बता दिया जबकि पहली बार इस देश के भीतर में संसद द्वारा पास किए गए किसी निर्णय को असंवैधानिक करार दिया सुप्रीम कोर्ट ने यानी इलेक्ट
बॉन्ड पूरे तरीके से गैर कानूनी सुप्रीम कोर्ट ने करार दिया और चूंकि चुनाव का वक्त है और राजनीतिक तौर पर ये मुद्दे प्रधानमंत्री जो कह रहे लेकिन इसके ठीक समानांतर अगर आप राहुल गांधी को सुनेंगे
वो तमाम जगहों पर घूम घूमकर बता रहे हैं कि दरअसल प्रधानमंत्री अपने इंटरव्यू में भी क्यों झूठ बोल रहे हैं या जिन बातों को कह रहे हैं वो किस तरीके से गलत है और केरल में चुनाव प्रचार के पट पत्रकार का सवाल हो क्योंकि इंटरव्यू एएनआई को दिया गया तो एएनआई के
बाइक को देखकर ही राहुल गांधी जो जवाब देते हैं और उसके बाद पब्लिक के बीच में जाकर जो वह विरोध करते हैं कि प्रधानमंत्री ने क्या कहा एक क्षण के लिए पूरे दृश्य को जरूर देखना चाहिए
अगर आप नाम और तारीख को देखोगे तो आपको पता लगेगा
आपको पता लगेगा
कि
जब उन लोगों ने इलेक्टोरल बॉन्ड दिया है
उसी के एकदम बाद एकदम बाद उनको या तो कॉन्ट्रैक्ट मिला है
या फिर जो सीबीआई का उन पर इंक्वायरी हो रही थी
वहां टाइम तो ये पड़ा था
मंत्री पकड़े गए हैं इसीलिए हैं
एनआईए को इंटरव्यू दे रहे हैं
पकड़े गए हैं
दुनिया का सबसे बड़ा एक संरक्षण स्कीम है और इसके मास्टर माइंड नरेंद्र मोदी जी
अगर आप उनकी आंखों में देख मैंने देखा नहीं है मगर अगर आप उनके हैं किंतु उनकी आंखों में देखेंगे तो आपको झलक दिख जाएगी
जाए
है
है
क्यों नहीं है
है
का हाल
एक सौ तीन कृष्ण
है
आए हैं
है
यानी जनता के बीच सरकार के निर्णय प्रधानमंत्री का इंटरव्यू भी मुद्दा बन सकता है यह अंदेशा इससे पहले जाहिर है मोदी सरकार को रहा नहीं होगा
लेकिन सवाल उसके आगे कहा हमने दरअसल ईवीएम और इलेक्टोरल बॉन्ड दोनों का जिक्र इसलिए किया क्योंकि इस देश के भीतर में सुप्रीम कोर्ट आरबीआई और फाइनेंस मिनिस्ट्री के भीतर से भी जो सवाल उस दौर में उठे थे जब बॉन्ड आया था
और जब ईवीएम को लेकर पहली बार इस देश के भीतर में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया तब कांग्रेस की सरकार थी उस समय बीजेपी विरोध में थी और उसी ने यह सवाल उठाया था यानी परिस्थितियों का उलटना देखी और राजनीतिक सत्ता के जरिए अपने अनुकूल की परिस्थिति को
सही बताने के लिए संवैधानिक संस्थानों के इस्तेमाल को भी देखिए और चूंकि हम यहां पर ईवीएम के समानांतर इलेक्टोरल बॉन्ड का जिक्र आपसे कर रहे हैं तो जरा यह समझ यह जब इलेक्टोरल बॉन्ड नहीं था क्योंकि इससे पहले यह भी सवाल आएगा जब ईवीएम नहीं थी तब कौन सी परिस्थिति थी बूथ लूटने जाते थे कितने दिन पहले
पेपर को गिनने में वक्त लगता था तीन दिन लगता था फैसले तीन से चौथे दिन में आ जाते थे लेकिन एक क्षण के लिए सोचिए कि जब इलेक्टोरल बॉन्ड भी नहीं था इलेक्ट्रोड ट्रस्ट टाटा ने उन्नीस सौ छियानवे में बनाया बिरला ने उन्नीस सौ अट्ठानवे में बनाया और जिस बात का जिक्र किया जा रहा है कि उस वक्त पता नहीं चलता था पैसा का
हा से किस रूप में गया तो सिंगुर में नैनो फैक्ट्री को लेकर ममता से झगड़ा टाटा का हुआ बावजूद इसके टाटा ट्रस्ट ने सत्ताईस लाख रुपए
एमसी को दिए सीपीएम ने मना कर दिया और डोनेशन उसने नहीं लिया उसी दौर में अगर याद कीजियेगा तो शिवसेना ने डोनेशन के लिए दरवाजा खटखटाया था और समाजवादी पार्टी ने भी टाटा का दरवाजा खटखटाया था तो ट्रस्ट जब बना था तो उसके जरिए पैसों की आवाजाही किस कंपनी के जरिए
रही है यह जानकारी होती थी और दो हज़ार नौ दस में यह निर्णय लिया गया था कि सौ फीसदी टैक्स माँ जो भी इलेक्टोरल ट्रस्ट के जरिए पैसा देगा और दो हज़ार छः से लेकर दो हज़ार बारह के बीच में कांग्रेस के पास कुल एक हज़ार छः सौ बासठ करोड़ रुपए गए और बीजेपी के पास
आठ सौ बावन करोड़ रुपये का एक बरस दर बरस का डाटा इलेक्शन कमीशन के पास है फाइनेंस मिनिस्ट्री के पास है
चुनाव आयोग ने बकायदा पार्टियों से लिया हुआ है बरस दर बरस देखिएगा तो ग्यारह दो हज़ार ग्यारह बारह के फाइनेंशियल ईयर में कांग्रेस के पास तीन सौ साठ करोड आते हैं बीजेपी के पास एक सौ अड़सठ करवाते आते हैं
दो हज़ार दस ग्यारह में चार सौ अड़सठ करोड़ कांग्रेस के पास आते हैं दो सौ अट्ठावन करोड़ बीजेपी के पास आते हैं इसी तरीके से बरस बरस हर चीज का जिक्र है और इतना ही नहीं इस दौर के भीतर में उस दौर में क्या कुछ हो रहा था दो हज़ार नौ में आदित्य बिड़ला ग्रुप ने तीस करोड़ रुपए जो मैक्सिमम था उसमें
बीजेपी को सोलह करोड़ साठ लाख दिए कांग्रेस को तेरह करोड़ पचानवे लाख दिए इस दौर में भी आदित्य बिड़ला ग्रुप ने दिया है तो सवाल ऐसा नहीं है कि उस वक्त नहीं पता चलता था पता चल जाता है पता उस वक्त भी चलता था और शायद यही वजह है कि जब आप चीजों को परखेंगे और देखेंगे तो उसमें आप
को एक के चीन की जानकारी आएगी छत्तीस कॉर्पोरेट ने एक करोड़ या उससे ज्यादा राजनीतिक चंदा पॉलिटिकल पार्टीज को दिया था दो हज़ार नौ में एशिया ने टीवी होल्डिंग ने साढ़े बारह करोड़ दिए थे टोरेंट पावर जिसके साथ तमाम अलग अलग कॉर्पोरेट जुड़े थे साढ़े दस फोड़ दिए थे टाटा इलेक्टोरल ट्रस्ट ने नौ कोड
तलाक सारी जानकारी है भारतीय इलेक्टोरल ट्रस्ट जो भारती ग्रुप जो एयरटेल का है उसने भी बनाया उसमें भी छत्तीस कंपनियां थीं जिन्होंने एक करोड़ से ज्यादा पैसा दिया था जानकारी सब निकलती थी और सवाल यह था कि जब इलेक्टोरल बॉन्ड आ रहा था उस वक्त जो सुप्रीम कोर्ट कह रहा था जो आरबीआई कह रही थी और चुनाव
आयोग भी जो कह रहा था कि ब्लैक मनी को बढ़ावा मिलेगा क्या वह पन्ने खोलने की जरूरत नहीं है या फिर जब ईवीएम को लेकर पहली बार दो हज़ार आठ नौ में जो सवाल पहुंचा अदालतों के भीतर में और बीजेपी के भीतर से आवाज उठी उसमें जो सवाल थे वह सवाल मायने नहीं रखते हैं क्योंकि बीजेपी सत्ता में है यानी इस दौर में वोट
का ध्यान नहीं है और आज तीनों वकीलों ने इसी बात पर जोर दिया कि सवाल उम्मीदवारों का नहीं है सवाल इस देश के वोटरों का है उम्मीदवार में तो चालीस पर्सेंट से ज्यादा आपराधिक छवि के हैं उनके हलफनामे बतलाते हैं कौन करप्ट है इस पर आपराधिक मामले चल रहे हैं लेकिन वोटरों के बारे में सोचिए
और सुप्रीम कोर्ट से यही आग्रह किया गया कि आप हर हाल में वोटरों के बारे में सोचिए आखिर में एक सवाल आपके जहन में जरूर आएगा जब कल इक्कीस रिटायर्ड जजों ने एक पत्र दिया था और सुप्रीम कोर्ट से यह कहा था कि देखिए यहां पर जिस तरीके
इससे काम होता है उसमें ऐसा लगता है कि संकीर्ण राजनीतिक हितों और व्यक्तिगत लाभ के लिए न्यायपालिका को कमजोर और न्यायिक प्रणाली पर जनता के विश्वास को कम करने का प्रयास किया जा रहा है
उसमें साइन करने वालों में सुप्रीम कोर्ट के चार पूर्व जज भी थे जस्टिस दीपक वर्मा जस्टिस कृष्ण मुरारी जस्टिस दिनेश माहेश्वरी जस्टिस एमआर शाह उसमें दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एसएन ढींगरा और के गौबा ज्ञान प्रकाश मित्तल अजीत भर योग इलाहाबाद हाईकोर्ट के भी तीन थे राजेश कुमार श्रीवास्तव राजीव
मुंबई हाईकोर्ट के भी एक थे अम्बा दास जोशी गुजरात हाईकोर्ट के भी एक थे जस्टिस एफएम सोनी इन सवालों के बीच में पूछा कि आप ऐसा क्यों कह रहे हैं तो जस्टिस एसएन ढींगरा ने कैमरे पर कहा देखिए किस तरीके से अदालत को प्रभावित किया जाता और अदालत के भी
वकील जीरा करते करते कहते हैं कि इतिहास आपको माफ नहीं करेगा इसके क्या मतलब है दरअसल यह मामला अरविंद केजरीवाल को लेकर था जहाँ पे जो फैसला दिया जा रहा था उसको लेकर एडवोकेट जो जिरह कर रहे थे उन्होंने सवाल खड़ा किया था उन्होंने क्या कहा सुनी है यह कल कही हुई बात
है लेकिन सुनना चाहिए
कई के सीनियर वकील जो एक
आइडियोलॉजी से बिलॉन्ग करते हैं या पार्टी को रिप्रेजेंट करते हैं
वो जो है केस में जब उनके मन मुताबिक फैसला नहीं होता तो वह बजाय यह बताने के के फैसले में क्या कमी है
ग़ैर क़ानूनी कमी है वो नहीं बताते हैं ना ही उसके ऊपर उनकी होते हैं
है कोर्ट में भी वह पैसा एक्सचेंज जुडीशियल बहस करते हैं कानून के ऊपर बैठ नहीं करते कि यह रैली की जाएगी ये हो जाएगा देख टूट जाएगा इस तरह की बहस करते हैं और दबाव बनाते हैं कि कैसे धर्म संकट में फंसा हुआ है और रूस को बचाना मुश्किल
रहेगा
नहीं तो रीसेंट है
अभी एक सीनियर वकील को मन मुताबिक फैसला नहीं हुआ तो कोर्ट में ही बोल दिया के रिश्ते नाते टेक गाइड फॉर न्यू लुक फाउंडेशन
भूतनाथ का इंटरव्यू अभी क्या है
क्या एक है पर टायरों के जज को के इतिहास को माफ नहीं करेगा
दरअसल जस्टिस ढींगरा जिस एडवोकेट का जिक्र कर रहे हैं वह एडवोकेट सिंह भी हैं जो अपने तर्क में उन्होंने अपनी बात रखी
लेकिन सवाल इस दौर में यह नहीं है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता या न्यायपालिका को लेकर जो सवाल इस देश के भीतर उठ रहे हैं या प्रधानमंत्री ने अपने इंटरव्यू में कहा जब चुनाव आयुक्तों को भी इस देश के भीतर में राजनीतिक तौर पर चुनाव तक लगाया गया तो कोई भी पूछ सके
आता है क्या इससे पहले इस देश में कोई ऐसे चीफ जस्टिस थे