SAFTEAM GUJARAT (HuzaifaPatel)

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भारतिय समाजके लिये संघर्ष करना हमारा मुल लक्ष्य हे,

Monday, 13 December 2021

हिन्दू सब्द और उसकी विचारधारा पर कुच एनालिसिस करते हे.


 SAFTEAMGUJ.
     Huzaifa Patel 
    12 Dec 2021  के दिन राहुल गांधी के विवादास्पद निवेदन के ये मुद्दा फिरसे गरमाता हुवा नजर आ रहा हे. सोचा कुच बातें सिर्च करने को लेकर संभाली जाये.



        इस विडियो के साथ बहोत से प्रमाण  रखा गया हे.

આપનો આભારી કાવી સરપંચ.

 શાંતિ શંદેશ...


મારાં વ્હાલા કાવી ગામનાં તમામ નાત જાત તેમજ તમામ સમાજના મારાં પ્રિય થી અતિપ્રિય નાગરિકોને મારી ખુબ નમ્રતા પૂર્વક અને દિલી અરજ છે. કે આપણા કાવી ગામમાં ચૂંટણી માહોલ ચાલી રહ્યો છે.
અને મારાં વ્હાલા ગામના શાંતિ પ્રિય વાતાવરણનેં ડોહરાવીને તેમજ ગામની શાંતિ એકતા અને ભાઈચારાનેં ભંગ કરીને ગામના વિકાસની ગતિ નેં ક્ષતી પોહચાડવાની તેમજ ગામના ભાઈચારાનેં ધ્વસ્ત કરીને ગામમાં અશાંતિ તેમજ અરાજકતા ફેલાવવાની સાજીસો ચાલી રહી છે.. તેમજ અમુક વિઘ્ન શંતોષી તત્વો દ્વારા મારાં વ્હાલા ગ્રામજનોની સુખ શાંતિ અને સમૃદ્ધિ નેં વેડફી નાખવાની નાપાક કોશિશો ચાલી રહી છે. તેવા કપળા અને કટોકટી ભર્યા સમયમાં હું મારાં વ્હાલા તમામ ગ્રામજનોને તેમજ દરેક જ્ઞાતિ અને સમાજના લોકોને નમ્રતા પૂર્વક દિલથી અરજ કરું છું કે. મહેરબાની કરીને ચૂંટણીના આવેશમાં તેમજ વિઘ્નશંતોષી તત્વોના બેહકાવામાં આવીને મારાં કોઈ પણ ભાઈ બહેનો તેમજ મારાં બુઝુર્ગો અને માતાઓએ ચૂંટણીને લઈને અંદરો અંદર જગડવું નહિ. કે પોતાની શાંતિ ભંગ કરવી નહિ...તેમજ આ ચૂંટણીને કારણે પોતાના ભાઇઓ... મિત્રો... સગાઓ... કુટુંબીઓ... તેમજ પડોશીઓ સાથે ભૂલથી પણ કોઈપણ જાતનો વ્યવહાર બગાળવો નહિ તેવી મારી મારાં વ્હાલા કાવી ગામના વ્હાલા નાગરિકોને મારી દિલથી આજીજી અને ખુબ નમ્રતા પૂર્વકની વિનંતી છે...
આ ચૂંટણી કાલે પતી જશે. પણ આ ચૂંટણીને કારણે પોતાના ભાઈ... મિત્ર... કુટુંબી... કે સગા સમ્બન્ધી... સાથે બગડેલા સંબંધો નેં સુધારવામાં અને આ સંબંધોમાં ફરી એ મીઠાસ લાવવામાં વર્ષો નીકળી જશે. માટે મારાં વ્હાલા ગ્રામજનોને ફરી એકવાર હું દિલના અંતઃકરણ થી ખુબ આજીજી અને નમ્રતા પૂર્વક અરજ અને વિનંતી કરું છું કે વધેલા 5/7 દિવસમાં ખુબજ સંયમતા અને વિવેકતા અને ધીરજનો ઉપયોગ કરીને સાવધાની અને સમજદારી પૂર્વક તમારા બગડતા સંબંધો નેં જારવી રાખીને આપણા ગામની એકતા ભાઈચારો અને શાંતિને બરકરાર રાખજો... અને એક સાચા અને સારા નાગરિક હોવાનું કર્તવ્ય નિભાવજો...અને ગામમાં અરાજકતા અને અશાંતિ ફેલાવનારા વિજ્ઞશંતોષી તત્વોથી સાવધાન રેહજો... અને તા.19/12/2021 નાં રોજ કોઈના પણ સડયંત્રો કે સાજીસો કે ખોટા પ્રલોભનોમાં આવ્યા વગર શાંતિ સલામતી અને સ્વખુશીથી પોતાના સ્વતંત્ર અધિકારોનો યોગ્ય જગ્યાએ ઉપયોગ કરીને એક પ્રામાણિક અને જાગૃત નાગરિક તરીકેની પોતાની ફરજને નિભાવીને ગામના વિકાસ અને અને ગામની શાંતિ... સલામતી... ભાઈચારો અને એકતાની મિશાલ બનીને પોતાના સ્વતંત્ર અધિકાર નો વધુમાં વધુ ઉપયોગ કરીને યોગ્ય દિશામાં અને યોગ્ય જગ્યાએ પોતાના તેમજ પોતાના ગામના હિતમાં વધુમાં વધુ મતદાન કરીને એક જાગૃત નાગરિક હોવાનું ઉદાહરણ બનીને દેશ અને દુનિયાને એક અમૂલ્ય શંદેશ પાઠવજો...
સડયંત્રોના ભાગરૂપે કેટલાક ભીંતપત્રો કે પરચાઓ "ભૂલસો નહી, ચૂકશો નહી" જેવા ટાઇટલોથી સોશિયલ મીડીયામા ફેલાવાય છે જેનાથી ભરમાવાના કોઇ જરૂર નથી
અંતમાં જણાવવાનુંકે જાણ્યે અજાણ્યે મારાથી કોઈ ભૂલ કોટાહી કે ગેરસમજ ઉભી થઇ ગયી હોય અને જેના કારણે મારાં ગામના મારાં કોઈપણ ભાઈ.. બહેન.. માતા.. કે વડીલનું મન દુભાયું હોય તો હું આપ સૌવ ગામવાસીઓની દિલથી માફી ચાહું છું...અને આપ સૌવથી આશા પણ રાખું છું કે આપ સૌવ મારાં દ્વારા અંજાણે થઇ ગયેલી કોઈપણ ભૂલ કે જેના કારણે આપનું મન દૂખ્યું હોય તે બદલ માફ કરશો... અને અત્યાર સુધી મને આપની સેવા કરવાનો મોકો આપીને મને આપનો આભારી બનાવ્યો અને અગાઉ પણ મને આપ આપસૌવની સેવા કરવાની ફરીવાર એક અમૂલ્ય તક આપીને મનેં આપનો ઋણી બનવાનો મોકો આપીને આપનો આભારી બનાવશો... 🙏


🙏આભાર 🙏

લી.
આપનો આભારી કાવી સરપંચ. 🙏

Sunday, 12 December 2021

सामाजिक कार्य करने वालें तीन तरह के होते हे,उसकी कुच विशेषता और समझने वाली बातें .

   जैसे जैसे समय अपना रुप रंग बदल रहा हे, वैसे वैसे मानवजाति की परिस्थितियां बेहद खौफ नाक नजर आ रही हे, इसी समय कुच लोग अलग अलग क्षेत्रों मे कुच कार्य करने की कोशिश कर रहे हे,जिनको समझना आज हर बुद्धिजीवी लोगों का कार्य होना चाहिये.

     मिजाजी 
      खुशूसी 
     मकसद 

जीत गया लोकतंत्र, हार गयी तानाशाही किसान आंदोलन जित गया 378 दिन तक लगातार चलने वाला दुनिया का पेहला आंदोलन.


लोकतंत्र आज एक बार फिर जीत गया। लोकतंत्र की वह डोर जो छूटती जा रही थी जनता ने आज फिर से उसे मजबूती से पकड़ ली। सत्ता की तमाम संस्थाएं जब अपनी जवाबदेहियों से पीछे हट रही थीं और एक के बाद एक संसद में विधेयकों के जरिये जनता से उसके अधिकारों को छीना जा रहा था तब किसानों ने आकर अपनी एड़ी लगा दी। वह संसद जो जनता के सशक्तीकरण के लिए बनी थी और उसका काम जनता के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना था उसने चेहरा बदल कर चंद पूंजीपतियों के हितों में काम करना शुरू कर दिया। मानो इतिहास के पूरे चक्र को ही पलट दिया गया हो। जिस तरह से संसद के भीतर कृषि कानूनों को तमाम विपक्ष की आवाजों को दबाकर बलात तरीके से पारित कराया गया। मानो वह कारपोरेट की सत्ता पर कू हो। एक तरह से सत्ता के नेतृत्व में लोकतंत्र का वह तख्तापलट था जिसके जरिये देश में सत्ता पर कारपोरेट के वर्चस्व का खुला आगाज किया गया हो। लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी यहीं मात खा गए। इस बात का उन्हें ज्ञान नहीं था या फिर इसकी उनको समझ नहीं थी कि किसान अपनी जमीन से कितना प्यार करता है? 

वह एक गट्ठा जमीन के लिए खड़े-खड़े अपनी कुर्बानी दे देता है लेकिन जमीन नहीं जाने देता। और यहां तो संगठित तरीके से सत्ता के संरक्षण में कारपोरेट के कब्जे का पूरा अभियान था जिसमें संसद से बाकायदा कानून पारित करा कर उसे संवैधानिक तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा था। ऐसे में किसानों के पास सड़क पर उतरने और जीवन-मरण के रास्ते से होकर गुजरने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था। किसानों ने इस काम को भरपूर तरीके से अंजाम दिया। पिछले एक साल के भीतर केंद्रीय सत्ता और किसानों के बीच यह अपने तरीके का युद्ध था। जिसे सड़क पर लड़ा जा रहा था। किसानों ने इस लड़ाई में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। पंजाब के रास्ते हरियाणा और फिर दिल्ली तक पहुंचने में उसे जिन हालातों से गुजरना पड़ा वह किसी हिमालय की चढ़ाई से कम नहीं था। सत्ता कदम-कदम पर उसके रास्ते में रोड़े अटका रही थी। लेकिन किसानों ने भी जैसे कसम खा ली हो। जांबाज नौजवान जब अपने ट्रैक्टरों को हथियार बनाकर आगे बढ़े तो पुलिस और सुरक्षा बलों के सारे पैंतरे धरे के धरे रह गए। रास्ते में पड़ने वाले सैकड़ों बैरिकेट्स को तोड़ते हुए देखते ही देखते किसान राजधानी पहु्ंच गए। और उन्होंने चारों तरफ से उसे घेर लिया। लेकिन यह क्या जो दिल्ली देश की राजधानी है। जिस पर हर किसी का बराबर हक है। जितना सत्ता की है उससे ज्यादा जनता की।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है। लेकिन उसी जनता को दिल्ली में घुसने की इजाजत नहीं दी गयी। फिर क्या था किसानों ने भी बॉर्डर पर ही मोर्चा खोल दिया। और फिर पिछले एक साल में उन्होंने लू के थपेड़ों, सर्दी की गलन और बारिश की बौछारों को झेलते हुए जिस तरह से इस आंदोलन को राष्ट्रव्यापी बनाया वह अपने आप में इतिहास बन गया है। इस बीच सत्ता ने उसे झुकाने और धराशाही करने के लिए हर तरह के षड्यंत्र का सहारा लिया। लेकिन किसानों ने न केवल उसके षड्यंत्रों को नाकाम किया बल्कि तुर्की ब तुर्की उसके सारे सवालों का जवाब देता रहा। लाक्षणिक रूप से कहा जाए तो किसानों के लिए यह सत्ता किसी बिगड़ैल बैल की तरह थी। और यह बात हमें नहीं भूलनी चाहिए कि किसानों को बिगड़ैल से बिगड़ैल बैल को भी ठीक करने की महारत हासिल होती है। मौजूदा बिगड़ैल सत्ता के साथ भी उन्होंने यही किया। उसे चौतरफा नथ दिया। फिर क्या था वह किसानों के सामने झुकने के लिए मजबूर हो गयी। उसके पास शायद अब इसके अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं था। क्योंकि चुनाव-दर चुनाव किसान आंदोलन बीजेपी की लुटिया डुबो रहा था। ऐसे में किसी भी चुनाव में जाने से पहले किसान उसके सामने खड़े हो जाते थे। और उनका उसके पास कोई जवाब नहीं होता था।

किसानों ने अभी तक सत्ता को न केवल तीनों कानूनों को वापस लेने के लिए मजबूर किया है बल्कि इस दौरान अपने खिलाफ दर्ज हुए सारे मुकदमों को वापस लेने और एमएसपी की गारंटी को जारी रखने की बात भी उसने मनवा ली है। इसके साथ ही एमएसपी पर कानून बनाने के लिए कमेटी के गठन के प्रस्ताव को पारित कराने में भी वह सफल रहा है। इस कमेटी में किसान मोर्चा के लोगों को भी सदस्य के रूप में शामिल करने की बात कही गयी है। और अगर किसान एमएसपी एक्ट बनवाने में सफल हो गए तो फिर यह देश के सभी किसानों के लिए अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि साबित होगी।

लेकिन यह आंदोलन इन मांगों से इतर एक बड़ी भूमिका निभा रहा था। वह था लोकतंत्र को बचाने का संघर्ष। जैसा कि मैंने ऊपर बताया एक के बाद एक जब अधिकार छीने जा रहे थे तब उसने न केवल उस प्रक्रिया को रोका बल्कि उसकी पूरी धारा ही पलट दी। और छीने गए अधिकारों की पुनर्बहाली का रास्ता साफ कर दिया। और इसका नतीजा यह है कि दूसरे तबके भी अब अपने अधिकारों को लेकर न केवल जागरूक हो गए हैं बल्कि अपने हकों की लड़ाई को जीतने का उनके भीतर आत्मविश्वास पैदा हो गया है। वह इस उम्मीद और भरोसे से लबालब हैं कि कोई भी लड़ाई जीती जा सकती है सत्ता चाहे कितनी ही क्रूर और अत्याचारी हो। उसको दबाया और झुकाया जा सकता है। जनता की ताकत के आगे कॉरपोरेट की थैली बौनी हो जाती है। 

दरअसल किसान आंदोलन ने कुछ और नहीं बल्कि अपने इतिहास की जड़ों को ही तलाशने की कोशिश की है। आज़ादी की लड़ाई की सफलता का बुनियादी सूत्र ही जनता की गोलबंदी थी। अधनंगा फकीर सर्वशक्तिमान अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ न केवल जनता की ताकत के सहारे खड़ा हुआ बल्कि उसे हर मोर्चे पर धूल चटाया। और देश की यह विरासत आज़ादी मिलने के साथ ही समाप्त हो गयी अगर कोई ऐसा सोचता है तो उस पर सिर्फ तरस ही खाया जा सकता है। जनता इतिहास की जिस चेतना से गुजर चुकी होती है उसकी आने वाली पीढ़ी उससे आगे बढ़ी होती है। ऐसे में इस देश के भीतर तानाशाही लागू करने के मंसूबे पालने वालों को हमेशा इस बात को याद रखना चाहिए कि देश में लोकतंत्र केवल शब्द नहीं बल्कि एक स्थायी सच है जो लोगों की जेहन का हिस्सा बन गया है। और जो भी उसे खारिज करने या फिर समाप्त करने की कोशिश करेगा वह खुद देश से खारिज हो जाएगा।

यह आंदोलन एक और मामले में तमाम आंदोलनों से अलग है। जो दुनिया के स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहा है। अभी तक नवउदारवादी व्यवस्था के खिलाफ हुए आंदोलनों ने इस तरह की कोई जीत हासिल नहीं की थी। यह बात सही है कि लैटिन अमेरिका समेत तमाम देशों में सरकारें ज़रूर बदली हैं लेकिन कोई आंदोलन ऐसा हो जो अपने दौर की सरकार को इस तरह से झुकाने में कामयाब रहा हो ऐसी कोई मिसाल नहीं मिलती। भारत के किसानों ने वह दर्जा हासिल कर लिया है। जिसमें वह अब एक स्थायी प्रेशर ग्रुप में तब्दील हो गया है। और आने वाले समय में अगर सत्ता फिर से कोई गलत रास्ता अख्तियार करती है तो वह एक बार फिर सिर उठाकर उसके सामने खड़ा हो जाएगा। और वैसे भी किसी एक ताकत से हारने वाली सत्ता दोबारा उसका सामना करने का नैतिक साहस नहीं जुटा पाती है। ऐसे में जनता की इच्छा के अधीन रहना अब सत्ता की मजबूरी हो गयी है और यही असली लोकतंत्र होता है। जिसमें सब कुछ जनता के लिए होता है। 

किसानों के आंदोलन की अगर कोई समीक्षा की जाएगी या फिर उसके जीत को याद किया जाएगा तो उसका श्रेय उसके केंद्रीय नेतृत्व को दिए बगैर अधूरा रहेगा। यह अपने किस्म का अनूठा आंदोलन था। जिसमें कोई एक नेता नहीं था। उसका कोई एक चेहरा नहीं था। वह सैकड़ों संगठनों के हजारों नेताओं के सहारे आगे बढ़ रहा था। लेकिन उसके कोर में बैठे नेतृत्व को हजारों-हजार सलाम जिसने इतने धैर्यपूर्वक इतनी मजबूत और षड्यंत्रकारी सत्ता से लोहा लिया। वह न केवल साहसपूर्वक टकराया बल्कि हर मोर्चे पर उसने उसे मात दी। यह उसकी राजनीतिक सूझ-बूझ का ही नतीजा था कि अंत में सत्ता को उसके सामने समर्पण करना पड़ा। और अब जीत के जश्न के साथ अपने आंदोलन की पहली पारी का वह समापन कर रहा है।