दोस्तों हमे एक नेता चाहिए जो इस देश को हाथ सके
उस नेता का इंतजार नेहरू से लेकर मोदी तक के काल में हर दौर में चुनाव जब जब करीब आता है तब तब खोज शुरू हो जाती है
लेकिन हमें कोई सिस्टम नहीं चाहिए एक ऐसा सिस्टम जिसके हिसाब से यह देश चले और नेताओं की आवाजाही होती रही जी रहे हमें वाकई एक नेता चाहिए अटल बिहारी वाजपेयी का शाइनिंग इंडिया जब अस्त हो चला तो उसके बाद एक नेता की तलाश थी मनमोहन सिंह के
और में जो घपले घोटाले उभरकर सामने आने लगे तो उसके बाद एक नेता की तलाश और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौर में इस देश में जो इस देश का बेसिक स्ट्रक्चर की धराशायी हो गया इस देश के भीतर के संस्थान सरकार के कार्यकर्ता में तब्दील दिखाई देने
लगे तब लगा एक ऐसा नेता चाहिए जो इस देश में सिस्टम ला सके
हमें सिस्टम कभी नहीं चाहिए सिस्टम चाहिए तो वहां भी किसी नेता के भरोसे ही तो क्यों नहीं आज खत्म हो चले सिस्टम के भीतर झांककर देखा जाए और समझा जाए क्या वाकई इस देश में अगर सिस्टम चलने लगे या चल रहा होता तो मौजूदा वक्त की सत्ता
दो दिल भी टिक नहीं पाती क्योंकि इस देश के भीतर में जो नियम कायदे कानून है
जो सुप्रीम कोर्ट की संविधान को लेकर व्याख्या है जिस लिहाज से गवर्नेंस चलना चाहिए जिस लिहाज से पार्लियामेंट को चलना चाहिए और जिस तरीके से इस देश में सरकार की जिम्मेदारी आम लोगों को लेकर है अगर उसको और देखने की स्थिति में इस देश के तमाम संस्था आकर खड़े
हो जाएं तो क्या वाकई मोदी सत्ता चंद मिनटों की मेहमान होगी आपको चुनाव की जरूरत भी नहीं पड़ेगी जरा सोचना शुरू कीजिए कि अगर इलेक्शन कमीशन यह तय कर लें कि चुनाव के वक्त में कोई हेट स्पीच नहीं हो रही हो उस दौर में पैसों का लेनदेन नहीं हो रहा हो उस दौर में
जो भी उस दौर की चुनावी सहयता को तोड़ेगा उसको जेल के पीछे डाल दिया जाए या निर्देश चुनाव आयोग जारी करने लगे और नियम कायदे खड़े हो जाएं चुनाव के वक्त और खासतौर से सत्ता के हाथ में जब समूची लगाम होती है तो उस लगाम अपने हाथ में ले ले
तो उसके बाद इस मौजूदा सत्ता का हर चुनाव के वक्त क्या होगा
हो सकता है आप कहें नहीं नहीं तब तो कर्नाटक की सरकार नहीं गिरी होती पांच बरस पहले मध्यप्रदेश की सरकार नहीं गिरी होती गोवा में सरकार नहीं गिरी होती उत्तराखंड में सरकार नहीं गिरी होती इस देश के विधायकों को कोई खरीद नहीं सकता था शिवसेना इस तरीके से दो फाड़ नहीं हुई होती एनसीपी
को लेकर भी जो मौजूदा सवाल है उस पर फैसला तो चंद मिनटों में चुनाव आयोग दे देता तो कि नियम कायदे तो बहुत साफ तौर पर सामने खड़े हैं
तो क्या चुनाव आयोग अगर अपने काम को करने लगे तो इस देश के भीतर में चुनावी प्रक्रिया और चुनावी प्रक्रिया के जरिए सत्ता जो इस दौर में अपनी ताकत दिखाती है एक झटके में वह गायब हो जाएगी हो सकता है
दूसरी परिस्थिति जरा कल्पना कीजिए कि सीएजी अगर इस देश के तमाम मंत्रालयों की रिपोर्ट ही सामने रखती चली जाए और बताती चली जाय कि कितना खर्च किस डिपार्टमेंट में किस एवज में हुआ बजट में जो पेश किया गया और जो कुछ मंत्रालय ने दिखाया उसकी अलावे कितना प्रचार
में खर्च हो रहा है यह कुछ बकायदा सीएजी के जरिए मंत्रालय दर मंत्रालय चीजें सामने अगर आने लगे तो क्या होगा
एक झटके में क्या मोदी सरकार के भीतर के तमाम मंत्रालयों के हाथ पांव फूल जाएंगे
और वाकई लगने लगेगा कि तमाम मंत्रालयों में जो जो सचिव सरकार के अनुकूल है उसको इस दौर में एक्सटेंशन क्यों दिया गया यह पोल पट्टी भी खुल जाएगी
हो सकता है इससे इनकार कौन करेगा लेकिन सीएजी का काम तो यही है उसे देखना है
बकायदा चार्टेड अकाउंटेंट के तर्ज पर वह देखता है कि कहां पर किस मंत्रालय में कितना खर्च हुआ जो बजट निर्धारित किया गया उसके अनुकूल काम हो रहा है या नहीं और इस दौर में जब सबको पता है कि हर विभाग का प्रचार डिपार्टमेंट प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे के आसरे इस देश के मीडिया में रेंगता नजर आता है या
फिर सड़क चौराहे पर वह किसी पोस्टर में तब्दील होता दिखाई देता है तो क्या उस पर रोक लग सकती है क्योंकि सवाल तो देश के पैसे का है तो क्या सीएजी इस रिपोर्ट को अगर सामने लाने लगे और जनता इस बात को समझने लगे तो फिर क्या स्थिति ऐसी आ जाएगी या सरकार दो दिन न चल पाए टिक ही नहीं पाए
यह दूसरी स्थिति है तीसरी स्थिति जरा कल्पना कीजिए कि आरबीआई इस बात को तय कर ले कि सरकार के मन मुताबिक पैसा सरकार को नहीं देंगे
सरकार की तरफ से जो लिखकर आता है कि हां इसे आप कर्ज दे दीजिए और उसके बाद सरकार जिस तर्ज पर कर्ज माफी करती चली जाती है जिसको रिटर्न ऑफ कहा जाता है अगर आरबीआई इस तरीके के रोक टोक लगाने की परिस्थिति में आ जाए और कहे कि ऐसा भी मत समझिए कि जिस डिविडेंड को या जिस फायदे को आप लिए
जाते हैं उस पर भी एक लकीर खींचनी होगी जो पहले खींची हुई थी आपने उसे बदल दिया तो क्या वाकई सरकार के सामने पैसे के लाले पड़ जाएंगे या सरकार इस देश में जीएसटी तक का पैसा राज्यों को न दे और राज्यों से कहे कि आप आरबीआई से कर्ज ले लीजिये और उसके बाद आरबीआई गवर्नर कहे ऐसे नहीं चला
देगा आप की अर्थव्यवस्था ठीक नहीं है और जिस तरीके का बोझ बैंकों पर पड़ा हुआ है जितनी बड़ी तादाद में आपने लाभार्थियों के लिए कल्याण योजनाओं का ऐलान किया है अब आरबीआई ने निर्देश देता है कि इस तरीके से बैंकों पर बोझ नहीं डाला जाना चाहिए और जिस
तरीके से आप पैसों को बांट रहे हैं और हम जो पैसा ले रहे हैं और जो नोट को कभी भी बंद कर देना कभी भी चालू कर देना कितना भी नोट को छपवा लेना उस नोट को खर्च करने की एवज में यानी उसको दोबारा से नष्ट करने की एवज में जो खर्च होता है उस खर्च को कौन देगा
यानी आरबीआई अगर सक्रिय हो जाए तो क्या सरकार इस दौर में कंगाल हो जाएगी
यह भी एक सवाल है
तो आरबीआई का सक्रिय होना या फिर सीएजी की रिपोर्ट सामने आने लगे या फिर इलेक्शन कमीशन सक्रिय हो जाए और तो और इस दौड़ में सबसे मजबूत टूल और हथियार के तौर पर जो ईडी मौजूद है अगर को बताने लगे कि मनी लॉन्ड्रिंग का मतलब
होता क्या है
और मनी लॉन्ड्रिंग के आसरे आपने इस देश से बाहर कितने लोगों को भेज दिया और कितने लोग चले गए और हम सिर्फ यही कहते रह गए कि इन्होंने गड़बड़ी की है और सरकार ने उन्हें बाहर भेज दिया और हम यहां की अदालतों में यही कहते रह गए कि आप उनको भगौड़ा साबित कीजिए कि भगोड़ा अपराधी
अपराधी है वो आर्थिक अपराधी हैं इसी में हमारी उम्र कब जाएगी
तो इस देश के भीतर में आर्थिक सुरक्षा का जिम्मा मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए इस देश में ईडी को सौंपा गया तो क्या ईडी अपना काम नहीं करें एक दो नहीं लंबी फेहरिस्त है कितनी बड़ी तादाद में लोग इस देश को छोड़कर चले गए उन्हें भगोड़ा साबित करने की दिशा में यही की अदालतों में हम चक्कर लगाते हैं
यहां तक कि मेहुल चौकसी का मामला इस रूप में पुष्टि नहीं कर पाता है अदालत की इनको फॉरगेट घोषित किया जाए या न किया जाए यानी भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किया जाए या ना किया जाए इसमें भी और झरने आ जाती है
तो क्या ईडी अपनी जिम्मेदारी को निभाने लगे तो क्या उसके बाद इस देश के भीतर में मनी लॉन्ड्रिंग का किस्सा एक झटके में खत्म हो जाएगा
तमाम परिस्थितियों को जरा परखना की कोशिश कीजिए क्या पाता इस देश के भीतर में ईडी अपना काम करते हुए सरकार से सवाल करें
सीएजी अपना काम करते हुए सरकार के तमाम मंत्रालयों के आर्थिक ईशु को लेकर इस दौर में अपनी रिपोर्ट जारी करने लगे आरबीआई जो पैसा सरकार लेती है उसको लेकर सवाल खड़ा करती हैं और चुनाव आयोग चुनाव को लेकर सरकार पर बंदिश लगाई कि आप इस रूप में
फ्री नहीं है जहां पर आप सोच लें कि आप ही ने नियुक्ति की है चुनाव आयुक्त की तो वह आपसे सवाल नहीं करेगा ऐसा नहीं होना चाहिए महज चार डिपार्टमेंट
अगर सक्रिय हो जाएं आप कहेंगे अगर सक्रिय कैसे हो जाएंगे जिस देश के भीतर में सुप्रीम कोर्ट पर नकेल कसने के लिए और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को पलटने के लिए जिस देश में सरकार सक्रिय नजर आए और खुले तौर पर नजर आए और पार्लियामेंट का उपयोग करें
और उसके बाद बतलाए कि दरअसल हम ही सबकुछ है क्योंकि जनता ने हमें को चुना है और सारी जिम्मेदारी हमारी है क्योंकि चुनाव में हमें जाते हैं और कानून मंत्री इस देश का जजेस को धमकी देने लगे तो चुनाव में तो आप नहीं जाते हैं चुनाव में तो हम जाते हैं तो हमारे हिसाब से यह देश चलना चाहिए
हमारी जिम्मेदारी लोगों को लेकर है तो क्या संविधान हो या डेमोक्रेसी की जो परिभाषा संविधान में लिखी गई हो क्या चुनी हुई सत्ता को ही संविधान माना जाए उसी सत्ता के तमाम कार्य कलापों को डेमोक्रेसी की शक्ल में इस देश में रख दिया जाए क्या यह संभव है
पता नहीं कितना संभव है लेकिन आज कुछ कच्चे चिट्ठे को डॉक्यूमेंट की परिस्थिति के साथ समझने की कोशिश कीजिए इस देश में से जो मनी लॉन्ड्रिंग का किस्सा इस देश के भीतर अभी नेताओं को प्रभावित कर रहा है और समूचा विपक्ष से दो दो हाथ कर रहा है खुले तौर पर बतला रहा है उसके भीतर
सच क्या है सच यह है कि इस दौर में आने वाले वक्त में तीन सौ से ज्यादा कर्ज लिए हुए ऐसे बिलियनेयर हैं जो देश छोड़कर भाग सकते हैं
तकरीबन पाँच सौ लोग तो भाग चुके हैं तीन सौ लोग और भाग जाएंगे क्या उन्हें रोका जाना चाहिए
या उनको वाटर ढील दी जाती है कि आप भाग जाइए ना आप भगोड़ों को देश में ला सकते हैं ना ब्लैकमनी को लाया जा सकता है तो क्या भारत के संस्थान इतने कमजोर है वह ब्लैक मनी भी नहीं ला सकते हैं जो भगौड़े भाग गए और दूसरे देशों में बस गए क्या उनको लाने में भी मुश्किल हो जाती है
आप कहेंगे हो सकता है
लेकिन अलग अलग डिपार्टमेंट के भीतर विभागों के जरिए मंत्रालयों के भीतर से एक सवाल आपके जहन में हमेशा उठना चाहिए
हर मंत्रालय का मुखिया मंत्री होता है जिसे जनता चुनती है लेकिन क्या वाकई आपके जहन में यह सवाल है इस दौर में कानून मंत्री कौन है
इससे पहले कानून मंत्री जो था उन्होंने जो कहा उसके जरिये अपनी पहचान बनाई किरण रिजिजू थे
अभी अर्जुन मेघवाल साहब है
लेकिन हर विभाग के भीतर जवाब चलते चले जाएंगे तो आपके जहन में यह सवाल होगा इस मंत्रालय का मंत्री कौन है हम नहीं जानते हैं हां इस देश को प्रधानमंत्री चलाते हैं हाथ में है यह हम जानते हैं और तमाम मंत्रालय उन्हीं के अधीन है और तमाम नौकर शाही रिपोर्ट प्रधानमंत्री को करती है पीएमओ
के भीतर हर मंत्रालय हर राज्य से जुड़ा हुआ एक ज्वाइंट सेक्रेटरी लेवल का अधिकारी है जो एक पूरी रिपोर्ट तैयार करता है उसी आधार पर सारी चीजें फिर तय होती है ना उसमें कोई मंत्री का योगदान है ना इस देश के भीतर में कोई चैक एंड बैलेंस की गवर्नेस चल रही है तो ऐसे में बाद ईडी से शुरू की जाए या आरबीआई से शुरू
की जाए क्योंकि एक वक्त आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल ने कुछ सवाल खड़े किए थे
और वो सवाल सरकार को अच्छे नहीं लगे और उर्जित पटेल की विदाई हो गई
रघुराम राजन ने भी सवाल खड़े किए थे लेकिन बॉबी टिक नहीं पाए टिकेगा कौन एक्सटेंशन किसे मिलेगा सरकार के अनुकूल कौन होगा सरकार का मतलब इस देश के भीतर क्या होगा ये सब कुछ इस दौर में बहुत ट्रांसपेरेंट है शायद इसीलिए यह सवाल है कि इस देश के भीतर जो पॉलिटिकल पार्टीज के जरिए मुद्दे लगातार
गूंजते रहते हैं उन मुद्दों की तह में अगर जायेगा तो आप समझ जाएंगे दरअसल ये मुद्दे इस देश की महंगाई गरीबी से ज्यादा इस देश के उस पूरे सिस्टम को खोज रहे हैं जो सिस्टम अगर काम करें तो भारत के भीतर कि परिस्थिति बहुत अनुकूल लोगों के हो सकती है लेकिन हम एक नेता खोजते हैं
एक अदद नेता के पीछे पूरा देश चलने को तैयार है वो अदद नेता इस देश में सिस्टम अपना लाता है वह खुद को ही सिस्टम मानता है और अपने द्वारा लिए गए निर्णयों को ही सिस्टम की पूरी चाभी के तौर पर रख देता है जब हम जिक्र आपसे कर रहे हैं तो एक क्षण के लिए सोचिए
पहले सत्र में जब प्रधानमंत्री मोदी दो हज़ार चौदह में आए और दो हज़ार उन्नीस तक रहा है उस दौर में तीन सौ अस्सी व्यक्ति इस देश के भीतर से भाग गए
उसके बाद दो सौ तेईस लोग और भाग गए दूसरे सत्र में दो हज़ार बाईस तक
उसमें से लगभग सत्तर फीसदी मामले ईडी के पास पड़े हुए
उन्हें रोक नहीं पाई बैंकों ने शिकायत की जिन जिन एजेंसियों से उन्होंने एजेंसियों ने काम नहीं किया क्योंकि जिन जिन एजेंसियों को जिन जिन नामों को सौंपा गया उन नामों के पीछे सत्ता का कोई न कोई चेहरा था
और सरकार और सत्ता से टकराए कौन को कि हर कोई तो अपनी नौकरी कर रहा है
तो जो बैंकों के भीतर भी बैठे हुए डायरेक्टर हो या बोर्ड हो या फिर चेयरमैन क्यों ना हो उनके सामने भी यह सवाल लगातार रेंगता रहा कि जो ऊपर से लिखकर एक चिड़िया बैठाकर आता है कि आप इसे लोगों ने दे दीजिए तो लोन न देने का कोई सिला ही नहीं है
देश का पैसा है देश का बैंक है सरकारी बैंक कर दे दिया गया देश के नाम पर जनता का पैसा है जनता का पैसा बांट दिया गया क्योंकि जनता ने सरकार को चुना है क्या फर्क पड़ता है
तीन सौ से ज्यादा लोग जो भागे और जिन बातों का जिक्र हम पूरे ओवर ऑल कर उसमें ईडी से जुडे हुए मामले जो है अड़तीस व्यक्ति से जुड़े तो ईडी के नाक तले हो भागे
वह चौबिस देशों में इस दौर में एक सौ इक्कीस भगौड़े मौजूद हैं जो कि ईडी की कार्रवाई होती सरकार की सक्रियता होती तो कोई नहीं भर पाता लेकिन जो चौबिस देशों में एक सौ इक्कीस भगोड़े मौजूद है वो सभी जिन बैंकों से लोन लेकर और उनकी तादाद जो है इस देश के भीतर में
हमें लगता है क्या वाकई नाम पढ़ना चाहिए कि विजय माल्या मेहुल चौकसी नीरव मोदी है रविशंकर है संजय भंडारी है
नितिन जैसे अंदेशा है देर डिप्टी चेतन कुमार संदेह रहा है हितेश नरेंद्र भाई पटेल है संदीप झुनझुनवाला है सज्जन जिंदल वाला है नितिन संदेसा डिप्टी समझे साक्ष्य चेतन संदेश राव विपुल सूरज बेटे है जतिन मेहता के क्या सारे नाम पड़ते चले जाएं और कंपनियों के नाम देखते चले जाएं तो कितने लाख करोड़ का मामला
है और एक क्षण के लिए जरा सोचिए कि जितनी रकम लेकर ये लोग भाग गए
अगर उतनी रकम इस देश के सिस्टम पर डाल दिया जाता है इस देश के तमाम मंत्रालयों पर तो भी वाहवाही हो जाती आपको जानकर हैरत होगी जो ईडी किसी राज्य में जाती है वहां पूछताछ करने छापा मार दे तो उसमें जो निचले रैंक के अधिकारी होते हैं वह उनके रुकने की व्यवस्था भी
तीन स्टार होटल टैप नहीं होती है
उनको किसी पूंजी होटल में रुकना पड़ता है उनको जो पैसा मिलता है वह उसमें भी वह भोजन कर पाएं नहीं कर पाए अच्छा भोजन यह भी मुश्किल होती है अलाउंस जो होते हैं इतने कम है कि वह किसी क्लर्क के बराबर के अलाउंस इस है लेकिन नाम ईडी का है सिस्टम अंदर से खाली है और उसके जरिए पॉलिटिकल टूल बनाकर
इस देश के भीतर में
कृषि और कॉन्स्टिट्यूशन की परिभाषा को गढ़ा जा रहा है
जब है इन बातों का जिक्र कर रहे हैं तो जिन तीन सौ बारह भगवानों का जिक्र है उसमें एक लाख इकतालीस हजार पाँच सौ तिरासी करोड़ का सकता है
अब आप सोचिए चुनावी वर्ष में सबसे ज्यादा भागते हैं दो हज़ार उन्नीस में एक ग्यारह ऐसे मेजर भगौड़े भागे इस देश को जिन्होंने सौ करोड़ से ज्यादा का लोन लिया हुआ था और वो नहीं चुकाए और सरकार उसकी एवज में उसको रिटर्न ऑफ करती और बैंकों को पैसा दे देती है कि ठीक है हम इसकी भरपाई कर रहे हैं
उसके बाद जो भागने वाले लोग थे उसमें एक हजार करोड़ से ज्यादा छब्बीस बिक डिफॉल्टर थे
जिनके ऊपर कुल सात हज़ार चार सौ पच्चीस करोड़ का
कर्ज था चुकाना था नहीं चुकाया पाँच सौ करोड़ से ज्यादा लगभग चालीस थे बड़े उसके ऊपर जो पैसा था वह अट्ठाईस हजार करोड़ से ज्यादा खाता सौ करोड़ से ज्यादा वाले तादाद दो थी दो सौ छियालीस यानी सौ से पाँच सौ के बीच में दो सौ छियालीस लोग थे
उनके ऊपर बावन हजार आठ सौ उनसठ करोड़ का था यह एक डिपार्टमेंट का जिक्र है दूसरी परिस्थिति जो सीएच यह हो अपने तौर पर हर डिपार्टमेंट का इससे पहले की पूरी परिस्थिति तमाम सरकारों के भीतर रही है कि हर विभाग से जुडी हुई फाइनैंशियल उनतीस को व बतलाता है
और इस दौर में अगर सामान्य तौर पर किसी भी डिपार्टमेंट के फाइनैंशियल आजतक को अगर आप देखेंगे और उस डिपार्टमेंट से जुडे हुए प्रचार के बजट को आप देखेंगे और इस देश के भीतर की जो अलग अलग कल्याणकारी योजनाएं उन योजनाओं पर जो प्रचार में खर्च किया गया अगर उस पैसे को आप देख
देंगे
और वह पैसे जो इस देश के प्रिंट मीडिया टेलीविजन मीडिया
और तमाम जगहों पर जो पोस्टर के जरिए नजर आता है जो सार्वजनिक स्थलों पर उसको जब परखना शुरू करेंगे तो आपके हैरत अंगेज हो जाएगी स्थिति तो क्योंकि इतना बजट तो होता नहीं है तो यह पैसा कहीं से रोटेट किया गया पिछले दिनों सिर्फ इंडिकेट किया सीएजी ने कि देखिए डिपार्टमेंट का पैसा जिस पर
होना था उस पर खर्च नहीं हो रहा है जनता से जिस लिए सिर्फ लिया जाता है उससे का पैसा भी उस क्षेत्र में खर्च नहीं होता है
और इस देश में दो मुद्दों को लेकर हंगामा मच गया विपक्ष शोर मचाने लगा बोला देखिए सीएजी की ऐसी रिपोर्ट और दिल्ली से सटे गुड़गांव में जिस सड़क का जिक्र था कि देखिए इतने गुना ज्यादा पैसे में इतनी सड़क बना ली गई तो जरा कल्पना कीजिए इस देश के भीतर में अगर डिपार्टमेंट की फाइनैंशियल ई लैबोरेटरी सामने आने लगे तो
होगा क्या
अगर यह परिस्थिति आरबीआई के जरिए भी समझिए कि सरकार कैसे रिटर्न ऑफ करती है और बैंक उसको अपने बुक से हटा देता है और उसके बाद जो वह वसूली करता है उसको डिविडेंड के तौर पर दिखाकर सरकार को सौंप देता है सरकार उसके बताती है हमारे कितने मजबूत हैं
तो क्या एक सिस्टम को बनाने की जरूरत इस देश के भीतर है
या इस देश के भीतर जो डिपार्टमेंट्स काम कर रहे हैं उन्हें सिर्फ अपना काम करने दे दिया जाए
तो सरकारों को ईमानदार रहना होगा जनता के प्रति जवाबदेही होगी हर मंत्रालय और हर मंत्रालय को संभाला हुआ मंत्री जनता के बीच अपने मंत्रालयों की बातों को लेकर जाएगा
क्या ये ऐसी स्थिति आ सकती है आप कहेंगे ऐसी स्थिति तो पहले से थी
और इस देश के भीतर भाग कई ऐसी स्थिति लगातार रही है
कुछ पुरानी बात यह नहीं ऐसा नहीं है कि एक हज़ार दो हजार साल पुराने जिक्र कर रहे हैं
यह तो बीते दस पन्द्रह बरस पहले यह सब कुछ होता चलता था
इंदिरा गांधी तक के समय में मंत्रालय का जो पूरा कच्चा चिटठा था वह रिपोर्ट की शक्ल में सामने आता था
मनमोहन सिंह के काल में वह चिटठा सामने आया यह अलग मसला है कि परसेप्शन के आधार पर सीएजी ने उस समय राजनीतिक टोल खुद को बना लिया और विनोद राय कि हर रिपोर्ट उस परसेप्शन सत्य के हुई थी अगर ऐसा होता तो इतना लाभ होता ऐसा होता तो इतना मुनाफा होता ऐसा होता तो राजा से इतना बढ जाता और बाद में पता चला वह
क्रिटिकल एंगिल लगातार उठाया जा रहा था लेकिन एक क्षण के लिए सोचिए इस देश के भीतर में सरकार की तरफ से निकली हुई रिपोर्ट को जनता मान्यता देती है और मीडिया जब उसको दिखाता है तो सरकार पर दबाव पड़ता है यह परिस्थिति बीते नौ बरस से इस देश में गायब कर दी
और जब हम चार विभागों का नाम ले रहे तो हमको लगता है आखिर में इस देश के उस मीडिया का जिक्र जरूर करना चाहिए जिसका काम ही है इस देश की सरकार से सवाल करना या जिसका काम ही है इस देश के लोगों के लिए जो नीतियां बनती है वह लोगों तक पहुंचती है
या नहीं पहुंचती है सरकार जो कहती है वह सिर्फ कहती है या कर भी रही है सिर्फ इसी का परीक्षण अगर मीडिया शुरू कर दे तो फिर देखिये उसके बाद कैसी परिस्थिति इस देश के भीतर बन जाएगी
आप चुनाव का इंतजार कर रहे हैं या दो दिन में सरकार गिर जाएगी इस देश के भीतर के ऐसे मुश्किल हालातों में क्या कई नेता खोजा जा रहा है लेकिन नेता भी खोजिए तो ऐसा जो सिस्टम को महत्व दें और समझाए कि ऐसा सिस्टम जिसकी जवाबदेही जनता के ऊपर रहेगी और जनता की
आप दे ही के साथ इस देश की सरकार को काम करना होगा एक व्यक्ति नहीं होगा उस एक व्यक्ति की परिस्थिति इस देश के भीतर में संविधान के हिसाब से लागू
छक्कन बैलेंस करने वाली जो पिलर्स है
कार्यपालिका विधायिका न्यायपालिका है सबको हड़पने की कोशिश कोई सकता अगर करने लगे
तो ये
सोचिए क्या करेंगे
और इलेक्शन कमीशन अगर चुनाव के वक्त भी सत्ता अनुकूल दिखाई देने लगे तो फिर सोचिए आप क्या करेंगे
हाथ खड़े कर देंगे
या कुछ और बहुत बहुत शुक्रिया
बहुत बहुत शुक्रिया

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