दोस्तों राजनीति का खेल कॉन्फिडेंस का खेल है और अगर आप में कॉन्फिडेंस नहीं है तो फिर राजनीति मत कीजिए शायद ये सबसे बड़ी सीख वसुंधरा राजे सिंधिया को जो जयपुर में बैठी है लेकिन राजस्थान के चुनाव को लेकर उनके
के भीतर कॉन्फिडेंस नही है जो दिल्ली में बैठे मोदी और अमित शाह में है यहां तक कि शिवराज सिंह चौहान के भीतर भोपाल में बैठकर मध्य प्रदेश के चुनाव को लेकर जो कॉन्फिडेंस नहीं है वह कॉन्फिडेंस दिल्ली में बैठे मोदी और अमित शाह के पास है
लेकिन अगला सवाल है कि यह कॉन्फिडेंस आता कहां से है ? इस कॉन्फिडेंस के पीछे वह कौन सी ताकत होती है जो राज्यों के चुनाव हो या लोकसभा के चुनाव दिल्ली की बीजेपी की सत्ता जिस लिहाज से चलती है उसका मैसेज बहुत साफ होता है ।
सर्वे हमारा होगा लिस्ट हमारी होगी जीतेंगे कैसे आप यह भी हम पक्का करेंगे यानी आप सिर्फ प्यादे है लेकिन दूसरा कोई प्यादा है और हम वर्षीय और राजा है
यह सब कुछ कहने की बात नहीं है ।
लगता ऐसा ही रहा कि दिल्ली में बैठकर मोदी और अमित शाह की ताकत का एहसास तमाम बीजेपी के नेताओं को धीरे धीरे होने लगी लेकिन बीजेपी के भीतर मोदी और शाह की ताकत जहां से निकलकर आती है क्या उसी नब्ज पर ऊंगली अब सुप्रीम कोर्ट ने रख दी है ?
यानी गर्दन को पकड़ लिया है कि इस पाठक के पीछे जो कॉर्पोरेट की पूंजी है जिस तरीके से पूंजी का बहाव पार्टी के साथ चलते चला जाता है और जितनी बड़ी तादाद में पैसा इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए आता है और कॉर्पोरेट के जरिए आता हे उसमें कानूनी तौर पर अब वक्त क्या आ चुका है ? सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई करे और फैसला दे दें सुप्रीम कोर्ट ने आज इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर अपनी फाइल खोल दी और तय यह हुआ कि 31 अक्टूबर को फैसला इस पर आ जाएगा यानी जिस दौर में पांच राज्यों के चुनाव पूरे प्रचार के यौवन पर होंगे उस दौर में इलेक्टोरल बॉन्ड पर फैसला इसी बीच आना लेकिन सवाल है कि आज जब फाइल खोली और 31 अक्टूबर की जो तारीख तय हुई और उसमें यह भी कहा गया अगर मामला आगे बढ़ेगा तो 1 नवंबर तक चलेगा यानी चुनाव पहली वोटिंग सात नवंबर को होनी है जो मिजोरम में होनी है ।
लेकिन अगला सवाल यह है कि पूरे के पूरे नवंबर के भीतर में पांच राज्यों के चुनाव है और वोटिंग होनी है और उसके बाद लोकसभा के चुनाव है लेकिन क्या वाकई इलेक्टोरल बॉन्ड की फाइल इतनी मोटी और इतनी मजबूत है? या फिर सरकार के भीतर कॉन्फिडेंस सिर्फ उसी के हिसाब से आता है । या इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए कॉरपोरेट फंडिंग जो इस दौर में बीजेपी की होती चली गई वहीं उस ताकत की असल पहचान है? जिसके दूसरे नेताओं के पास जो पहुँच नहीं पाती है और तमाम दूसरे राजनीतिक दलों के पास भी इतनी बड़ी फंडिंग होती नहीं है एक क्षण के लिए पहले फाइल आज इसलिए खोली है क्योंकि आज सुप्रीम कोर्ट के भीतर सुनवाई होते वक्त जस्टिस तो ये जरुर जानना चाहा कि अब कई विधानसभा चुनाव के वक्त और लोकसभा चुनाव के वक्त भी या इलेक्ट्रॉल बॉन्ड बिकते हैं और उस इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए पॉलिटिकल फंडिंग इतनी बड़ी होती है क्या पाता इस दौर में आरटीआई के जरिए आपको कोई जानकारी नहीं मिलेगी क्या इसी दौर में
आरक्षण को छुपाया जाता है ? फंडिंग के जरिए यह बड़े हल्के शब्दों में सही लेकिन बात निकलते निकलते यहां तक आ ही गई कि आप 31 अक्टूबर तारीख को इस पर सुनवाई और फैसला दिया जाएगा ।
लेकिन उससे पहले एक परिस्थिति को जरा समझने की शुरुआत कीजिए दो 2091 के चुनाव में कितना इलेक्टोरल बॉन्ड से पैसा आया जो महत्वपूर्ण राज्यों के चुनाव जहां जहां इस देश के भीतर होते हैं उसी महीने या उससे दो महीने पहले इलेक्टोरल बॉन्ड बिकना शुरू हो जाता है मसलन अगर कर्नाटक के इलेक्शन को पिछले दौर में देखिए दो हज़ार तेईस के दौर में जो अप्रैल और मई के बीच में जो पूरा नोटिफिकेशन वोटिंग हो रही थी अप्रैल के महीने में इलेक्ट्रॉल बॉन्ड 917 करोड़ के खरीदे गए और उसमें से लगभग 85% बीजेपी के पास चले गए अप्रैल से पहले जनवरी में सिर्फ 308 करोड़ थे जो 917 करोड़ हो गए अप्रैल के महीने में जब इलेक्शन का नोटिफिकेशन जारी हो गया और इलेक्शन खत्म होने के बाद भी कुछ पर पाई 812 करोड़ की रही ज़रूर यानी चुनाव से ऐन पहले और चुनाव के ठीक अगले महीने जो इलेक्टोरल बॉन्ड की रकम होती है वह बढ़ जाती है ।
मसला सिर्फ कर्नाटक इलेक्शन का नहीं है मसला है उससे पहले याद कीजिए दो हज़ार बाईस में उत्तर प्रदेश के चुनाव जनवरी के महीने में उससे पहले या उसके बाद कभी भी 600 करोड़ रुपये इलेक्ट्रॉल बॉन्ड पार नहीं किया लेकिन यूपी इलेक्शन से ठीक एक महीने पहले जनवरी दो हज़ार बाईस 2022 में एक हज़ार दो सौ तेरह 1213 करोड़ रुपए इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए पॉलिटिकल फंडिंग हो गई उससे ठीक पहले चलिएगा दो हज़ार बीस 2020 में जब बिहार का इलेक्शन था वो दरअसल कोविड के बाद से निकली हुई परिस्थिति लेकिन बावजूद इसके इलेक्शन से पहले सिर्फ इक्कीस 21 करोड आते हैं इलेक्शन के बाद सिर्फ बयालीस 42 करोड आते हैं लेकिन इलेक्शन के पीरियड में दो सौ बयासी 282 करोड़ आते हैं और अगर उससे पहले आप लोगसभा के चुनाव में चले जाइएगा जैसे दो हज़ार चौबिस के लोकसभा चुनाव के वक्त में कितनी कॉरपोरेट फंडिंग होनी है इसकी इंतहा अब इसलिए नहीं की जा रही है क्योंकि बड़े बड़े कॉरपोरेट का पैसा इस मौजूदा सरकार पर लगा हुआ है यानी सरकार के साथ इस देश के भीतर में जिन बोतलों का जिस कॉर्पोरेट का जिस विचारधारा का कुछ भी सटेक पर लगा हुआ है वो सबकुछ दो हज़ार चौबिस के चुनाव में अपना पूरा करना चाहेगी व करता ही नहीं चाहेंगे कि मोदी सरकार हार जाए जिससे उसका जो कुछ बीते नौ बरस में स्टेक पर लगते चला गया आने वाली सरकार में वो कठखड़े
में खड़ा हो जाए या उनके लिए मुश्किल हो जाए तो दो हज़ार चौबिस का चुनाव तो फंडिंग के लिहाज से बहुत बड़ा चुनाव होगा लेकिन एक क्षण के लिए जानिए दो हज़ार उन्नीस 2019 के चुनाव के वक्त में जब जनवरी का महीना था तो सिर्फ तीन सौ पचास 350 करोड़ हो लेकिन जैसे ही नोटिफिकेशन मार्च के महीने में होता है एक हज़ार तीन सौ पैंसठ 1365 करोड़ हो पाई उसके बाद जैसे ही पहला फेज की वोटिंग होती है दो हज़ार दो सौ छप्पन 2256 करोड़ पाए और वोटिंग चल रही होती है रिजल्ट आया नहीं होता है मई के शुरुआत में आठ सौ बाईस 822 करोड़ यानी सिर्फ तीन महीने के भीतर चार हज़ार चार सौ तैंतालीस 4443 करोड़ रुपए की इलेक्ट्रॉल बोर्ड से फंडिंग पॉलिटिकल पार्टी को हो जाती है।
तो क्या इलेक्शन कमीशन इस पर नजर नहीं रखता है और क्या सुप्रीम कोर्ट ने अब इस नब्ज को पकड़ लिया है और इकतीस तारीख को व जिस फैसले का इंतजार हो सकता है यह देश इस रूप में कर रहा वह मामला आज कैसे किस रूप में सामने आया हमें लगता है आज उसकी प्रोसीडिंग्स क्यों हुई
सुप्रीम कोर्ट के भीतर उसे भी सुनना चाहिए क्योंकि एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म की तरफ से
जब वकील ने इस बात का जिक्र किया कि दरअसल हर लोकसभा और विधानसभा चुनाव से पहले इलेक्ट्रॉल बॉन्ड बिकना शुरू होता है आरटीआई से जवाब नहीं मिलता है भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है कौन पैसा दे रहा है जानकारी नहीं मिलती है और बाद में उन कंपनियों को आप लाभ दे सकते हैं
और यह कह सकते हैं ये कौन कहेगा कि उन्होंने ही फंडिंग की को फंडिंग की जानकारी तो है नहीं तो तब सीजीआई यानी चीफ जस्टिस का सवाल था तो क्या बैंक के पास जानकारी होती है
तो क्या कैश जो दिया जाता है या जिस रूप में बॉन्ड लिया जाता है वो सब कुछ गुमनाम होता है उन्होंने कहा वकील ने जानकारी दी एडीआर की तरफ से जी दोनों ही परिस्थिती होती है बैंक के पास जानकारी भी होती है और कौन दे रहा है यह गुमनाम भी रखा जाता है तब कहना पड़ा यह तो बड़ा महत्वपूर्ण है और उसके बाद सी
यानी चंद्रचूड़ ने अपने तौर पर कहा क्या इसे इस रूप में देखें कि बैंक या नकदी से जो खरीदा जा रहा हो या वह बैंक तो चैनल का श्रोत वर्किंग या कहें बैंकिंग चैनल ही माना जाए और वह पहचान गुमनाम है लेकिन नकदी पूरी तरह से गुमनाम है यह बताने का काम और ना ही का
बैंक का ही है तो फिर वकील साहब की तरफ से कहा गया ये दोनों ही परिस्थितियों और जब यह बात का जिक्र वाकई यह महत्वपूर्ण है और चुनावी फंड एक वाहक फंड की तरह है जिसमें एक व्यक्ति या यह व्यक्ति के नाम या धारक फंड में कौन कैसे ले रहा है इसकी जानकारी नहीं मिलती है तब उसके बाद से का
हा गया कि देखिए यह मान्यता प्राप्त राजनैतिक दलों के पास ही जाता है सरकार की तरफ से इसकी जानकारी दी गई है ऐरे गैरे को नहीं जाता है तो सीजीआई का सवाल था तो यह राजनितिक मान्यता प्राप्त जो डाला है अगर उनको इस देश में एक परसेंट वोट मिल रहा हो तो भी क्या यह फंडिंग बोले जाएंगे तो कहा
यह तो किया जा सकता है क्योंकि इसमें मान्यता प्राप्त राजनैतिक दलों के पास यह जाता है उसमें एक परसेंट कोई मैटर नहीं करता है यानी दोनों तरफ के लेनदेन को गुमनामी में छुपा लेना या ज्ञात कर देना या सार्वजनिक डोमेन से जानकारी को गायब कर देना ये कैसा मैसेज और उसी के
बात से सवाल आया कि क्या इस को मनी बिल से जोड़ा जाए या न जोड़ा जाए
की लगातार इस बात का जिक्र था कि मनी बिल के जरिए इस को जोड़ा जाए लेकिन चीफ जस्टिस पर इंडिकेट किया कि दरअसल मनी बिल का मसला जो है वह लाभ सुनवाई के लिए जा चुका है सात जजों की बेंच सुनवाई कर रही तब कहा गया सात जजों की बेंच सुनवाई कर रही तो एक दो महीने रोका जाए क्या जब उनका फैसला जाए तो चीफ जस्टिस ने
काम कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं लेकिन अगर आप उससे हटकर इस परिस्थिति को सुनना चाहते हैं तो फिर हम तैयार हैं
और ये तैयार वाली जो परिस्थिति थी उसमें बहुत साफ तौर पर उसके बाद चीफ जस्टिस ने कहा कि जब वकील और एटॉर्नी जनरल दोनों प्रारंभिक दलीलें जो है और उसमें सहमति हो गई है तो अब जो कुछ भी अदालत में सौंपे जा चुके हैं दस्तावेज सौंपे जा चुके हैं लेकिन उसके बावजूद भी सरकार
कार की तरफ से कोई जी अगर कोई आवेदन करना चाहें या ईडी की एडीआर की तरफ से कोई वकील आवेदन करना चाहे तो कर सकते हैं लेकिन सॉफ्ट कॉपी नोडल काउंसलिंग द्वारा संकलित की जाएगी और मामले की अंतिम सुनवाई इकतीस अक्टूबर को सूचीबद्ध किया जाता है और अगर इस पर कोई सुनवाई बड़ी हो जाती है
है तो एक नवंबर तक यह जारी रहेगी और सभी प्रस्तुतियां सत्ताईस अक्टूबर तक नोडल काउंसिल द्वारा
संकलित की जाएगी और यह स्टैंडर्ड ऑपरेशन प्रॉक्सी के तहत पूरी की पूरी कार्रवाई होगी इंडिकेशन बहुत साफ है
जिस दौर में इलेक्शन हो रहा होता है उसी दौर में इलेक्टोरल बॉन्ड बैंक बेचना शुरू करते हैं और यह माना जा रहा है कि इस दौर में जब पांच राज्यों के चुनाव का ऐलान हो गया है तो पंद्रह अक्टूबर के बाद से कभी भी इलेक्टोरल बॉन्ड दुबारा से बिकने शुरू हो जाएंगे जो नवंबर भर भी देंगे
और उसके बाद दिसंबर में भी कुछ हिस्सा पंद्रह तारीख तक कर दिया जाएगा और उसके बाद दो हज़ार चौबिस के चुनाव में या देश चला जाएगा अगला सवाल यह है कि लगातार अगर आप फंडिंग को देखें चाहे वह कॉरपोरेट फंडिंग हो या इलेक्ट्रॉल फंडिंग हो अगर अस्सी फीसदी तक हिस्सा सत्ताधारी पार्टी को जा रहा
और नाइंटी एक पर्सेंट तक जो क्षत्रप है सत्ता में उनको भी मिला दिया जाए तो उनके पास जा रहा है यानी सत्ता के साथ कॉरपोरेट फंडिंग खड़े होने में हिचकती नहीं है और इस दौर में कॉरपोरेट फंडिंग और इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए की फंडिंग को कानूनी तौर पर इस तरीके से रखा गया
जिससे कोई
आक्षेप न करें कोई उंगली उठाई लेकिन यह मामला लगातार चल रहा था और इसमें तमाम डॉक्यूमेंट्स एडीआर ने अपनी तरफ से रखें और इस बात की जानकारी दी कि दरअसल यह फंडिंग किस तरीके से पब्लिक डोमेन में आना चाहिए अगर कोई देवी रहा है तो बताएं क्योंकि इससे पहले की परिस्थिति की कि कोई भी विदेशी
फंड नहीं आना चाहिए लेकिन अब यह व्यवस्था है कि विदेशी फंड आ सकता है शर्तें की है कंपनी हिन्दुस्तान में हो हिंदुस्तान से जुड़ी हुई और हिंदुस्तान से उसका जुड़ाव किसी न किसी रूप में हो चाहे सत्तर फीसदी से ज्यादा पैसा बाहर का लगा हो लेकिन सरकार ने छूट दे रखी है कि उसमें विदेशी ने
देश हो सकता है तो वह फंडिंग भी कर सकता है तो जो विदेशी निवेश कर सकता है वह फंडिंग भी कर सकता है तो इस देश की पॉलिसी भी उस फंडिंग करने वाले को लाभ भी पहुंचा सकती है यह भी बड़ा क्लियर कट मसला है तो क्या यही वह एक ऐसी नब्ज है जो दिल्ली की सत्ता या बीजेपी के मौजूदा हाई कमान को
इतनी ताकत देती है कि वह कॉन्फिडेंस के साथ
सर्वे कराते हैं उसी हिसाब से जिसे मनचाहे टिकट दे जिसे मनचाहे टिकट नहीं दें चाहे तो सांसदों को उतार दें चाहे तो राज्य के मंत्रियों के टिकट काट दें चाहे तो एमएलए का टिकट काट दें चाहे तो नई तस्वीर लेकर आए गारंटी इस बात की है कि कोई दूसरे में यह कॉन्फिडेंस क्यों नहीं आता है
और अगर यह कॉन्फिडेंस इतना बड़ा है और अगर उसकी गर्दन पर सुप्रीम कोर्ट की ऊंगली अब चली गई है दरअसल पूरा मसला फंडिंग का है तो क्या इलेक्शन के बीच में अगर इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर अब फैसला आने की तैयारी में जब बात बढ़ चुकी है और देश के भीतर में किसी भी पैसे को
कोई कैसे छुपा सकता है इस सवाल का जवाब तो तुरंत सुप्रीम कोर्ट पहुंच सकता है
और खासतौर से तब जब बसवा हजारों करोड़ का और वो सीधे तौर पर इस देश की राजनीति को प्रभावित कर रहा हो जो राजनीति इस देश के भीतर में डेमोक्रेसी को स्थापित करने का दावा करती हो और डेमोक्रेसी का मतलब इस देश में चुनाव हो और चुनाव के साथ की प्रक्रिया चुनाव आयोग
की भूमिका और इस देश के भीतर में इलेक्शन कमीशन की कार्रवाई अगर नहीं होती है क्योंकि वहां पर नियुक्तियां भी सरकार कर रही है तो ऐसे में क्या सुप्रीम कोर्ट अब इन बातों को समझ रखा है और समझने की परिस्थिति में है
दौर में अब सुप्रीम कोर्ट के भीतर यह मामला जाएगा तो क्या एक ऐसी परिस्थिति आएगी जिसमें सरकार के लिए अब मुश्किल होने वाली है और यही वह कॉन्फिडेंस है क्योंकि यह कॉन्फिडेंस का मतलब क्या होता है हमें लगता है इसके लिए राजस्थान और मध्य प्रदेश की जो लिस्ट जारी कई उसको भी परखा जा सकता है एक ग्यारह सांसदों को होता
आ जा चुका है साथ सांसद लोकसभा और राज्यसभा मिलाकर राजस्थान से चुनाव लड़ेंगे चार सांसद अभी तक जो ऐलान हुआ है वह मध्यप्रदेश से चुनाव लड़ेंगे राजस्थान के भीतर ऐसे ऐसे चेहरे गायब हो गए जो सोच रहे थे हम चुनाव मैदान में नजर आएंगे वसुंधरा राजे जो सोच रही थी कि हमारे लोगों को टिकट दिया जाएगा
तो उसमें से चालीस पर्सेंट को अभी टिकट दिया गया बाकियों को टिकट नहीं दिया गया जो उनकी अपने चेहरे खुद वसुंधरा राजे चुनाव लड़ेंगी नहीं वैसा ही सस्पेंस से जैसे शिवराज सिंह चौहान को आखिरी क्षण में बुधनी से टिकट दे दी गई चलिए आप भी चुनाव लड़ लीजिए लेकिन एक क्षण के लिए सोचिए किरोड़ी लाल मीणा
दीया कुमारी राज्यवर्धन राठौड़ बालक नाथ देवजी पटेल भागीरथ चौधरी नरेंद्र खीचड़ यह दरअसल सांसद हैं जो मैदान में कूदे है लेकिन जिक्र इसका नहीं है दीया कुमारी कहां से चुनाव लड़ रही है विद्याधर नगर से चुनाव लड़ेंगी जो कि भैरो सिंह शेखावत के परिवार की सीट हुआ
करती थी लेकिन अब दीया कुमारी को वहां से उतार दिया गया वसुंधरा के सबसे करीबी राज पाल शेखावत उनकी सीट खोटे भरा थी वहां से राज्यवर्धन राठौड़ को टिकट दे दिया तो क्या यह कहा जाए कि जो करीबी है चाहे वह बाबूलाल गुज्जर हो चाहे राजपाल सिंह शेखावत तो वह
का टिकट कट गया और वसुंधरा की नहीं चली या यह माना जाए कुछ उनके करीबी जो शुभकरण चौधरी है या बबलू चौधरी को टिकट दे दिया गया लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के भीतर क्या वाकई एक ऐसी बिसात दिल्ली का हाई कमान बिछाता है जिसमें वह अपने तौर पर संतुष्ट होता है कि दरअसल इससे पहले की राजनीति जहां जहां चुनाव हारी
वहां वहां भी हम नए तरीके से अब राजनीति की कमान को कसेगी उन्नीस जगह ऐसी है जहां से बीजेपी दो हज़ार आठ के बाद चुनाव जीती ही नहीं उन उन्नीस सीटों में से ग्यारह जगहों पर बिल्कुल नए उम्मीदवार को उतार दिया गया वह लालसोट का इलाका है नवलगढ़ है फतेहपुर है झुंझुनू
ऐसा चोर है बस्सी है बागीदौरा है सपोटरा है कोटपुतली है डांटा भागा है लक्ष्मण गढ़ है ये सारी परिस्थिति बताती है कि दिल्ली हाई कमान अपने तौर पर कितना मजबूत है
दूसरी परिस्थिति यहां से शुरू होती है इस देश के भीतर क्षत्रपों की राजनीति करते हुए चाहे वसुंधरा सोचती रही हो बहुत मजबूत रहेगी चाहे शिवराज सिंह चौहान सोचते रहे या परिवार के तौर पर सिंधिया परिवार सोचता रहा कि हमारी ताकत जहां भी रहेगी कम से कम इस पूरे इलाके में
जो ग्वालियर संभाग का इलाका है चंबल संभाग का इलाका है यहां हमारे ही तूती बोलेगी तो एक झटके में दिल्ली के कॉन्फ्रेंस में उन्हें भी दिखा कर रख दिया और अपने तौर पर देखिए तो यशोधरा राजे ने कहा मैं इस बार चुनाव नहीं लड़ा जो शिवपुरी से चुनाव लड़ती है
वसुंधरा राजे चुनाव लड़ेंगी नहीं लड़ेंगी राजनीति में उनका आने वाले वक्त में क्या योगदान होगा कोई नहीं जानता है इस दौर में ज्योतिरादित्य सिंधिया कहां टिकेंगे कैसे टिकेंगे कोई नहीं जानता है
कुछ एमएलए को जो हटा दिया गया कुछ पुराने एमएलए को टिकट दिया गया तो क्या यह एक ऐसी परिस्थिति है इस देश के भीतर में जिसमें चुनावी जीत ही सारे कॉन्फिडेंस को पैदा करती है क्योंकि इस देश के भीतर की परिस्थिति में बहुत एग्रेसिव पॉलिटिक्स इस दौर में मोदी और शाह
की रही है वह इतनी एग्रेसिव तरीके से चली कि उसके काउंटर में कांग्रेस को भी एग्रेसिव होना पड़ा अपनी पारंपरिक राजनीतिक लाइन को छोड़कर भी ओबीसी पिछड़े और जाति की राजनीति को कहीं ज्यादा तेजी से उभरने लगी यानी उसकी अपनी जो आइडिया ऑफ कांग्रेस या आइडिया ऑफ फील्ड
दिया था वह एक झटके में दरकिनार किया और न्याय की एक नई प्रक्रिया और नई पहल को शुरुआत कर दी गई तो क्या यह माना जाए कि यह पूरा का पूरा कॉन्फिडेंस जो चुनाव जीतने के लिए होता है उसमें तीन ही महत्वपूर्ण चीज मैटर करती है जो कॉन्फिडेंस के पीछे होती है
पहली चीज जो सबसे बड़ा वह मनी ट्रेल होता है पैसा होता है सुप्रीम कोर्ट ने उस पर उंगली रखी है मनाइए कि उस पर जो फैसला आए वह फैसला इस देश की राजनीति को एक साफ करने की दिशा में ले जाए दूसरी परिस्थिति पर उंगली कोई अर्थ नहीं पाया अलग अलग माध्यमों से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा
जरुर खटखटाया गया लेकिन वहां पर केंद्र की ताकत पार्लियामेंट के भीतर उसका बहुमत सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को भी दिखा देता है व चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का मसला हो या फिर इस देश के भीतर जो जांच एजेंसियां है उनको पॉलिटिकल तौर पर इस्तेमाल करने के जो आरोप सरकार पर लगे
कभी सुप्रीम कोर्ट कुछ कर नहीं पाया वो एक दौर में सीबीआई थी एक दौर में ईडी है एक दौर में इनकम टैक्स है
तो जांच एजेंसियों का साथ होना कॉरपोरेट की फंडिंग होना और तीसरी महत्वपूर्ण बात है कि वहां लोग जिनका इस टेक इस नई धारा की राजनीति के साथ बहुत ही एग्रेसिव तरीके से इस दौर में मोदी शाह की सियासत के साथ खड़ा है
के साथ किसी भी हाल में किसी भी तरीके से उन्हें हाशिए पर धकेला है उनके अनुकूल ही फैसले देने वह फैसला हो सकता है एक दौर में भीड़ तंत्र को लेकर उठ रहा हो एक दौर में सीएए एनआरसी को लेकर टकराव एक दौर में इस देश के भीतर में हिंदुत्व राष्ट्रवाद को लेकर उठता हो या एक दौर में
संख्यकों को हाशिये पर धकेलने को लेकर उठता कुछ भी हो सकता है वो यानी एग्रेसिव राजनीति में जो तबका साथ जुड़ा जिसका जिसका एस्टेट मौजूदा वक्त में सरकार के साथ है उनके साथ सरकार खड़ी है और वह सरकार के साथ खड़े रहे यह तीसरा हिस्सा होता है कॉन्फिडेंस का और सहयोग
से भारत की राजनीति के भीतर इस कॉन्फिडेंस को इन तीन माध्यमों से इससे पहले कोई भी राजनीतिक सत्ता हो या कोई भी प्रधानमंत्री हो वो इस तरीके की राजनीति उसने इस देश में नहीं कि क्षत्रपों ने राजनीति साथ ही तो अपने वोट बैंक को लेकर साथ ही चाहे वह पिछड़ा राजनीति से निकले हुए राजनैतिक दल
हो या दूसरे प्रांतों में चाहे वह द्रविड़ पार्टी के तौर पर उनकी मौजूदगी हो चाहे वह कहीं पर चंद्रबाबू नायडू या तेलांगना के भीतर केसीआर के जरिए नजर आएंगे
मैसेज तीन ही है
पहला मैसेज सबसे बड़ा है क्या जब चुनाव का ऐलान हो गया उसके बीच सुप्रीम कोर्ट जब इलेक्टोरल बॉन्ड पर फैसला देने की तारीख तय कर चुका है और अब पंद्रह तारीख तक इलेक्टोरल बॉन्ड बीज एसबीआई बैंक से बिकने शुरू होने वाले है जिसकी तारीख का ऐलान आज नहीं कल हो जाएगा वह ज्यादा
ज्यादा पंद्रह होगा अट्ठारह होगा या बीस तक जाएगा
तो क्या इस पूरी प्रक्रिया में इस पर सुप्रीम कोर्ट अगर रोक लगाता है या सरकार से सवाल करता है तो अगली स्थिति क्या पड़ेगा
जिस दौर में कॉर्पोरेट सरकार के साथ है विपक्ष सीधे सीधे कॉर्पोरेट की इकोनॉमी और उसकी साझेदारी जो सरकार के साथ उसको अगर निशाने पर ले रहा है तो क्या कॉर्पोरेट कहीं ज्यादा पैसा अलग अलग इलेक्टोरल ट्रस्ट के जरिए सरकार को देने की स्थिति में आएगा यानी सत्ताधारी पार्टी का पाठ
थी और उसकी फंडिंग बढ़ जाएगी और उसके बाद सरकार की नीतियों में कॉर्पोरेट का दखल और बढ़ जाएगा यह भी होने वाला है और तीसरी परिस्थिति बहुत साफ है कि अगर इन परिस्थितियों के आगे सरकार लगातार यानी मोदी सरकार यानी बीजेपी जो अब बीजेपी भी मोदी बीजेपी हो गई है अगर वह आने वाले वक्त में जिस सियासत को
साधना चाहती है तो वह हर उस रास्ते को बंद करेगी जो उसके सामने इस तरीके के संरक्षण को लेकर खड़ी हो जाती हो और चाहे कानूनी तौर पर हो चाहे संवैधानिक तौर पर हो चाहे इस देश के भीतर लोकतांत्रिक तौर पर
तो राजनीति के इस नए मिजाज में आपका स्वागत है इंतजार कीजिए
अक्टूबर तक बहुत बहुत शुक्रिया

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