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खैराबाद की मस्जिद फतेहपुरी के करीब पेड़ों पर लटका दी गई थी लाशें।
लखनऊ, जागरण संवाददाता। अंग्रेजों का देश में रहना हराम है। उन्हें देश के बाहर निकालने का फतवा देने वाले अल्लामा फजले हक ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। जैसे ही अंग्रेजों ने जाना और अल्लामा को गिरफ्तार कर उन्हें काला पानी की सजा सुनाई। अदालत ने उनसे फतवा वापस लेने को कहा। लालच दिया गया। लेकिन अल्लामा ने फतवा वापस लेने के बजाए मौत को गले लगाना बेहतर समझा।
ये उन दिनों की बात है जब जेल में कोई कैदी मर जाता था तो जेल का जमादार उसकी टांग पकड़कर बिना किसी रहम के घसीटते हुए उसके कपड़े उतारकर पत्थरों के नीचे दबा दिया जाता था। न तो कब्र नसीब होती थी और न ही अंतिम संस्कार कर अग्नि दी जाती। अगर इस्लाम धर्म में आत्महत्या जायज होती तो ऐसे जीने से मर जाना बेहतर होता। ये शब्द खैराबाद के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना अल्लामा फजले हक के थे जिसका उल्लेख फारसी भाषा में लिखी पुस्तक अस्सूरतुल हदिया में किया गया है। पुस्तक अंडमान के सेलुलर जेल में 1858 से 1861 के बीच लिखी गई। मौलाना अल्लामा फजले हक खैराबादी ने देश के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर मौत को गले लगा लिया। 20 जुलाई 1797 को खैराबाद के मियां सराय में मौलाना फजल इमाम के घर जन्मे अल्लामा दर्शन शास्त्र के विद्वान थे। दिल्ली के मुख्य न्यायाधीश पद को भी उन्होंने सुशोभित किया। उनकी पुस्तकें विश्व के अनेक विश्वविद्यालय में आज भी पढ़ाई जाती हैं। पूर्वज ईरान के थे। बाद में वह भारत आ गए। बदायूं हरगांव और अंत में खैराबाद में बस गए। उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी का राज्य स्थापित हो चुका था। अंग्रेजों द्वारा कारतूसों में गाय व सुअर की चर्बी मिलाकर ङ्क्षहदु-मुसलमान का धर्म भ्रष्ट कर उनको जबरन ईसाई बनाया जाता था। अंग्रेजों ने अत्याचार की सारी सीमाएं पार कर दी थीं, इंसानों को बेरहमी से कत्ल किया जा रहा था। मस्जिद फतेहपुरी से किले के दरवाजे तक पेड़ों में लाशें लटक रही थीं। यह ह्नदय विदारक दृश्य देखकर अल्लामा का दिल दहल गया और मुस्लिम कौम का सरपरस्त होने के नाते फतवा जारी कर दिया जिसके बाद अंग्रेजों ने अल्लामा को पकड़ लिया। चार मार्च 1859 को जस्टिस थरबर्न ने उनकी जायदाद की और काला पानी की सजा सुनाई।

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