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Tuesday, 8 August 2023

भारत की राजनीति बदल चुकी है august 2023

 
दोस्तों ।।।
भारत की राजनीति बदल चुकी है भारत की संसदीय व्यवस्था की राजनीति बदल चुकी है संसद के भीतर अगर आपके पास ताकत है न सिर्फ बहुमत की ताकत बल्कि इतनी ताकत लोकसभा और राज्यसभा दोनों जगहों पर है जहां पर आप लगातार बहुमत में रहे तो फिर आप इस देश के भी
अब कुछ भी कर सकते हैं किसी भी राज्य को आप केंद्र शासित राज्य में तब्दील कर सकते हैं किसी भी केंद्र शासित राज्य की समूची ताकत आप लेफ्टिनेंट गवर्नर के हाथ में दे सकते हैं
यानी चुनी हुई सरकार कितना मायने रखेगी संसद के सामने सभी बौने हो चुके हैं और यह फलसफा आज का है आज का इसलिए क्योंकि दिल्ली बिल जो संसद में रखा गया था लोकसभा के बाद राज्य सभा में भी पास हो गया
राज्यसभा में बीजेपी के पास जो वोटों की तादाद थी वह एक सौ इकतीस थी और जो इंडिया दूसरी तरफ खड़ा था कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी राजनीतिक दलों के सांसदों की मौजूदगी या कहें राज्यसभा सदस्यों की मौजूदगी तो उनकी कुल ताकत एक सौ दो की थी यानी एक तरफ
एक सौ इक्कीस और दूसरी तरफ एक फोटो और यह ताकत भारत के भीतर किसी भी परिस्थिति को बिगाड़ सकती है और अब यह कल्पना के परे है कि किसी चुनी हुई सरकार की ताकत को संसद कैसे अपने हाथों में ले सकती और उसके बाद तमाम तर्कों को गढ़ सकती है क्योंकि अब
नया सिलसिला इस देश के भीतर उस राष्ट्रपति शासन के आगे की व्यवस्था का चेहरा है
जिसमें आप संपूर्ण तरीके से पूरी व्यवस्था को ही बदल डालते हैं
क्योंकि याद कीजिये इंदिरा गांधी के दौर में अक्सर होता था राष्ट्रपति शासन लगा दिया और यह सच भी है कि इंदिरा गांधी के दौर में सबसे ज्यादा पचास बार राष्ट्रपति शासन अलग अलग राज्यों में लगा और इस देश के भीतर तकरीबन सवा सौ से ज्यादा बार तकरीबन एक सौ बत्तीस बार
इस देश के भीतर में राष्ट्रपति शासन लगा है लेकिन अब सवाल राष्ट्रपति शासन के आगे का है क्योंकि राष्ट्रपति शासन तो चंद दिनों के लिए होता है कुछ महीनों के लिए होता है कभी कभी साल भर भी होता है लेकिन जिस व्यवस्था के तहत इस दौर में राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदलना
और किसी केंद्र शासित प्रदेश की समूची ताकत को अपने हाथों में ले लेना और वहां की चुनी हुई सरकार को पूरे तरीके से हाशिए पर धकेल देना और स्थिति ऐसी आ जाय कि जो नौकरशाह है वह मुख्यमंत्री से ज्यादा ताकतवर नजर आने लगी जो भी नई नियुक्ति हो जो भी ट्रांसफर
हो उस पर मुख्यमंत्री का कोई हस्तक्षेप करने की ताकत उसके पास न बच पा रही हो यानी दिल्ली की जनता ने जिस पॉलिटिकल पार्टी को चुना या जिस नेता को चुना उसके पास कोई ताकत नहीं है और जो तर्क गढ़े गए आज पार्लियामेंट के भीतर हो सकता है आप इस देश के किसी भी राज्य को
लेकर यह परिभाषा कर सकते हैं और उसके बाद यह सवाल खड़ा कर सकते हैं कि आखिर क्यों नहीं इस राज्य को केंद्र शासित राज्य में तब्दील कर दिया जाए ठीक वैसे ही जैसे जम्मू कश्मीर को भी दो केंद्र शासित राज्यों में बदल दिया गया और उसी तरीके से दिल्ली जो पहले से केंद्र शासित था उसकी ताकत
केंद्र सरकार ने अपने हाथ में ले भी और एलजी को वहां पर सबसे सुपर सीएम के तौर पर नियुक्त कर दिया
जरा एक पन्ने को आज पढ़ें समझे और खोलें कि भारत की राजनीति आज बदलकर ऐसे कई एक सौ इकतीस वोट पक्ष में थे जो दिल्ली का पिलाया था और कमोवेश यह समझना होगा कि बीजेपी के पास अपने नहीं कि तू यानी बानवे सांसद थे जिसमें पाँच नॉमिनेटेड थे
के अलावे एनडीए की ताकत अगर उसमें साथियों को जोड़ दिया जाए तो ग्यारह और जोड़ लीजिए यानी एक सौ तीन की ताकत के साथ खड़ी हुई थी एनडीए इसके बाद साथ में एआईडीएमके था आर पी आई थी एजीपी था पीएम के था तमिल एमके था नेशनल पीपुल्स पार्टी थी
नेशनल फ्रंट था यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी थी इसमें नवीन पटनायक की बीजेडी भी थी इसमें वाईएसआर कांग्रेस यानी जगन रेड्डी की पार्टी भी थी जिनके दोनों सांसदों की मौजूदगी है और बीएसपी की मौजूदगी टीडीपी की मौजूदगी जेडीएस की मौजूदगी ये सारी परिस्थितियों के बाद एक सौ इक्कीस
आंकड़ा बिल के पक्ष में पड़ा और विपक्ष में एनडीए एकजुट था
कांग्रेस के सबसे ज्यादा इकतीस आम आदमी पार्टी के दस डीएमके के दस टीएमसी के तेरा सीपीएम के पाँच जेडीयू के पाँच शिवसेना के चार झारखंड मुक्ति मोर्चा के दो इसके अलावे सीपीआई आईयूएमएल केरल कांग्रेस आरएलडी एमडीएमके एनसीपी और टीआरएस की भी मौजूदगी
थी जोकि सबको जोड़िएगा तो एक सौ दो तक ही पहुंच पाए लेकिन बात आंकड़ों की नहीं है बात तो अब उस फेडरल स्ट्रक्चर उस कॉन्स्टिट्यूशन उस डेमोक्रेसी और शायद एक चुनी हुई सरकार की है क्योंकि आज अमित शाह ने जब जवाब देते वक्त तीन बातों का जिक्र किया कि हमारा मकसद
भ्रष्टाचार को रोकना है इसीलिए इस बिल को लेकर आए भ्रष्टाचार को रोकने का जिक्र बीजेपी के नेता और देश के गृहमंत्री कर रहे हैं जिन्होंने इस देश के भीतर कितने भ्रष्टाचारियों को सत्ता बनाने के लिए अपने साथ लिया और ताजा मिसाल महाराज की है दूसरा उद्देश्य उन्होंने
पाया कि सबकुछ संविधान के मुताबिक है संविधान की परिभाषा को कैसे गढ़ा जाए और उसकी ऐसी परिस्थिति बनाई जाए जहां पर फेडरल स्ट्रक्चर कोई मायने नहीं रखती है तो संविधान के मुताबिक कर से बार बार हुआ और जो प्रावधान जिसका जिक्र किया गया कि संविधान का उल्लंघन
नहीं करते हैं और इस बात का जिक्र किया गया कि दिल्ली अन्य राज्यों से अलग है और इस बिल से सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले का उल्लंघन नहीं है यानी सुचारू रूप से भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने का जिक्र बीजेपी गृह मंत्रालय ने इस बिल के जरिए दिल्ली में
केजरीवाल सरकार के हाथ से सारी ताकत छीनते हुए खुले तौर पर इस बात का ऐलान किया कि हमें जल्दबाजी इसलिए थी क्योंकि जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था ग्यारह पाँच दो हज़ार तेईस को तो दो घंटे बाद से ही आम आदमी पार्टी विजिलेंस दफ्तर में पहुंचकर उन तमाम फाइलों को था
आ रही थी जो शराब घोटाले से जुड़े थे
इस देश के भीतर उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया की पहली बार देखा गया कि आधी रात नहीं बल्कि सुबह एक दो तीन बजे तक विजिलेंस दफ्तर के अंदर भी खंगाली जा रही थी फाइलें और यह बात का जिक्र करते ही हमें सीबीआई हेडक्वार्टर भी याद आता है जहां देश के एनएसए ने एक ऑपरेशन किया था सीबीआई के भीतर से
कोई आवाज उस वक्त सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा न निकाल सके
खैर किसके हिस्से में क्या आता है लेकिन अगला सवाल यह है कि संवैधानिक मशीनरी को तोड़कर क्या एक ऐसी परिस्थिति बनाई गई जिसके बाद चुनी हुई सरकारों का कोई मतलब नहीं बचेगा देश के भीतर सबको पता था कि यह असंवैधानिक है
क्योंकि फरवरी दो हज़ार तेईस में जब सुप्रीम कोर्ट के सामने जम्मू कश्मीर का मसला आया था तो सुप्रीम कोर्ट में दो जस्टिस ने जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अभय ओका ने इस बात का जिक्र किया था कि किसी भी स्टेट को तोड़कर यूनियन टेरिटरी में तब्दील केंद्र सरकार कर सकती है
पार्लियामेंट कर सकती है दूसरी बात उन्होंने कही थी कि यूनियन टेरिटरी के सारे अधिकार छीनकर एलजी के हाथ में दिए जा सकते हैं संसद के पास यह पावर है
इसके बाद बचाव किया और संसद उसी लकीर पर चल पड़ी और संसद के पास कितनी ताकत है इसका जिक्र कॉन्स्टिट्यूशन के आठ किलो थ्री आर्टिकिल फोर और आजकल तो थी नाइन एक का जिक्र किया गया जिसके जरिए परिभाषा यही दी गई कि जब सुप्रीम कोर्ट भी कह रहा है कि किसी भी स्टेट को तोड़ा
सकता है उसके एरिया बाउंड्री नाम तक को बदला जा सकता यह ताकत संसद की है तो बचा किया और जब कुछ नहीं बचा तो फिर फेडरल स्ट्रक्चर का जिक्र आज क्यों किया जाए यह भी एक सवाल को की चर्चा लगातार जब हो रही थी तो इसमें इस बात का भी जिक्र किया गया कि दरअसल स्टेट को एक से ज्यादा
यूनियन टेरिटरी में तब्दील भी किया जा सकता है अब यहां पर सवाल था जिन बातों को सामने लाया गया बीते पच्चीस बरस से बीजेपी दिल्ली में सरकार बना नहीं पाई है यानी बीते पच्चीस बरस में अच्छे मौके आए चुनाव के बीजेपी जीत नहीं पाई तो क्या सब कुछ परिवर्तन मोदी
सत्ता के आने के बाद हो रहा है क्योंकि खुद गृहमंत्री अमित शाह ने बताया कि नाइंटी से लेकर दो हज़ार पंद्रह तक जितने भी मुख्यमंत्री थे सब का केंद्र सरकार से अच्छा रिश्ता था एलजी के साथ अच्छा रिश्ता था सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन एक झटके में जब केजरीवाल आते हैं तो सब चीजें उलट पुलट
आती है और केजरीवाल कहते हैं एक झटके में जब मोदी सत्ता आती है तो सबकुछ उलट पुलट जाता है तो क्या यह केजरीवाल और नरेंद्र मोदी की सत्ता ने इस देश के भीतर में कुछ नई परिभाषाएं गढ़ डाली
और पहली बार केजरीवाल को यह महसूस हुआ कि जिस राजनीति के आसरे व चल निकले हैं और अगर केंद्र सरकार अपने संसद के भीतर की ताकत के आसरे उनसे सबकुछ छीन लेगी और सुप्रीम कोर्ट भी यही कहता है कि दरअसल पार्लियामेंट अगर चाहे तो बदल सकता है इसमें कोई दिक्कत नहीं लेकिन सुप्रीम कोर्ट के
में एक सवाल बार बार रहता है कि फेडरल स्ट्रक्चर को तो मानेंगे चुनी हुई सरकार है उसमें मुख्यमंत्री के पास कुछ अधिकार तो बचेंगे और जिद सिस्टम के तहत नौकर शाही से काम कराया जाता है उस नौकर शाही को मुख्यमंत्री के ऊपर कैसे बैठाया जा सकता है ऐसा तो होगा नहीं लेकिन आज सब कुछ हुआ है
कुछ होने का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि जो कॉन्स्टिट्यूशन के आर्टिकिल थ्री फोर और टू थ्री नाइन एक्स जिक्र किया गया सवाल अब यह है क्या इसके बाद की परिस्थिति में जिन राज्यों में बीजेपी आ नहीं सकती है वहीं यह खेल करना शुरू कर देगी दो हज़ार चौबिस का चुनाव शायद इसीलिए सबसे
ज्यादा महत्वपूर्ण हो चला है क्योंकि दो हज़ार चौबिस के बाद अगर बड़ी ताकत के साथ बीजेपी चुनाव जीतती है तो जो दिल्ली में हुआ है जो जम्मू कश्मीर में हुआ वाक्यों उन राज्यों में नहीं हो सकता है जिन राज्यों में बीजेपी सोच भी नहीं सकती है कि उसकी सरकार बनेगी आधे दर्जन राज्य खुले तौर
पर ऐसे है
आधे दर्जन राज्य में पश्चिम बंगाल भी आता है बी भी आता है आंध्र प्रदेश आता है तमिलनाडु आता है केरल आता है और उड़ीसा भी आता है इन आधे दर्जन राज्यों में बीजेपी अपने बूते आ ही नहीं सकती है और मुश्किल तो पंजाब में भी है लेकिन अब केजरीवाल को एक जगह छोड़ा गया है तो पंजाब कब तक उनके पास रहेगा
यह भी सोचने की बात है क्योंकि वह सीमावर्ती राज्य है और वहां की परिस्थितियों को लेकर ज़िक्र बार बार गृह मंत्रालय कर चुका है और आज तर्कों को गृह मंत्री ने कहा है उसमें सारी चीजें अगर रखनी शुरू कर दें तो लगता है ऐसे है इस देश के भीतर में तमाम राज्यों में एक आदर्श स्थिति है न तो वहां
करप्शन है न वहां विधान सभा में कोई उठापटक है न ही गवर्नेंस के तौर पर कोई मुश्किल आती है न ही कैबिनेट की बैठक को लेकर कोई मुश्किल होती है ना ही किसी पॉलिसी को लेकर कोई मुश्किल होती है सब इस देश के भीतर में सबकुछ ठीक ठाक है सिर्फ दिल्ली में ही गड़बड़ है
और यहीं से वो सवाल खड़ा होता है कि जब खुद बीजेपी को कटघरे में विपक्ष खड़ा करता है तो बीजेपी एक की बात कहती है जनता ने हमें चुना है आप हम पर उंगली उठा नहीं सकते हैं तो जनता ने केजरीवाल को भी चुना जनता ने जम्मू कश्मीर के भीतर भी चुना को की याद कीजिए जम्मू कश्मीर के भीतर पर इसी
के बाद जिस ताकत के साथ बीजेपी चुनाव लड़ रही थी लेकिन बावजूद इसके वह कश्मीर में नहीं हो सकी जम्मू में जरुर घुस गई तो ऐसी परिस्थिति पश्चिम बंगाल बिहार आंध्र प्रदेश तमिलनाडु केरल ओडिशा में क्यों नहीं आ सकती है और पंजाब में क्यों नहीं आ सकती है जहां पर बीजेपी अपने बूते आएगी नहीं क्यों नहीं ऐसी परिस्थिति वह
गधे की और बनाएगी जिसमें संसद की ताकत सबकुछ तय करें
हालांकि गृहमंत्री यह कहने से नहीं चूके यह भ्रम की बात है कि हम दूसरे राज्यों में ऐसा प्रयोग करेंगे या सिर्फ यूनियन टेरिटरी में हो सकता है लेकिन इस बात को छुपा गए कि सुप्रीम कोर्ट ने तो यहां तक कहा जो फरवरी में जब वो सुना रहे थे अपना फैसला कि अगर संसद चाहे तो किसी राज्य को यूनियन टेरिटरी में बदल सके
तीन तो राज्य को यूनियन टेरिटरी में बदलना और यूनियन टेरिटरी के जरिए अपने पास समूची ताकत को ले आना क्योंकि इससे पहले अगर आपके जहन में आए तो धारा तीन सौ छप्पन का को प्रयोग होता था राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाता था और इस देश के भीतर में जो राष्ट्रपति शासन लगे हैं अगर उसको आप रखें एक सौ बत्तीस
बार लगी है कांग्रेस ने नब्बे बार राष्ट्रपति शासन लगाए बयालीस बार दूसरों ने लगाए इंदिरा गांधी ने उन्नीस सौ छियासठ से सतत्तर के बीच उन चालीस बार राष्ट्रपति शासन लगाया लेकिन सवाल है कि उसके तुरंत बाद जनता पार्टी भी आई तो उसने भी एक झटके में कांग्रेस शासित राज्यों में राष्ट्रपति
शासन लगा दिया लेकिन यह राष्ट्रपति शासन से आगे की कड़ी में हम आकर खड़े हो गए हैं क्योंकि अगर आप राज्यवार भी परिस्थिति को समझना शुरू करें तो दो हज़ार पंद्रह के बाद अगर कहीं पर राष्ट्रपति शासन लगा तो वो सिर्फ जम्मू कश्मीर है जहां पर दो हज़ार पंद्रह दो हज़ार सोलह और दो हज़ार उन्नीस में लगा
इसके अलावे राष्ट्रपति शासन अगर बिहार में भी देखें तो नाइनटीन सिक्सटी नाइन से दो हज़ार पाँच तक आठ बार लगता है दिल्ली में भी लगा है और दिल्ली में जब लोकपाल बिल रखा गया था दो हज़ार चौदह में और सरकार गिर गई थी उस वक्त भी राष्ट्रपति शासन लगा था लेकिन यह सब कुछ लिमिटेड होता है यानी पहली बार सिस्टम को ही
हमने इस तरीके से बना दिया कि अब व एक अस्थायी व्यवस्था हो रही तो इसमें फेडरल स्ट्रक्चर का जिक्र कहां पर होगा इसमें राज्य के अधिकार कौन से होते हैं और जनता जिन्हें चुनती है अब उसका सवाल कहां बचेगा क्योंकि वह तो अपनी उस नुमाइंदे के पास जाती अपनी बातों को
अटार्नी के लिए और जरूरतों को बांधने के लिए जिसको उसने वोट दिया है किसी डॉक्टर साहब को वोट तो नहीं दिया है तो दिल्ली के भीतर कोई भी बोर्ड हो किसी भी तरीके की कोई नियुक्ति हो रही हो अब मुख्यमंत्री उस पर कुछ नहीं कर सकते हैं तीन सदस्यीय होगी टीम जिसमें दो सदस्य सेक्रेटरी होंगे एक मुख्यमंत्री बतौर चेयरमैन होंगे लेकिन चेयर
की अकेले नहीं चलेगी व वोटिंग से चलेगा टू वन जहां पर होगा उसके पक्ष में होगा और यह जो नौकरशाहों होंगे या केंद्र के अधीन होंगे यानी उन्हीं के पैरोल पर होंगे यानी उन्हीं के दिशा निर्देशों पर काम कर रहे हैं तो दिल्ली ने एक नया प्रयोग इस देश के भीतर में अस्थाई तरीके से दे
दिया कि केन्द्र सरकार अगर संसद में ताकतवर है और अपने बूते व काम कर सकती है तो फिर कोई मतलब नहीं है जनता के वोट का और चुनी हुई सरकार का यह पहला मैसेज निकल निकलकर आया हमें लगता है या कुछ राज्यों का और जिक्र करते हैं मसलन मणिपुर का जिक्र कर देते हैं को कि मणिपुर का भी सवाल
आज संसद में चर्चा के दौरान उठा लेकिन मणिपुर में दस बार सबसे ज्यादा बार राष्ट्रपति शासन लगा है
लेकिन ध्यान दीजिए जब जब राष्ट्रपति शासन लगाए और उस दौर को परकीय का तो कसो राष्ट्रपति शासन के दौर में ऐसी स्थिति नहीं थी जो मौजूदा वक्त में इस वक्त मणिपुर की है
लेकिन केंद्र सरकार वहां राष्ट्रपति शासन नहीं लगाएगी को कि वहां पर बीजेपी की ही सरकार है जो वहां के मुख्यमंत्री हैं वह बीजेपी के ही है यानी केंद्र की ताकत का सिर्फ एहसास कीजिए कि वह संविधान को अपने अनुकूल कैसे परिभाषित कर सकती है एक तरफ मणिपुर जस्टिस
सबसे ज्यादा इस देश में दस बार राष्ट्रपति शासन देखें और मौजूदा वक्त में सबसे बुरे हालातों को जीते हुए भी वही सरकार मौजूद है जिस सरकार के काल में वहां पर कुछ ध्यान ही नहीं दिया जा रहा है और पूरे समुदाय आपस में बांटकर बिखर चुके हैं तो क्या यह ऐसी परिस्थिति इस देश के भीतर आ गई और
यह एक ट्रेलर भर था जो आज दिल्ली को लेकर नजर आया क्योंकि आने वाले वक्त में सिर्फ बेंच को पीटने वाले संख्याओं की तादाद ज्यादा होनी चाहिए उसके बाद वैचारिक तौर पर विचारधारा के तौर पर या इस देश के संवैधानिक सोच के मुताबिक कोई चीज मायने रखती नहीं है या खेल खोलकर
सामने आ गया तो की बेंच ठोकने वाले की तादाद अगर एक सौ इकतीस है और जो विरोध कर रहे हैं वो एक सौ दो है तो फिर आप कुछ भी करा सकते हैं कुछ भी पास हो सकता है यह नजारा दिल्ली बिल्कुल लेता है इसमें तीन बातें आखिर में जो सबसे महत्वपूर्ण बात है व इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि
भारत की राजनीति अंगड़ाई ले रही है और दो हज़ार चौबिस के चुनाव को लेकर जो परिवर्तन की दिशा है उसमें पहली बार समूचा विपक्ष एकजुट हो गया है
तो क्या एकजुट विपक्ष अगर इसको दो हज़ार चौबिस में हार मिलती है
तो ये खुले तौर पर जनादेश का ऐलान होगा कि इसके बाद मोदी सत्ता जो मनचाहे कर सकती है वहां सवाल किसी एक राज्य के एक मुख्यमंत्री का नहीं होगा बल्कि उस समूचे इंडिया को दिखाने का होगा जहां पर छब्बीस राजनैतिक दल मिलकर मोदी सत्ता के खिलाफ लड़ रहे
होंगे यह पहला सवाल है
दूसरा सवाल है अगर विपक्ष की एकजुटता है तो दूसरी तरफ खुद बीजेपी के अपने सांसदों की तादाद भी उतनी नहीं जितनी भरोसे व राज्यसभा में जीत जाती अगर उनको सहयोग नहीं मिलता यह सहयोग का दायरा जगन रेड्डी तक क्यों जाता है यह नवीन पटनायक पक्के हो जाता है क्या एक खौफ है
जो सत्ता में रहते हुए खौफ इस दौर में पैदा किया गया जांच एजेंसियों के जारी है क्या एक ऐसी स्थिति है यानी सत्ता का राजनीतिक सत्ता का संवैधानिक हो ये दोनों परिस्थिति एक झटके में भारत के भीतर दो हज़ार चौबिस के बात कही वृहत तौर पर सामने तो नहीं आ जाएगी
और तीसरी परिस्थिति इस देश में व जनता क्या सोचे कि जिस जनता ने अपने नेताओं को चुना अपने नुमाइंदों को चुना और उसके जरिए एक संवाद बनाया इसके बाद तो न सोशल इंजिनियरिंग मायने रखती और ना ही साम्प्रदायिक आधार पर वोटों का बांटना मायने रखता है यह तो एक संविधान को अपने
अनुकूल करते हुए ऐसी राजनीतिक व्यवस्था है जिसमें पार्लियामेंट के भीतर की ताकत किसी भी चुनी हुई सत्ता को दिखा सकती है
तो क्या यह तीसरा मैसेज इस देश के उस लोकतंत्र पर सीधा आघात है जो वोट के जरिए अपनी राजनीति को साधती है और वोट के जरिए इस देश में लोकतंत्र को जिंदा रखती है
इन तीन सवालों के इर्द गिर्द जो बड़ा सवाल दो हज़ार चौबिस की दिशा में जा चुका है उसमें पहला मैसेज यही है कि चुनी हुई सरकार और चुनी हुई सकता
संसद के सामने राज्य स्तर पर कोई मायने नहीं रखती है यूनियन टेरिटरी यानी केंद्र शासित राज्य तो सोच भी नहीं सकता है और कल तक जो फेडरल स्ट्रक्चर को जिन्दा रखने की सोच हुआ करती थी और उसके जरिए जो खिलवाड़ राजनीति के स्तरीय होता था अब उसके आगे की परिस्थिति आ गई है
बरसों बरस तक हम अस्थाई व्यवस्था यही रखेंगे और क्या सुप्रीम कोर्ट के भीतर वह मामला चाहे क्यों न चल रहा हो वो सब जुडी हो या न हो क्योंकि आज व्याख्या करने के लिए कि सब जुड़े मामले के तहत पार्लियामेंट काम नहीं करता है बल्कि पार्लियामेंट लौ को हिस्सेदारी के जरिए बात नहीं है बल्कि
आपको लॉक के अंतर्गत ही डिफाइन कर रहा है और इस बात को कहने के लिए कौन खड़ा हुआ खडे हुए रंजन गोगोई चीफ जस्टिस रह चुके हैं लेकिन इस समय नॉमिनेटेड है सरकार ने उनको राज्यसभा का सदस्य बनाया तो उनके तीन तर्क जो थे वह खुले तौर पर थे कि पार्लियामेंट के आगे सुप्रीम कोर्ट की नहीं चलती है
सुप्रीम कोर्ट का कोई भी मामला पार्लियामेंट के आड़े नहीं आता है और पार्लियामेंट से बड़ा कोई रही है
नायाब राजनीति के दौर में इस समृद्ध काल में नई व्यवस्था और राजनीतिक सोच के आंगन में आप सभी का स्वागत है बहुत बहुत शुक्रिया
बहुत बहुत शुक्रिया

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