दोस्तों नमस्कार सत्ता बचाए रखने की लड़ाई ऐसी हो सकती है शायद कभी किसी ने सोचा नहीं होगा आपने भी कहाँ सोचा होगा जिस देश में सरकार चुनकर आए और उसके बाद पहले दिन कैबिनेट की बैठक में
ब्लैक मनी को लेकर चर्चा हो और एसआईटी बना दी जाए
उसी ब्लैक मनी को लेकर सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता है अगर ब्लैकमनी उसके पॉलिटिकल फंडिंग का हिस्सा
इस दौर में तमाम विपक्षी राजनीतिक दलों के नेताओं को मनी लॉन्ड्रिंग के दायरे में ईडी लेकर आई और सुप्रीम कोर्ट ने भी ईडी से कहा जरूर कि दरअसल इस देश की आर्थिक सुरक्षा की जिम्मेदारी आपकी है
और भारत में हर लोग ने माना कि अगर ईडी है तो मनी लॉन्ड्रिंग नहीं होगी और मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ अगर वह कार्रवाई कर रही है तो बिल्कुल सही है
लेकिन मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए अगर पॉलिटिकल फंडिंग बीजेपी के पास आ रही है तो सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता है
इतना ही नहीं इस देश के भीतर में और देश के बाहर शैल कंपनियों के स्तरीय जो कॉरपोरेट सेक्टर किस तरीके से ब्लैक मनी को जन्म देता था एक के बाद एक प्रधानमंत्री के सोलह भाषण ऐसे निकलकर आ जाएंगे जिसमें वह ज़िक्र करते हैं कि एक दो नहीं
एक दो लाख नहीं बल्कि तीन लाख से ज्यादा शेल कंपनियों पर उन्होंने ताला लगवा दिया क्योंकि उन्हें बर्दाश्त नहीं है गलत तरीके से पैसे की कमाई और ब्लैक मनी
लेकिन ब्लैक मनी मनी लॉन्ड्रिंग और उसके बाद शेल कंपनी अगर शेल कंपनी के जरिए भी पॉलिटिकल फंडिंग बीजेपी को हो रही हो सत्ता तक पैसा पहुँच रहा हो तो फिर सरकार को कोई फर्क पड़ता नहीं है
तो क्या यह मान लिया जाए कि मनी लॉन्ड्रिंग का सवाल हो शेल कंपनियों का सवाल हो या फिर ब्लैक मनी का सवाल हो सरकार का सारा नियम इस देश की जनता के लिए है उसके अपने लिए कोई नियम नहीं है
यह पहला सवाल है
दूसरा सवाल इस दौर में दो हज़ार चौबिस की दिशा में बढ़ते हुए राजनीतिक कदम में अगर विपक्ष एकजुट है तो विपक्ष के भीतर किसे कहां पर कैसे सेंध लगानी है इसकी जानकारी सत्ता को होनी चाहिए
और सत्ता के पास जानकारी तभी आएगी जब सत्ता खुले तौर पर जासूसी कर रही हो और जासूसी करने का ज़िक्र इससे पहले पेगासस के जरिए निकल कर आया था धीरे धीरे सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और उसके बाद उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया
लेकिन इस बार मामला कुछ और है और ज्यादा गंभीर है
क्योंकि विपक्ष राजनैतिक तौर पर कैसे कदम बढ़ाता है इसमें विपक्ष के तमाम राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेता चाहे वह राहुल गांधी और उनकी टीम ही क्यों ना हो चाहे अखिलेश यादव और उनकी टीम क्यों ना हो चाहे शिवसेना की प्रियंका चतुर्वेदी ही क्यों ना हो चाहे तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा ही क्यों ना हो
चाहे प्रवक्ताओं की कांग्रेस के भीतर एक पूरी लिस्ट हो चाहे ओवैसी का जिक्र हो चाहे इस दौर में केजरीवाल के ओएसडी का जिक्र हो हर फेरिस्त को खोलते चले जाइए तो सभी की जासूसी हो रही है होने वाली है और यह चेतावनी कोई दूसरा नहीं दे रहा है बल्कि यह चेतावनी वह
फोन दे रहा है जिस फोन का इस्तेमाल ये तमाम नेता करते हैं इस देश में और भी लोग करते हैं तो चेतावनी जनरल नहीं है सिस्टमेटिक तरीके से रेंडम नहीं है यह बिल्कुल इंडिविजुअल को लेकर है और उनको यह चेतावनी एप्पल के आईफोन के जरिए दी गई कि आप को अलर्ट किया जाए
रहा है कि स्टेट स्पॉन्सर्ड जासूसी इसका मतलब बहुत साफ है कि आपके जो संवेदनशील डाटा है उसको कोई दूसरा ले जाएगा जो आप बातचीत करते हैं जो आपका कम्युनिकेशन है उसको कोई दूसरा सुन लेगा जो कैमरा काम कर रहा है माइक्रोफोन काम कर रहा है वह भी उस दायरे में आ जाएगा
तो बचा क्या क्या राजनीतिक तौर पर सत्ता बचाने की यह आखिरी लड़ाई है
और इसमें जब हम जिक्र आपसे ब्लैक मनी मनी लॉन्ड्रिंग शैल कंपनियों का कर रहे थे तो जरा यह भी सोच लीजिए इस देश के भीतर में जिसने भी और जिस संस्था ने भी इसका विरोध किया उस संस्था को संभाले हुए लोगों को हाशिए पर जाना पड़ा या सरकार के सामने नतमस्तक होना पड़ा
ऐसा नहीं है कि इलेक्शन कमीशन ने विरोध नहीं किया ऐसा भी नहीं है कि आरबीआई ने विरोध नहीं किया ऐसा भी नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के भीतर से कोई आवाज नहीं आई सब कुछ हुआ लेकिन बावजूद इसके सबको सरकार के अगर अनुकूल है तो यह चीजें चलती रहेगी
दो मसले बहुत साफ है आज सुप्रीम कोर्ट में कॉन्स्टिट्यूशनल बैंच बैठी है पांच जजों की चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ खुस उसकी अगुवाई कर रहे हैं और मसला इस देश के इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर है
इलेक्टोरल बॉन्ड का नेक्सस इस देश में कॉर्पोरेट और सत्ता के बीच का तालमेल खुले तौर पर दिखलाता है
और कॉर्पोरेट का मतलब पहचान के तौर पर सिंबॉलिक के तौर पर अगर अडानी का जिक्र है तो इसको राहुल गांधी खुले तौर पर अडानी सिस्टम बताने से चूक नहीं रह जाए और सारे मुद्दों को लेकर जब वो सामने आते हैं तो कहते हैं इस देश में अडानी की सरकार यानी प्रधानमंत्री मोदी दूसरे
नंबर पर है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी की जान उस तोते में है जो तोता कोई दूसरा नहीं अडानी है
हमें लगता है कि आज इन बातों पर इसलिए गौर कीजिए और आज पुरानी फाइलों को इसलिए खोली है क्योंकि इस देश के भीतर की डेमोक्रेसी जो थी
जो पावर बैलेंस था जो संविधान द्वारा प्राप्त स्वायत्त संस्थानों को अधिकार थी उसको कैसे धीरे धीरे खत्म कर सत्ता बचाने की पूरी लड़ाई मोदी काल में निकलकर खुले तौर पर सामने आ गई और आज जासूसी के जरिए या सुप्रीम कोर्ट के भीतर सुनवाई के जरिए यह बात निकल कर आ रही है
लेकिन उससे पहले विरोध होते थे सवाल उठाए जाते थे सरकार के नियम कायदों को कटघरे में खड़ा किया जाता था लेकिन एक सबको धीरे धीरे एक एक करके खारिज कैसे किया गया हमारी टीम ने इस पर उन तमाम डॉक्यूमेंट्स को निकाला और जानकारी आज आपको होनी चाहिए या
जो हम कह रहे हैं उसके पीछे का पेश किया है
उस देश का सबसे बड़ा आधा आज की सुनवाई जो सुप्रीम कोर्ट में हो रही है उसमें जो कहा जा रहा है हमें लगता है उससे पहले की परिस्थिति में आपको ले चलते हैं जब आरबीआई ने इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर कहा था कि मनी लॉन्ड्रिंग को यह बढ़ावा देगा और इसके जरिए ब्लैक मनी को वाइट
करना संभव होगा
जब इलेक्शन कमीशन ने कहा था कि चंदा देने वालों के नाम गुमनाम रखने से पता लगाना संभव ही नहीं होगा कि राजनीतिक दल ने धारा तीन आई भी का उल्लंघन करके चंदा लिया है या नहीं लिया है और विदेशी चंदा देने वाला भी कानून जो है वह बेकार हो जाएगा कोई मायने नहीं
रखेगा सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए काले धन को कानूनी किया जा सकता है इसका डर है और विदेशी कंपनियां सरकार और राजनीति को प्रभावित कर सकती है इसका भी तरह है
यह बात दो हज़ार सत्रह की है सत्रह में जब इलेक्टोरल बॉन्ड लाने से पहले चीजें चल रही थी
लेकिन जरा एक कल्पना और कीजिए कि आज की तारीख में सरकार जब सुप्रीम कोर्ट में जाकर यह कह दे कि इस देश की जनता को यह जानने का अधिकार ही नहीं है कि कोई भी पॉलिटिकल पार्टी कहां से चंदा ले रही है और चंदा देने वाला कौन है
वह चंदा देने वाला इक्कीस पैसे को रोटेट कर रहा है शेल कंपनियों के जरिए रोटेट कर रहा है अपनी ब्लैक मनी को वाइट बना रहा है या इस दौर के भीतर में जो मनी लॉन्ड्रिंग हो रही है उसके वह हिस्सेदारी में खड़ा हुआ है और चूंकि वह चंदा दे रहा है तो फिर उसकी जान
जनता को क्यों होनी चाहिए इस बात का ज़िक्र अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमण ने बहुत साफ तौर पर अदालत के सामने कल ही अपनी बात को रख दिया
और आज
जब पहल शुरू हुई क्या क्या कहा गया उससे पहले हमें लगता है एक बार फिर
कुछ पुरानी फाइलों को खोलिए जिस दौर में सवाल उठते थे इलेक्शन कमिश्नर ओपी रावत उनका बहुत साफ कहना था इलेक्टोरल बॉन्ड का मिसयूज शेल कंपनियां करेंगी
लेकिन उस वक्त नौकरशाह झोंक चुके थे
और इकनॉमिक अफेयर्स के सेक्रेटरी उस दौर में हुआ करते थे सुभाष चंद्र गर्ग उनका बकायदा रेकॉर्ड दो है जिसमें उन्होंने लिखा कि शेल कंपनियां इस का मिसयूज करेंगी इस बात का जिक्र बकायदा इलेक्शन कमीशन कर रहा है
उसके बाद इलेक्शन कमिश्नर बदले और एके जोती जब आए तो उन्होंने कहा नहीं नहीं व्यक्ति उम्मीदवार और नए राजनीतिक दलों को तो यह उपलब्ध होगा नहीं पुराने राजनीतिक दलों को उपलब्ध होगा और इससे क्या हानि पड़ेगी लेकिन इसी प्रक्रिया में नौकरशाहों ने सरकार को सुझाव दिया कि आप एक काम क्यों नहीं
करते हैं इस देश का इनकम टैक्स एक्ट इसको बदल डालिए
उसको बदलिए इस तरीके से कि अब आपको जो चंदा मिलेगा उसकी जानकारी आप देने की स्थिति में नहीं रहेंगे यानी जिसको पॉलिटिकल चंदा मिल रहा है नहीं बताएगा कि कहां से हमको पॉलिटिकल चंदा मिल रहा तो आईटी एक्ट बदल दिया गया
तीसरा सुझाव आया कि एफसीआई एक्ट को भी बदल डालिए सुझाव देने वाले को दूसरे शख्स थे
या तो सचिव स्तर के अधिकारी थे या ईडी में काम कर रहे लोग थे
जो सरकार के लाइमलाइट में आना चाहते थे सरकार के साथ खड़ा होना चाहते थे उन्होंने सुझाव दिया और एफसीआरए कानून भी बदल दिया गया जो कि विदेशी पैसे को लेकर इस देश में कड़े कानून के तहत बनाया गया और कल ही तो गहलोत के बेटे को दिल्ली एफसीआई कानून के तहत बुलाया गया जिसमें उन्होंने कहा हमारा विदेशी
पूंजी से कोई लेना देना नहीं है
लेकिन पूछताछ उनसे हुई
कि कुछ तो लेना देना होगा जो ही तो बात नहीं हमारे पास कुछ रैकवार तो है
अब सवाल यह है कि इस देश के भीतर में जो विदेशी कंपनी इस देश में कोई छोटी सी सब्सिडियरी कंपनी खोल लेती है
शेल कंपनी की तरह ही काम करेगा वो अगर सरकार को पैसा डोनेशन दे रही है
तो फिर उसकी जानकारी देगी नहीं ईडी को भी नहीं दी जाएगी और आईटी को भी नहीं दी जाएगी और सरकार को विदाई दी जाएगी क्योंकि एफसीआरए कानून में यह ढील दे दी गई जो विदेशी कंपनियां अपनी सबसे बड़ी कंपनियों के जरिए जो पॉलिटिकल फंडिंग इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए करेगी उसकी जानकारी देने की जरूरत नहीं है तो उस
को भी बदल दिया गया
अब तो कानून इस देश में पॉलिटिकल फंडिंग के लिए बदल गए
बात यहीं नहीं रुकती है बात यह है कि उस वक्त आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल हुआ करते थे हम जिक्र से चौदह सितंबर दो हज़ार सत्रह का कर रहे हैं
ऊर्जित पटेल ने उस दौर के वित्त मंत्री अरुण जेटली से कहा हम इस बात से चिंतित हैं कि वर्तमान में जो विचाराधीन मामले एक वाहक उपकरण के रूप में जो बॉन्ड जारी किए जा रहे इलेक्टोरल बॉन्ड जारी वह विशेष रूप से शेल कंपनियों के उपयोग का माध्यम बन जाएंगे और उसका कर दुरुपयोग होने की पूरी
संभावना है
तब वो सुझाव एक और देते हैं कि दरअसल आप ऐसा क्यों नहीं करते हैं कि जो पेमेंट हो वह डिजिटल फॉर्म में हो यानी डीमैट के जरिए हो और इसमें कोई फिजिकल फॉर्म गा रहे चैक ना रहे इलेक्टोरल बॉन्ड भी ना रहे अरे आप कम्प्यूटराइजेशन हो रहा है डिजिटल इंडिया है आप डीमेट के तहत और डिजिटल फॉर्म में आप
कर दीजिए अब सोचिए सरकार क्या जवाब देगी
हमने जो आपको इससे पहले कहा कि सरकार को अच्छा लगता है उन लोगों के नामों को छुपाना जो सरकार को डोनेशन देती है उन ब्लैक मार्केट करने वाले ब्लैक मनी को संजोए हुए लोगों के नाम को छुपाना या शेल कंपनियों को छुपाना अच्छा लगता है क्योंकि
जो पत्र इकनॉमिक अफेयर्स सेक्रेटरी सुभाष गर्ग ने तर्क दिया और आरबीआई गवर्नर को भेजा जो पाँच अक्टूबर दो हज़ार सत्रह को था उनका कहना था कि दरअसल यह इलेक्टोरल बॉन्ड की जो पूरी योजना है यह राजनीतिक चंदे को अधिक जवाबदेह और स्वच्छ बनाने का एक गंभीर प्रयास है
बात यहीं नहीं होगी उसके बाद उन्होंने कहा कि सरकार ने बड़ा इस पर विचार किया है कि अगर डीमैट फॉर्म में इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक दलों को के जरिए पैसा दिया जाएगा तो फिर जो पैसा दे रहा है उसको तो नाम सामने आ जाएगा जबकि गुमनामी प्रदान करने की योजना ही
तो प्रमुख विशेषता इस इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए है
यानी नाम को छुपाना है इसीलिए तो हम इलेक्टोरल बॉन्ड लेकर आए हैं
तो और आप कह रहे हैं कि कुछ सामने ले आइए
यह तथ्य इस पहलू की जानकारी आपके लिए बता दें कि जो एसबीआई है उसके पास तो सारी जानकारी होगी क्योंकि इलेक्टोरल बॉन्ड बेचने का अधिकार उसी को है
और योजना के तहत यह शुरुआती या फिर आगे देखेंगे लेकिन इस नाम को आप सामने लाने की जिद मत करिए को कि एसबीआई के पास अगर सबके नाम है तो कोई भी जान सकता है यही बात घूम के आज
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच के सामने पहुंचे
जहां पर कहा गया कि एसबीआई पब्लिक सेक्टर बैंक है
मालिक सरकार है
मालिक आरबीआई है आरबीआई भी सरकार के अधीन है
और उसमें एक नियम है कि इस देश की इनफोर्समेंट एजेंसी जो है
अगर वह जानकारी चाहे कि हमें जांच करनी है कौन पैसा दे रहा है तो वो उसको बता सकती है लेकिन इनफोर्समेंट एजेंसी भी तो सरकार के अधीन है जैसे ईडी सीबीआई आईटी है जिसका जिक्र बार बार विपक्ष करता रहा है और पार्लियामेंट के भीतर और सुप्रीम कोर्ट को लिखी गई चिट्ठी और राष्ट्रपति को भेजी गई चिट्ठी में भी विपक्ष ने
सी बात का जिक्र किया तो बचा क्या सब तो सरकार के हाथ में है और सारी चीजें सरकार खुद को बचाने के लिए कर रही है इसी प्रक्रिया में तो वह जासूसी भी कर रही है कि पकड़ेगा कौन सब कुछ तो हमारे अनुकूल है सिस्टम हमारा काम कर रहा है सत्ता हमारे हिसाब से चल रही है पूरे के पूरे एजेंसी हमारे
कूलर तो दिक्कत क्या है दिक्कत कोई नहीं है सरकार का एकाधिकार है सरकार जो मनचाहे सो कर सकती है इसमें एक नया पेच राहुल गांधी यह कह कर डालते हैं कि दरअसल सरकार अडानी की है वह उसे स्ट्रक्चर को सामने लेकर आते हैं कि कैसे इस देश की सारी सरकारी और देश की संपत्ति को
निजी हाथों में सौंपा गया और निजी हाथ तय करने लगे इस देश में बिजली बिल क्या होगा पानी बिल क्या होगा हवाई का किराया क्या होगा आप जब प्लेटफॉर्म पर जाएं टिकट क्या होगा जब आप हवाई अड्डे जाए वहां पर कितना पैसा लिया जाएगा जो किसान अपनी अनाज को गोडाउन में रखेगा एवज में कितना लिया जाएगा सब कुछ वही तय करने लगे
तो एक सिस्टम वह है और दूसरी तरफ सिस्टम सरकार का ऐसे कर रहा है और दोनों को मिलाइए का तो मतलब मोनोपॉली होनी चाहिए पैसे पूंजी की और जिसके पास पैसा पूंजी होगा उसको पैसा और पूंजी दिलाने का काम सरकार अपने तौर पर कर रही होगी तो काहे का ब्लैक मनी का है कि
कंपनी का है कि मनी लॉन्ड्रिंग कुछ भी नहीं बचा क्योंकि यह लड़ाई जिस रूप में चल रही है उसमें जब आज सुप्रीम कोर्ट के भीतर एक एक करके जो जिक्र हो रहा था हमें लगता है उसको भी आज आपको सुनना चाहिए
बहुत साफ तौर पर कहा गया कि इनकम टैक्स और एफसीआई को में संशोधन किया गया है यानी फंड किस्से आया बताने की जरूरत नहीं और यही बात होते होते आई कि अगर जांच एजेंसी इनफोर्समेंट एजेंसी चाहे कि कैसे की सीबीआई से उसे कुछ चाहिए क्योंकि उसकी फेहरिस्त में जो नेता है
नेताओं में तो बीजेपी के नेता भी हैं लेकिन उनकी फाइल नहीं खुलती है फाइल खुलती है जो विपक्ष में है जासूसी हो रही है जो विपक्ष में है
तो राजनीतिक तौर पर सत्ता बनी रहे इस पर इस देश के नौकर उन नौकरशाहों का पर एक है उस सिस्टम का स्टॉक स्ट्रेट है जो इस दौर में सरकार के लिए और सरकार के जरिए काम कर रहे हैं तो उर्जित पटेल तो अभी है नहीं उस दौर में रावत साहब थे जिन्होंने सवाल खड़ा किया था वह भी नहीं है
उस दौर के भीतर में आइएगा तो सुप्रीम कोर्ट के भीतर चीफ जस्टिस बी तो बदल गए क्योंकि यह मामला पहली बार अपने तौर पर उस दौर में आया था जब जस्टिस गवाही हुआ करते थे रंजन गोगोई हुआ करते थे वह भी बदल गए
तो मौजूदा वक्त में पुराने पन्नों को अगर जैसा ही खोल देगा तो आप चौक जाइएगा कि अच्छा ऐसा है और इसी रास्ते सरकार चल रही है लेकिन हमें लगता है सुनवाई के उस हिस्से को आज जरा समझने की कोशिश इसलिए भी कीजिएगा को की पार्लियामेंट की सौर यह सुप्रीम कोर्ट की प्रोसीडिंग का एक हिस्सा है
अगर जांच एजेंसी इनफोर्समेंट एजेंसी चाहेगी तो एसबीआई जानकारी देगा लेकिन सवाल है सभी जांच एजेंसी सरकार के कंट्रोल में है और एसबीआई भी सरकार के अधीन तो राजनितिक दल कह सकते हैं उन्हें पता ही नहीं किसने फंड दिया और फिर विदेशी कंपनियां भी भारत में सब्सिडरी खोलकर अगर इलेक्ट्रॉल
बॉन्ड के जरिए फंड देती है और शेल कंपनी जो अपने आप को जीरो प्रॉफिट एंड लॉस में दिखलाती है और जबकि फिलहाल जो देश के भीतर कंपनियां है वह टैक्स हैवन के तौर पर बन जायेगी और मनी को रूठ कर पॉलिटिकल दल को पैसा देने में बहुत आसानी होगी
तो क्या ये सभी राजनीतिक दलों को मिलेगा यह सवाल भी उठा लेकिन उससे पहले सवाल उठा तो प्लेइंग फील्ड तो सारी पॉलिटिकल पार्टीज के लिए सबको पैसा मिलेगा तो जवाब आया जी नहीं सबको पैसा नहीं मिलेगा एक डाटा आपको बतलाते हैं और यह डाटा रखा गया जिसमें जानकारी आई कि लगभग साठ फीसदी पैसा
दो हज़ार बाईस मार्च तक का डॉक्यूमेंट आज रखा गया जो इलेक्टोरल बॉन्ड का है बीजेपी को मिला पाँच हज़ार दो सौ इकहत्तर करोड़ सबसे प्रमुख विपक्षी नेशनल पॉलिटिकल पार्टी कांग्रेस को मिला नौ सौ बावन करो
अगर ऐसी स्थिति है तो इसका मतलब बहुत साफ है कि सात पर्सेंट भी छोटा और तमाम राजनीतिक दलों को मिला दीजिएगा तो लगभग बहत्तर परसेंट बीजेपी के खाते में और बाकी छिटपुट दूसरों के खाते में बढता चला जाता यह पहली स्थिति निकलकर आई दूसरी स्थिति निकलकर आई कि इस देश में जो तेईस लाख कंपनियां रजिस्टर्ड
है कौन कितना किस रूप में डोनेट कर रहा है कौन अपनी एक कंपनी से दूसरी कंपनी में पैसा ट्रांसफर कर रहा है कोई जानकारी नहीं आएगी अगर आप कानूनी तौर पर चीजें अनुकूल नहीं रखेंगे भारत सरकार कहती है कानून तो है
तो सरकार कहती है कानून है और सुप्रीम कोर्ट में आवाज उठती है कानून तो है लेकिन यह आपके लिए नहीं है क्योंकि आपने तो संशोधन कर लिया तो चीजें बची ही नहीं तो सबकुछ आप इस देश का देते चले जाइए कॉर्पोरेट और यह नेक्सस एक ऐसी परिस्थिति में जाकर टिक जाएगा जहां कॉर्पोरेट के हिसाब से ही
यह देख चलने लगेगा और राजनीतिक नहीं बल्कि इस देश की इकोनॉमिक पॉलिसी भी वैसा ही बनने लगेगी तो आप क्या करेंगे
तो कोई जवाब नहीं इस पर और यह बात निकलते निकलते इस तरीके से आई है यहां जानकारी दे दें कि दरअसल यह पूरा मामला एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म ने जो उठाया एडीआर ने यह कह के कि कैसे इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए ब्लैक मनी शेल कंपनी मनी लॉन्ड्रिंग सबको पनाह सरकार ने अपने फायदे के लिए दी हुई है वहीं से यह
निकलकर आई और इसके लिए उदाहरण भी मांगे सुप्रीम कोर्ट ने आप कैसे कह सकते हैं कि जो कॉर्पोरेट पैसा दे रहा है उसी कॉर्पोरेट को सरकार लाभ दे देती है तो यह भी निकल कर आया आज की एक रिपोर्ट आई ऑर्गेनाइज क्राइम करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट यह अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टस की टीम है
जर्नलिस्टों की टीम है जिन्होंने एक रिपोर्ट दी कि दरअसल वेदांता ग्रुप
माइनिंग में उसे कोई दिक्कत ना हो यानी कोई पर्यावरण आस्पेक्ट सामने आकर खड़ा न हो जाए तो इसीलिए जो प्रमुख पर्यावरण नियम थे सरकार ने बदल डालें और वेदांता ने इस दौर में जो फंडिंग की उसकी प्रमुख पार्टी चुनी हुई पार्टी बीजेपी थी और वेदांता ने जो बीते पांच बरस में दो हज़ार बाईस तक चार
सौ सत्तावन करोड़ दिए और दो हज़ार तेईस में एक सौ पचपन करोड़ रुपए फंडिंग के तौर पर बीजेपी को दी है
अब
सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला है
पैक के साथ मामला है अब आगे आगे का सवाल यह है कि जो आरबीआई कह रहा था जो इलेक्शन कमीशन कह रहा था जो सुप्रीम कोर्ट कह रहा था वो सब दो हज़ार सत्रह में जब सरकार ने नहीं माना और उसके बाद पार्लियामेंट की ताकत को दिखाते हुए चीजे अपने अनुकूल कर ली तो सवाल
चार सवाल सबसे बड़े इस दौर में निकल कर खड़े हो गए
यानी इस देश में सरकार का कोई मतलब नहीं है अगर कानून है तो वह कानून से ऊपर है
इस देश में सरकार कानून जनता के लिए बनाएगी विपक्षी राजनीतिक दलों के लिए बनाएगी लेकिन जहां उसके अनुकूल पाइपलाइन है तो उसे कोई रोक सकता रही है
यानी जनता के लिए रिस्ट्रिक्शन है
और सत्ता को लाभ मिले जहां जहां वहां सत्ता के लिए कानून कोई रुकावट नहीं काम करेगा
अगला सवाल क्या वाकई ब्लैक वाइट करने की स्थिति में इलेक्टोरल बॉन्ड है और इस देश की इकोनॉमी को लाकर खड़ा कर दिया गया शुरुआती दौर में जो सुप्रीम कोर्ट में बात रखी गई उसमें तो यही बात खुलकर निकलती है तीसरी बार जो ईडी मनी लॉन्ड्रिंग को लेकर लगातार नकेल कसते चली जा रही और एक सौ पच्चीस
पॉलिटीशियन उसके डायरी में दर्ज हैं
उससे हटकर मनी लॉन्ड्रिंग अगर पॉलिटिकल इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए हो रही है और बॉन्ड के जरिए कमाया जा रहा है पैसा लाइव तो उन कंपनियों को क्या ईडी ने छुआ नहीं छुआ
क्योंकि एसबीआई से सरकार को पता चलेगा
इसने पैसा दिया जिसने पैसा दिया उसको लाभ सरकार को देना है तो उसके अनुकूल नियम बन जाएंगे उसको तमाम जगहों पर एनओसी मिल जाएगी
और यह एक ऐसी परिस्थिति में देश आकर खड़ा है जिसमें राजनितिक लाभ पाने वाले गलत तरीके से शेल कंपनियां खड़ा करने वाले काले धन वाले सभी का नेक्सस खुले तौर पर पॉलिटिकल फंडिंग के साथ अगर जुड़ जाता है तो इस दौर में जो नौकरशाह इस देश के हैं वह इकनॉमिक
अफेयर्स के सेक्रेटरी गर्ग साहब काम जिक्र कर रहे थे लेकिन सरकार चलाना और देश चलाने में सिस्टम ही सत्ता के अनुकूल अगर इस तरीके से बना दिया जाए कि हेल्दी कंपटीशन तो दूर की बात है
जो एक पूरी लंबी फेहरिस्त है कि सबकुछ अडानी के हवाले क्यों सबकुछ कॉर्पोरेट के अनुकूल क्यों इस देश के रिस्ट्रिक्शन आम लोग और जनता के प्रतिकूल क्यों तो उसका एक ही जवाब आखिर में निकलकर आता है
सरकार को क्या और सत्ता को क्या यह लगने लगा है
कि उसकी पिटाई होने वाली है
इसीलिए उसने सारे फ्रंट खोल दिए हैं
जिसको जेल में डालना है जेल में डाला जाएगा जैसे सुनवाई होगी उसी अनुकूल सुनवाई होगी जो फैसले आएंगे वह सत्ता के अनुकूल होंगे और स्थिति निकलते निकलते कहां तक आ गए
और परिस्थितियां पूरी राजनीतिक विपक्ष के लिए कितनी नाजुक है
इसका आखिरी का वह हिस्सा जरा समझिए जब चंद्रबाबू नायडू जो जेल में है व जेल से अपने लोगों को कहते हैं तेलांगना में जाओ और कांग्रेस की मदद करो
क्योंकि आंध्र प्रदेश में तो
वहां के
पॉलिटिकल सत्ता के साथ बीजेपी खड़ी है और मुझे तो जेल में डाल दिया गया तो कम से कम तेलांगना के चुनाव में कांग्रेस के साथ तो खड़े हो जाओ बूथ स्तर पर खड़े हो जाओ यानी राजनैतिक तौर पर समूचे विपक्ष को खत्म करने की परिस्थिति और समूचे विपक्ष की राजनीतिक तौर पर छटपटाहट
इन दोनों परिस्थितियों के बीच में इस देश की ईमानदारी इस देश की डेमोक्रेसी इस देश के कॉन्स्टिट्यूशनल इंस्टीट्यूशंस सभी दांव पर है
सभी की साख दांव पर है सभी के कामकाज पर समझ लीजिए तो ठीक है
वरना सुप्रीम कोर्ट का इंतजार करते हैं
जब जागो तभी सवेरा
बहुत बहुत बहुत शुक्रिया

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